बालानां कृते
१.
कणकमणि दीक्षित- भगता बेङक कथा- नेपालीसँ मैथिली
अनुवाद:
श्रीमती रूपा धीरू आ
श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा २.
डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए
वर्ष अर्थात्- खिस्सा अण्टार्कटिका केर
श्रीमती रूपा धीरू आ
श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा २.
डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” - दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए
वर्ष अर्थात्- खिस्सा अण्टार्कटिका केर
१
कणकमणि दीक्षित, ५५ बर्ख, हिमाल
खबरपत्रिकाक प्रकाशक आ हिमाल साउथ एशियनक सम्पादक छथि। ओ कॉलेजक पढ़ाइ काठमाण्डूसँ, लॉ क
पढ़ाइ दिल्लीसँ आ परास्नातकक पढ़ाइ न्यूयॉर्कसँ केने छथि। नेपालीसँ मैथिली अनुवाद:
श्रीमती रूपा धीरू आ
श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा
रूपा धीरू: रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक
दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति-
राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय
पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन)।
धीरेन्द्र प्रेमर्षि, सिरहा, नेपाल 1967-
वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि।कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन।
वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि।कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन।
किछु दूर ओ घनगर खपड़ैल घर सभ, मन्दिरक गुम्बज सभ आ विशाल–विशाल दरबारक बुर्ज सभ देखलक। ओकरा विश्वास भेलैक जे इचङ्गूक बेङ सभ
जाहि ‘शहर’क बात करतै छल से
निश्चित रूपेँ इएह थिक । भक्तप्रसाद सुनने छल जे शहरमे मोटर–गाड़ी, बिजली–पङ्खा आ
सैकड़ो कोठलीवला बड़का–बड़का बङ्गला सभ होइत छैक ।
एक दिन भक्तप्रसादक कनेक लटकलहा नाङरि सेहो
टूटि गेलैक । ताही दिन ओ सभसँ कहलकैक जे आइ साँझ्मे ओ घर छोड़ि देबाक निश्चय कएलक
अछि ।
“किएक छोड़बह ?”— सभगोटे एक्कहि स्वरमे पुछलकैक । घर छोड़ि ओ दूर जा सकैत अछि ताहि बात पर
ओकरा घरक ककरो विश्वासे नहि छलैक ।
भक्तप्रसाद जवाब देलक— “हम एहि दुनियासँ बाहरी दुनियाक
अनुभव करऽ चाहैत छी । हम देखऽ
चाहैत छी जे शहरमे लोकसभ कोना रहैत अछि । हम
तराइमे जाए चाहैत छी । हमरा बड़का नदी, आश्चर्यजनक प्राणी सभ, समतल काठमाण्डूक आकर्षण
चौरी–चाँचर आ बड़का–बड़का पहाड़ सभ
देखबाक मोन होइत अछि ।”
घरक अभिभावक बुद्धिए प्रसादटा भक्तप्रसादक
मोनक बात बुझ्लकैक । बहुतो साल पहिने ओकरो मोनमे एहने विचार आएल रहैक । मुदा, ओ अपन सोचलहा नहि कऽ पओने रहए ।
ओकरा अपन सोचलाहा पूरा नहि होएबाक बडड् पछताबा छलैक । तेँ ओ प्रसन्न भऽ अपन हिम्मतगर
पोताकेँ देखि मोनहि मोन विचार कएलक— “ई छौड़ा हमरोसँ बेसी
हिम्मतगर बहराएल । अपना विचारमे ई अड़ल रहऽवला अछि । एकरा केओ नहि रोकि सकैत अछि ।”
भक्तप्रसादक घर छोड़िकऽ जएबाक निर्णयसँ
दुःखित भऽ सभटा बेङ एकठाम जमा भेल । ओकरा सभकेँ बद्धि प्रसाद कहलककै — “एकरा जाए दहक । जखन ई बाहरी दुनिया देखि लेत तँ हमरा सभकेँ कतेको नव–नव बात सभ बताओत ।” तैयो भक्तप्रसादक माए
सानुमैयाँ किछु कहऽ चाहतै छलि कि भकप्रसाद चटपट सभकेँ प्रणाम-पाती कऽ विदाह भऽ गेल
।
“बाबा ! हम जाइ छिअह ।” भक्तप्रसाद जाइत–जाइत जोरसँ चिकरैत बाजल ।
तकरा बाद ओ लोकक चलऽवला रस्तासँ चलनाइ शुरू कएलक आ जा अपन खेतसँ अऽढ़ नहि भऽ गेल ता
ओ उनटिकऽ नहि
तकलक । किछु दूर चललाक बाद ओ मोटर–गाड़ी दौड़ऽवला पक्की सड़कपरसँ चलनाइ
शुरु कएलक ।
........
(जारी...)
२
डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”
दक्षिणी ध्रुव पर मनुक्खक पएरक सए
वर्ष
अर्थात्
खिस्सा अण्टार्कटिका केर
खिस्सा अण्टार्कटिका केर
आइ धिया – पुता सभ सोचैत होयताह कि विदेहजी फेर अहू बेर कोनो उपदेश वला कविता वा गीत लऽ कऽ अओताह आ अनेरो हमर सभक दिमाग खएताह । तऽ से नञि, एहि बेर कोनो उपदेश नञि । एहि बेर हम अहाँ सभ केँ एकटा दूर देशक यात्रा पर लऽ चलैत छी – देश नञि महादेश थिक ओ । चारू कात पानि सँ (समुद्र सँ) घेड़ायल अछि – तेँ महाद्वीप थिक ओ । अहूँ सभ सोचैत होयब कि एहि ठिठुरल जार मे के घऽर छोड़ि कऽ घूमय लेल निकलत । पर जतऽ जयबाक विचार अछि ओहि ठाम तत्तेक ने जार पड़ैत अछि कि अपना ओहि ठामक माघ मास आ तीला संक्राँतिक जार सेहो गर्मी सनि बुझि पड़त । अहाँ सभक मोन मे होइत होयत जे कहीं हम कनाडा या स्विटजरलैण्ड केर बात तऽ नञि कऽ रहल छी । नञि – कथमपि नञि - स्विटजरलैण्ड वा कनाडा तऽ देश थिक आ हम महादेशक बात कऽ रहल छी । ओ महादेश जत्तऽ प्राकृतिक रूप सँ मनुक्ख नञि रहैत अछि । ............... सही सोचि रहल छी अहाँ सभ, ओकर नाम थिक “अण्टार्कटिका” । अप्पन धरती केर दक्षिणी ध्रुव केर चारू कात बसल महादेश अण्टार्कटिका । अण्टार्कटिका ग्रीक शब्दक रोमण संस्करण थिक, जकर अर्थ होइत अछि “आर्कटिक केर विपरीत” (Anti - Arctic) अर्थात् “उत्तर केर उनटा” , माने कि “दक्षिण” ।

चित्र सं॰ - 1
– धरतीक ग्लोब पर अण्टार्कटिकाक स्थिति
अहाँ सभ केँ ई तऽ बुझले होयत कि धरती गोल अछि आ एकर दुनु
ध्रुव समतोला सन थोड़ेक धँसल आ सपाट अछि । उत्तरी ध्रुव केँ 90° उत्तरी अक्षांश रेखा आ
दक्षिणी ध्रुव केँ 90° दक्षिणी अक्षांश रेखा कहल जाइत अछि । रेखा नाम रहितहु ई
दुनु रेखा नञि भऽ कऽ एकटा विन्दुक सदृश थिक । एकर दुनुक आस पासक क्षेत्र केँ
क्रमशः “आर्कटिक क्षेत्र” आ “अण्टार्कटिक क्षेत्र” कहल जाइत अछि । संसार
मे सात टा महादेश थिक जाहि मे सँ एक थिक “अण्टार्कटिका” । ओहि ठाम चारू कात
केवल बर्फे - बर्फ अछि, सौंसे
धरती बर्फक तऽर मे नुकायल रहैत अछि । ओ दुनियाक सभसँ बेशी निर्जन, ठण्ढा, हवा - बिहाड़ि युक्त आ
शुष्क क्षेत्र अछि । सामान्य भाषा मे शुष्क माने सुखायल । अहाँ सभक मोन मे प्रश्न
उठल होयत कि एक तरफ तऽ हम कहि रहल छी जे चारू कात केवल बर्फे - बर्फ अछि आ दोसर तरफ कहैत छी दुनिञाक सभ सँ सुखायल
क्षेत्र – से कोना ? ओहि ठामक न्यूनतम्
तापमान – 89.2°C (-128.6°F) नापल गेल अछि (रूसी अण्टार्कटिक केन्द्र “वोस्तोक” द्वारा) । तेँ पानि जमि कऽ ठोस आ
कठोर (पाथरहु सँ बेशी कठोर) बर्फ भऽ जाइत अछि – हवा सँ पानिक अंश वा आर्द्रता (moisture / humidity) पुर्ण रूपेँ निपत्ता
भऽ जाइत अछि,
परिणामस्वरूप हवा अत्यन्त शुष्क भऽ जाइत अछि । संगहि ओहि ठाम सतह पर कोनो ऊँच
पहाड़, गाछ - वृक्ष वा आन
अवरोध नञि होयबाक कारणेँ ई हवा बिना रोक – टोक केर बहैत रहैत अछि आ बिहाड़िक रूप लऽ लैत अछि । एहि ठाम
हवा केर अधिकतम् गति 320 कि॰मि॰ प्रति घण्टा नापल गेल अछि । दक्षिणी ध्रुव
केर नज़दीक बर्फक अधिकतम् मोटाई 4.776 कि॰मि॰ पाओल गेल अछि – जाहि सँ ओहि ठामक
ठण्ढीक अन्दाज आसानी सँ लगाओल जा सकैत अछि । विश्वक स्वच्छ पानि (fresh water) केर लगभग 70% अण्टार्कटिकाक हिम – आवरणक रूप मे जमल अछि
जखन कि विश्वक सम्पुर्ण बर्फक 90% भाग एकसरि अण्टार्कटिका मे अछि ।
अण्टार्कटिका केर क्षेत्रफल लगभग 1 करोड़ 40 लाख वर्ग कि॰मि॰ (14.00 million km2) थिक आ ओ एशिया, अफ्रिका, उ॰ अमेरिका आ द॰ अमेरिकाक बाद विश्वक पाँचम सबसँ पैघ महादेश अछि । ई चारू कात सँ दक्षिणी हिम महासागर (अण्टार्कटिक महासागर) सँ घेड़ायल अछि । एहि महासागरक ऊपरुका भाग ठण्ढी मे जमि जाइत अछि, जाहि सँ एहि समय मे महाद्वीपक आकार प्रायः दूना बुझि पड़ैछ । एहि ठाम लगभग 6 महीना केर दिन आ 6 महीना केर राति होइत अछि तेँ अपना घड़ीक अनुसार 6 महीना धरि रातियो मे आकाश मे सूर्य देखाइ पड़ैत अछि – थिक ने आश्चर्यक गप्प ! पर गर्मी केर दिन मे सेहो अधिकतम् तापमान मात्र - 26°C (- 15°F) नापल गेल अछि । अपना सभ दिशि माघ मासक शीतलहरी मे सेहो औसत तापमान 4°C सँ 10°C केर बीचे मे रहैत अछि । आब अहीं कहू - छै ने बहुत ठण्ढा जगह ? पड़ाए गेल ने अहाँ सभक जार ?
अण्टार्कटिका केर क्षेत्रफल लगभग 1 करोड़ 40 लाख वर्ग कि॰मि॰ (14.00 million km2) थिक आ ओ एशिया, अफ्रिका, उ॰ अमेरिका आ द॰ अमेरिकाक बाद विश्वक पाँचम सबसँ पैघ महादेश अछि । ई चारू कात सँ दक्षिणी हिम महासागर (अण्टार्कटिक महासागर) सँ घेड़ायल अछि । एहि महासागरक ऊपरुका भाग ठण्ढी मे जमि जाइत अछि, जाहि सँ एहि समय मे महाद्वीपक आकार प्रायः दूना बुझि पड़ैछ । एहि ठाम लगभग 6 महीना केर दिन आ 6 महीना केर राति होइत अछि तेँ अपना घड़ीक अनुसार 6 महीना धरि रातियो मे आकाश मे सूर्य देखाइ पड़ैत अछि – थिक ने आश्चर्यक गप्प ! पर गर्मी केर दिन मे सेहो अधिकतम् तापमान मात्र - 26°C (- 15°F) नापल गेल अछि । अपना सभ दिशि माघ मासक शीतलहरी मे सेहो औसत तापमान 4°C सँ 10°C केर बीचे मे रहैत अछि । आब अहीं कहू - छै ने बहुत ठण्ढा जगह ? पड़ाए गेल ने अहाँ सभक जार ?

चित्र सं॰ - 2
- ठीक दक्षिणी ध्रुव केर ऊपर सँ देखला पर अण्टार्कटिका केर
स्वरूपक रेखाचित्र
अण्टार्कटिका केर धरती पर मनुक्खक
पहुँचब एक समय मे ओहिना छल जेना कि बाद मे चान पर पहुँचब – ओहिना कठिन आ ओतबहि महत्त्वपुर्ण
। लोक सभ अप्पन – अप्पन प्राणक बाजी लगा
कऽ ओतए पहुँचबाक प्रयास मे लागल छलाह । किछु लोक अप्पन – अप्पन उद्देश्य वा लक्ष्य प्राप्त
करबा मे सफल भेलाह आ आपिस सेहो आबि सकलाह, जखन कि किछु लोक अप्पन प्राण गमाए बैसलाह । ओहि समय मे पाल वला
पनिया जहाज अण्टार्कटिका तक पहुँचबाक एक मात्र साधन छल । रस्ता मे “समुद्री बिहाड़ि” (Cyclone) मे घेड़एबाक वा “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) तथा “प्रवाहित समुद्री
हिमखण्ड” (Pancake
ice, Polynya etc.) सँ टकड़एबाक वा “हिमनद” (Glacier) तथा “हिमीभूत समूद्री सतह” (Pack ice, Fast ice etc.) मे फँसि जएबाक
सम्भावना रहैत अछि । प्लवित / दहाइत हिमखण्ड कतेक विनाशक भऽ सकैत अछि तकर सभ सँ नीक
उदाहरण “टाइटेनिक” नामक पनिया जहाजक
विश्वप्रशिद्ध दुर्घटना सँ लगाओल जा सकैत अछि । ई जहाज साउथेम्पटन (ब्रिटेन) सँ
न्युयॉर्क (अमेरिका) जएबा काल, 10 अप्रील 1912 कऽ एकटा एहने “प्लवित / दहाइत हिमखण्ड” (Iceberg) सँ टकड़एबाक कारणेँ दुर्घटनाग्रस्त भेल छल । जएबा व
अएबा दुनु कालक लेल खएबा – पिउबाक चीज – बस्तु पहिने सँ संग मे ओरिआ कए राखए पड़ैत छैक । ज्यों – ज्यों वातावरणक तापमान कम होइत जाइत छैक आ हवाक शुष्कता
एवम् गति बढ़ैत छैक, त्यों
– त्यों शरीर सुन्न होमए
लगैत छैक, शरीरक कोशिका (Cells) सभ मरए लागैत छैक
जकरा चिकित्सकिय भाषा मे “हिम – दाह / हिम – दग्ध” (Frost bite) कहल जाइत अछि । एहि “हिम - दाह” सँ किछुए काल मे मनुक्खक प्राण तक
जा सकैत अछि । तेँ एहि जानमारुक ठण्ढी सँ बचबाक पूरा ओरिआओन संग मे लऽ कऽ चलए
पड़ैत छै ।
अण्टार्कटिका केर बीचो – बीच मध्य अण्टार्कटिक पर्वतश्रेणी (Trans Antarctic Maountains) थिक जे बर्फ सँ आच्छादित रहैत अछि । ई पर्वतश्रेणी अण्टार्कटिका केँ दू भाग मे बाँटैत अछि – पैघ “मुख्य भाग” (Main land) आ दोसर छोट “प्रायद्विपीय भाग” (Antarctic peninsula) । एकर अतिरिक्त ओहि ठाम किछु सुप्त ज्वालामुखी पहाड़ सेहो थिक जे कखनो कखनो सक्रिय भऽ उठैत अछि । ओहि ठाम लगभग 70 टा स्वच्छ / मीठ पानिक झील (Fresh water lakes) सेहो अछि । ओहि ठाम मनुक्ख तऽ नञि अछि, पर प्राणीविहीन जगह नञि थिक ओ । चिड़ै मे पेंग्वीन (Penguin) (जे उड़ि नञि सकैत अछि पर पानि मे नीक जेकाँ डुबकी लगा कऽ हेलि सकैत अछि आ बर्फ पर अपन दू पएर सँ मनुक्ख जेकाँ चलि सकैत अछि), स्क्युआ (Skua) आ एल्बेट्रॉस (Albatross) (एकर दुनु पंखक पसार संसार मे आन सभ चिड़ै सँ बेशी होइत अछि) आदि ओहि ठामक मूल निवासी थिक । समुद्र मे सील (Seal), वालरस (Walrus) , क्रील (Krill), मिंक ह्वेल (Mink Whale) आदि पाओल जाइत अछि ।

चित्र
सं॰ - 3 - अण्टार्कटिकाक
जैव धरोहरि
कैप्टन जेम्स कुक (Captain James Cook) पहिल मनुक्ख छलाह जे “अण्टार्कटिक वृत्त” केँ 17 जनवरी 1773 ई॰ कऽ पार कयलन्हि – एकर बाद ओ साले भरि मे दू बेर आओरो प्रयास कयलन्हि पर वातावरणीय विषमताक कारण अण्टार्कटिका धरि नञि पहुँचि सकलाह । 27 जनवरी 1820 ई॰ कऽ रूसी अण्वेषक बेल्लिंगहुसेन (Fabian Gottlieb von Bellingshausen) अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती केँ पहिल बेर दूरहि सँ देखि सकलाह – पर हुनिकहु ओहि ठाम पएर रखबाक सौभाग्य नञि भेटलन्हि । तकरा बाद बहुतो लोक प्रयास कयलन्हि पर ओहि ठाम पएर रखबा मे असफल रहलाह ।
उपलब्ध साक्ष्यक अनुसार अण्टार्कटिकाक हिमाच्छादित धरती पर पहिल बेर पएर रखनिहार व्यक्ति छलाह जॉन डेविस (John Davis) – यद्यपि एहि सँ पहिने किछु आओरो लोक सभ एहि तरहक दावा कएने छलाह पर हनिकर सन्दर्भ मे पुष्टि कएनिहार कोनो साक्ष्य उपलब्ध नञि थिक । ओ सील नामक समुद्री प्राणिक शिकारक उद्देश्य सँ 7 फरवरी 1821 ई॰ कऽ पच्छिमी अण्टार्कटिका मे उतरलाह । परञ्च ओ ओहि ठाम किछुए काल ठहरि कऽ आपिस आबि गेलाह, किएक तऽ ओ शिकारी छलाह , वैज्ञानिक नञि । किछु लोक एकरहु विवादिते मानैत छथि ।

चित्र सं॰
- 4 - दक्षिणी
ध्रुव पर पहिल बेर पएर रखनिहार मनुक्ख, नॉर्वे
निवासी “रॉएल्ड अमुण्डसेन”
अण्टार्कटिका आ ओकर बाद दक्षिणी
ध्रुव धरि पहुँचबाक प्रतियोगिता निरन्तर चलैत रहल । एहि बेर बाजी मारलन्हि नॉर्वे
वासी रॉएल्ड अमुण्डसेन (Roald Amundsen) । ओ 14 दिसम्बर 1911 ई॰ कऽ भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव (Geographical south pole
i.e. 90°S latitude) पर पहुँचबा मे सफल
रहलाह । ओ अपन दलक सदस्य सभक संग ओहिठाम नॉर्वे केर झण्डा फहरओलन्हि आ अपन
पहुँचबाक साक्ष्य ओतय सुरक्षित राखि आपिस चलि अयलाह । पहुँचबा सँ पहिने ओ अपन
यात्रा केर जानकारी दुनिञा सँ नुकाए कऽ रखलन्हि – तेँ हुनक प्रतियोगी सभ केँ एहि
बातक मिसियो खबड़ि नञि रहन्हि । अमुण्डसेन केर जन्म 16 जुलाई 1872 ई॰ मे नॉर्वे (यूरोप महादेशक एक
टा देश) केर शहर ओस्लो (Oslo) केर नजदीक
क्रिस्चिनिया (Christinia) मे भेल छलन्हि । एहि अभियान मे हुनक जहाजक नाँव छल फ्रॅम (Fram) । हुनक नजदीकी
प्रतियोगी इंग्लैण्ड केर कैप्टन राबर्ट फॉल्कन सकॉट (Captain Robert Falcon
Scott) अमुण्डसेनक 33 दिनक
बाद 17 जनवरी 1912 ई॰ कऽ भौगोलिक दक्षिणी
ध्रुव पर पहुँचि सकलाह आ पहुँचलाक बाद पहिने सँ नॉर्वे केर झण्डा देखि हुनिका बहुत
दुख आ तामस सेहो भेलन्हि । आपिस लौटैत काल दुर्घटना मे स्कॉट अप्पन पूरा दल केर
संग मारल गेलाह । 14 दिसम्बर
2011 ई॰ कऽ अमुण्डसेनक
दक्षिणी ध्रुव पर विजयक 100 वर्ष पूरा भेल । 2011 ई॰ केँ नार्वे “अमुण्डसेन वर्ष” आ यूनेस्को (UNESCO) “दक्षिण ध्रुव पर पहिल मनुक्खक शताब्दी वर्ष” केर रूप मे मनओलक अछि
।

चित्र सं॰ - 5 - अण्टार्कटिका
केर भूगोल आ ओहिठाम भारतीय अनुसंधान केन्द्र दर्शक मानचित्र
डॉ॰ सय्यद जहूर कासिम (Dr
Sayed Zahoor Qasim) केर नेतृत्व मे 9 जनवरी 1982 ई॰ कऽ 21 सदस्यीय पहिल भारतीय अण्टार्कटिक
अभियान दल अण्टार्कटिका केर हिमाच्छादित धरती पर पएर रखलक आ भारतक लेल इतिहास
लिखलक । ई दल 1981 कऽ गोआ सँ अपन गण्तव्यक लेल चलल छल । डॉ॰ हर्ष गुप्ता (Dr. Harsha Gupta) केर नेतृत्व मे तेसर
भारतीय अण्टार्कटिक अभियान दल द्वारा 1983 – 84 ई॰ मे एकटा स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना कयल गेल – जकर नाँव राखल गेल “दक्षिण गंगोत्री” । एहि मे एकटा भू
- चुम्बकीय प्रयोगशाला (Geomagnetic laboratory) बनाओल गेल । ई एकटा “हिम छज्जी” (Ice shelf) पर स्थापित छल, जे बाद मे बर्फ मे
धँसि गेल आ नऽव अनुसन्धान केन्द्र स्थापित करबाक आवस्यकता पड़ल ।
भारत अण्टार्कटिका मे अपन दोसर
स्थायी संशोधन केन्द्रक स्थापना 1989 ई॰ मे कयलक आ 1990 ई॰ सँ “दक्षिण गंगोत्री” केँ पुर्णतया बन्न कऽ देल गेल । नऽव अनुसन्धान केन्द्रक नाम
राखल गेल “मैत्री” जे कि बर्फ रहित स्थान पर अवस्थित अछि । अण्टार्कटिकाक 98 प्रतिशत भाग हिमाच्छादित अछि जखन
कि मात्र 2 प्रतिशत भाग बर्फ
रहित अछि । मैत्रीक स्थान द॰ गंगोत्री सँ लगभग 90 कि॰ मि॰ दूर अछि । भारतक तेसर
स्थायी संशोधन केन्द्र निर्माणाधीन थिक जकर नाम होयत “भारती” । भारती केर स्थापना मैत्री सँ
लगभग 3000 कि॰ मि॰ दूर अण्टार्कटिका
केर आन भाग मे भऽ रहल अछि जाहि सँ एहि विस्तृत महादेशक विस्तृत अध्ययन कयल जा सकय
। ई केन्द्र मार्च – अप्रील 2012 ई॰ धरि प्रारम्भ भऽ जायत । 25 मई 1998 ई॰ कऽ राष्ट्रिय
अण्टार्कटिक एवं समुद्री अनुसन्धान केन्द्र (National Centre for Antarctic
and Ocean Research; NCAOR) केर स्थापना गोआ मे भेल । 14 अक्टूबर 2010 धरि भारत 30 गोट वैज्ञानिक अनुसन्धान दल
अण्टार्कटिका पठाए चुकल अछि ।

चित्र सं॰ - 6 - अण्टार्कटिका मे भारतक पहिल (दक्षिण
गंगोत्री) आ दोसर (मैत्री) अनुसंधान केन्द्र आ तेसर (भारती) अनुसन्धान केन्द्रक
प्रस्तावित प्रारूप (मॉडेल)
अण्टार्कटिका दुनिञाक सभसँ पैघ प्राकृतिक प्रयोगशाला (Largest Natural Laboratory) अछि । ओहि ठाम भू – चुम्बकत्व, भूगर्भ विज्ञान, पृथ्वी आ सौरमण्डलक उत्पत्ति व विकाश, समुद्री जीव – जन्तु, वायुमण्डल (विशेषतः ओजोन स्तर) पर प्रदूषणक प्रभाव, चिकित्सा, मनोविज्ञान आदिक अध्ययन आ ओहि सँ सम्बद्ध अनुसन्धान काज आदि कयल जाइत अछि ।
तऽ केहेन लागल नऽव वर्षक अवसरि पर नऽव ठामक यात्रा ? फेर कहियो जखन समय भेटत तऽ आन ठाम घुमबा – फिरबा लेल चलब । आइ बस एतबहि । आब अप्पन – अप्पन घऽर आपिस चलल जाए ।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने)
सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’
ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे
वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले
स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ
लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन
करबाक थीक।
२.संध्या
काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले
स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे
शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल
भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर
स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक
काल-
रामं
स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः
स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ
दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४.
नहेबाक समय-
गङ्गे च
यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे
सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं
यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं
तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक
उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या
द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं
ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ
दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा
बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः
परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते
भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन
तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः
साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव
यन्यूधि शशिनः कला॥
९.
बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे
पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता
देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा
रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒
युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो
न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।
शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ
विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ
नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ
दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक
सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि।
अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश
होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि
मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी
र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए
बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक
रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे
ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय
बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर
वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम
सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8.VIDEHA
FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI
LITERATURE IN ENGLISH
8.1.4.NAAGPHANS
(IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya
Verma
1. Maithili Poem by
Smt. shefalika Varma translated into English
by by Mrs Jaya Verma
२.The constant shedding of Tears (Maithili poem by
Sh. Rajdeo Mandal - translated into English
by
Gajendra Thakur)
Smt. shefalika Varma translated into English
by by Mrs Jaya Verma
२.The constant shedding of Tears (Maithili poem by
Sh. Rajdeo Mandal - translated into English
by
Gajendra Thakur)
१
1. Maithili Poem by
Smt. shefalika Varma translated into English
by by Mrs Jaya Verma
Smt. shefalika Varma translated into English
by by Mrs Jaya Verma
Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a
book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories
titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages
including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently
invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are
important people.
WOMAN
I am a woman, is not my
misdemeanor
Yes, I am a woman.
Your writing has
catapulted me to the cultural height
Not just as a human being
living on this earth
But as the Goddess at
the pedestal.
At the same time, you
have made me
Screech lacimiating the
heart of Tartarus.
Up surging Kosi’s uproar
on nature’s face
Falling on lips
Sometimes autumn morning
Sometimes wintery cold
nights
Whenever I see my face
in mirror
Sita’s distressed shadow
Trembles on my eyelid
My aanchal
Is not filled with moon
and stars
But with Rahu-Ketu.
But, not now
No more the blowing wind
will pollute woman
Now I realize
Nothing exists in this
body of flesh and blood
We are made of the same
matter
Nature has made woman
tender and delicate
Then why only I am
guilty??
I am not a creeper
Who wilts just seeing
index finger
Now the time has changed
Country’s freedom has
entered
Into women’s inner-self
Spreading bright
sunshine
Illuminating inner and
outer domain
Dreaming to touch the
sky
Demolishing tradition-
counter tradition
Creating new sun rays in
the reconstructed sky
Women are marching ahead
…
But still look at my
devotion
Bearing everything
I conceive and create
I give you birth
But it is you who
becomes the God
Now it is the time
To
Forgo man-centric
discourse
And begin women-centric
discourse.
2.
The constant shedding of
Tears (Maithili poem by
Sh. Rajdeo Mandal - from his anthology of
Maithili poems "Ambara"- translated into English by
Gajendra Thakur)
-----------------
Out of the eyes of my beloved
tears like a river
always remain flowing
and in that water of tears
people plunge
some feel cold
and some feel hot
some say wow!
and some feel bad.
but my blind-deaf accomplice
does not care,
her tears always remain flowing
but for some time her tears have stopped coming out
now perhaps she has emptied herself of tears
or
is she storing it!
Sh. Rajdeo Mandal - from his anthology of
Maithili poems "Ambara"- translated into English by
Gajendra Thakur)-----------------
Out of the eyes of my beloved
tears like a river
always remain flowing
and in that water of tears
people plunge
some feel cold
and some feel hot
some say wow!
and some feel bad.
but my blind-deaf accomplice
does not care,
her tears always remain flowing
but for some time her tears have stopped coming out
now perhaps she has emptied herself of tears
or
is she storing it!
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विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/
रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/
Roman.)
English
to Maithili
Maithili to English
Maithili to English
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू
बढ़ाऊ,
अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
२३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स
२४.
नेना भुटका
२५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट
२६.२७.
२८. विदेह मैथिली नाट्य
उत्सव
२९.समदिया
३०. मैथिली फिल्म्स
३१.अनचिन्हार आखर
३२. मैथिली हाइकूhttp://maithili-haiku.blogspot.com/
३३. मानक मैथिली
http://manak-maithili.blogspot.com/
महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर ।
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर
गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह
(सहस्राब्दीक चौपड़पर),
कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य
(त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक
बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist
edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)-
essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups
literature in single binding:
Language:Maithili
६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
(add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
Details for purchase available at print-version publishers's site
website: http://www.shruti-publication.com/
or you may write to
Language:Maithili
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विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह:सदेह:१: २: ३: ४
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।
Details for purchase available at print-version
publishers's site http://www.shruti-publication.com
or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com
२. संदेश-
[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]
१.श्री गोविन्द झा-
विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ।
सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल।
हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।
२.श्री रमानन्द रेणु-
मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम
हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।
३.श्री विद्यानाथ झा
"विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन
महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक
अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।
४. प्रो. उदय नारायण सिंह
"नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक
इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट
मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल
अभिनन्दन।
५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि
विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन,
मैथिलीक
प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट
फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष
शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया
बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर
हार्दिक बधाई स्वीकार करी।
६. श्री रामाश्रय झा
"रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय
वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
७. श्री ब्रजेन्द्र
त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका
"विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
८. श्री प्रफुल्लकुमार
सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक
समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि
दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि
अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक
क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि।
पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
१०. श्री आद्याचरण झा-
कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग
करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान
यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
११. श्री विजय ठाकुर-
मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु
हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
१२. श्री सुभाषचन्द्र
यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित
हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१३. श्री मैथिलीपुत्र
प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग
रहत।
१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा-
"विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ
एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि
अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।
१५. श्री रामभरोस कापड़ि
"भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ
अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन
अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।
१६. श्री राजनन्दन
लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब
तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ
होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ,
मुदा उमर आब
बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति
अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ
द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।
(स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री
आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल
उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ
प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण
नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष
शुभकामनाक संग।
१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह-
अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत
मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ
मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक
प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर
आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
१८.श्रीमती शेफालिका
वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल
अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ
तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।
१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर
छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे
मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।
२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ
समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी।
"विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा
सकैछ।
२१. श्री किशोरीकान्त
मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि-
बधाई स्वीकार कएल जाओ।
२२.श्री जीवकान्त- विदेहक
मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।
२३. श्री भालचन्द्र झा-
अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर
विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे
उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।
२४.श्रीमती डॉ नीता झा-
अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य
शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक
उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।
२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल
गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल
जाए।-गजेन्द्र ठाकुर)
२६.श्री महेन्द्र हजारी-
सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ
गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।
२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।
२८.श्री सत्यानन्द पाठक-
विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।
२९.श्रीमती रमा
झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर
गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी।
विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।
३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह
नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।
३१.श्री रामलोचन ठाकुर-
कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल
परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।
३२.श्री तारानन्द वियोगी-
विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना
आ बधाई।
३३.श्रीमती प्रेमलता
मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल।
बधाई।
३४.श्री कीर्तिनारायण
मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल
बधाई।
३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा-
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।
३६.श्री अग्निपुष्प-
मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा
दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।
३७.श्री मंजर
सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।
३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा
ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे
क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।
३९.श्री छत्रानन्द सिंह
झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।
४०.श्री ताराकान्त झा-
सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि।
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।
४१.डॉ रवीन्द्र कुमार
चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।
४२.श्री अमरनाथ-
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य
मध्य।
४३.श्री पंचानन मिश्र-
विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।
४४.श्री केदार कानन-
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद,
शुभकामना आ
बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास
अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा
समाहित अछि।
४५.श्री धनाकर ठाकुर-
अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत
तऽ नीक।
४६.श्री आशीष झा- अहाँक
पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब
नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ
सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।
४७.श्री शम्भु कुमार
सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा
सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत।
ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम्
तँ अशेष अछि।
४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक
प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल
काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।
४९.श्री बीरेन्द्र
मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता
भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।
५०.श्री कुमार राधारमण-
अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल।
हमर शुभकामना।
५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह
पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ
गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।
५२.श्री विभूति आनन्द-
विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।
५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि
नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।
५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता-
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद;
कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक
स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद।
५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।
५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।
५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक देखल,
बधाई।
५८.डॉ मणिकान्त
ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ
गेल अछि।
५९.श्री धीरेन्द्र
प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित
सहयोग नहि कऽ पबैत छी।
६०.श्री देवशंकर नवीन-
विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।
६१.श्री मोहन भारद्वाज-
अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा
शीघ्र सहयोग देब।
६२.श्री फजलुर रहमान
हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी
छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा
"सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी
अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद
मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ
पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक,
एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन्
सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष
मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल
शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद
मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि
अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे
एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।
६७.बुद्धिनाथ मिश्र-
प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण
पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि
प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।
६८.श्री बृखेश चन्द्र
लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल ,
हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।
६९.श्री परमेश्वर कापड़ि -
श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।
७०.श्री रवीन्द्रनाथ
ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ।
मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक
चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि
आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक
लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि
देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)
७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल
आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय
अछि।
७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ
अछि।
७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ
अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि।
७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले
अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना।
७५.प्रोफेसर कमला चौधरी-
मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन
होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल।
पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो
अहाँसँ आशा अछि।
७६.श्री उदय चन्द्र झा
"विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने
छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि।
७७.श्री कृष्ण कुमार
कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि
बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि।
७८.श्री मणिकान्त दास:
अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च
बड्ड नीक लागल।
७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक
ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ
अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना।
विदेह

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बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे
मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित
रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक
०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
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