१.
निशान्त झा २.
सत्यनारायण झा ३.
जवाहर लाल कश्यप
निशान्त झा २.
सत्यनारायण झा ३.
जवाहर लाल कश्यप
१
निशान्त झा
जीवन डायरी क
तीन पन्ना
दू पन्ना ईश्वर पहिनेसँ लिखने छथि
पहिला "जन्म"
आ अंतिम "मरण"
केवल बिचला एक पन्ना
मात्र अपन
जकरा हमरा लिखनाइ अछि
आँखि मे नीक सपना लेने
टूटल हौसला पर बिना कनने
मेहनतक
पतीक्षारत रही
रेत बालू क बीज केनाइ अछि
करुणा प्रेम सँ
व्यथित केँ व्याध हरनाइ अछि
हरित वसुंधरा क
स्वर्णिम पल लेबक अछि
हाथ सँ हाथ
पाखुर सँ पाखुर मिलल
बढ़िते जयबाक अछि
लक्ष्य केँ पएबाक अछि
ढौर लिअ हाथसँ
क्षितिज केँ ढौर दियौ अहाँ
पल पल केँ बान्हि कऽ
तिल्सिमी चादर बुइन दियौ अहाँ
धरा फेर अहांक अछि
आकाश फेर अहाँक
२
किछु विचार “राम”
पर
एक
राम!
अहाँ भगवान नै छलौं
अहाँ तँ छलौं , प्रतीक मात्र
आ रहब !
दीन-हीन जनक
एक
राम!
अहाँ भगवान नै छलौं
अहाँ तँ छलौं , प्रतीक मात्र
आ रहब !
दीन-हीन जनक
संबलक
विश्वास कए !
ओइ धर्म-मर्यादित आचरणक
जकर कारण सँ अहाँ भोगलौं
चौदह सालक वनवास
आ
उपहार भेटल अहांकेँ
सीता विछोहक
राम!
अहाँ भगवान नै छलौं
अहाँ तँ छलौं, प्रतीक मात्र
आ रहब
पुत्र धर्मक
प्रजाक पालनहार सत्यनिष्ठ राजाक!
जकर कारण सँ अहाँ भोगलौं
चौदह सालक वनवास
आ
उपहार भेटल अहांकेँ
सीता विछोहक
राम!
अहाँ भगवान नै छलौं
अहाँ तँ छलौं, प्रतीक मात्र
आ रहब
पुत्र धर्मक
प्रजाक पालनहार सत्यनिष्ठ राजाक!
के कहैत अछि अहाँ भगवान छलौं
अहाँ तँ मनुखे छलौं
तखने तँ पूजने छलौं अहाँ शिव केँ !
ई आर बात अछि कि अहाँ “आदर्श” छलौं
अहांक कर्म अहांकेँ हमरासँ ऊंच उठा देलक
अतेक ऊंच कि
अहाँ भगवान क समकक्ष भऽ गेलौं
पूजय जाइ लगलौं
भगवान कहाए लगलौं
राम!
अहाँ मनुखे किएक नै रहलौं!
दू
राम!
अहांक नाम
लक्ष्मण या किछु आर होइतए
तँ की
अहाँ ओ सभ नै करितौं
जे अहाँ केलौं !
तीन
राम!
कखनो -कखनो
तँ लगैत अछि
अहाँ भगवाने छलौं
मनुख नै
किएकि
जय सीताक लेल
अहाँ लंकाक नाश केलौं
हुनके !
हुनके अहाँ तियागि देलौं
मनुख तँ एना नै कऽ सकैत अछि .
३
ई जमीन अछि गामक
गौर सँ देखु एकरा आ प्यारसँ निहारि लिअ
आराम सँ बैसु अतए पल दू पल बिता लिअ
सुध कनी लऽ लिअ अतए पर एकटा हरियर घावकेँ
की ई जमीन अछि गामक, हँ ई जमीन अछि गामक ......
कुल कुनबा आ कुटुमक अर्थ बेमानी भेल
दादा कक्का हरा गेल सभ बिसरि गेल बड़की मैयाँ
गाम भरिमे रिश्ताकेँ केहेन डोरमे छल बान्हल
आराम सँ बैसु अतए पल दू पल बिता लिअ
सुध कनी लऽ लिअ अतए पर एकटा हरियर घावकेँ
की ई जमीन अछि गामक, हँ ई जमीन अछि गामक ......
कुल कुनबा आ कुटुमक अर्थ बेमानी भेल
दादा कक्का हरा गेल सभ बिसरि गेल बड़की मैयाँ
गाम भरिमे रिश्ताकेँ केहेन डोरमे छल बान्हल
जातिक भेद रिश्ताक तराजू छल साधल
याद अछि अखन तक धीमरकेँ इनारक छाहक .....
कि ई जमीन अछि गामके , हँ ई जमीन अछि गामके ......
आपसक संबंधक चौंतार पर बैसि कऽ
छल सब छौरा बहुते रौब सँ किछु ऐंठ कऽ
छल नै पैसा बहुत आ नै अधिक सामान छल
पर हमर ओही गाममे सभक बहुत सम्मान छल
मांगि कऽ कपडा बनल बरयातीक दादाक ...
कि ई जमीन अछि गामक , हँ ई जमीन अछि गामक ......
गामकेँ जखनसँ शहरमे आन जान भऽ गेल
गामक सभ मनुख आब खाना खाना भऽ गेल
सए बीघाक मालिक गामक अपने तँ छल
पगारक चक्कर मे छेदी शहर मे अछि हरा गेल
बात करय के अछि हमरा ओइ दौरक ठरावक ...
कि ई जमीन अछि गामक, हँ ई जमीन अछि गामक......
याद अछि अखन तक धीमरकेँ इनारक छाहक .....
कि ई जमीन अछि गामके , हँ ई जमीन अछि गामके ......
आपसक संबंधक चौंतार पर बैसि कऽ
छल सब छौरा बहुते रौब सँ किछु ऐंठ कऽ
छल नै पैसा बहुत आ नै अधिक सामान छल
पर हमर ओही गाममे सभक बहुत सम्मान छल
मांगि कऽ कपडा बनल बरयातीक दादाक ...
कि ई जमीन अछि गामक , हँ ई जमीन अछि गामक ......
गामकेँ जखनसँ शहरमे आन जान भऽ गेल
गामक सभ मनुख आब खाना खाना भऽ गेल
सए बीघाक मालिक गामक अपने तँ छल
पगारक चक्कर मे छेदी शहर मे अछि हरा गेल
बात करय के अछि हमरा ओइ दौरक ठरावक ...
कि ई जमीन अछि गामक, हँ ई जमीन अछि गामक......
२.
सत्यनारायण झा
पत्र
लिखि रहल छी आखर हम
,प्रिये अहींक नाम
गेल छलौ पूजा मे ,हम अपना गाम |१
गामक माटि छलै ,ओहिना गमकैत ,
फूल पात सभ गाछ मे ,छलै ओहिना झुलैत |२
छौड़ा सभ गाछ पर ,झूला झुलैत छल ,
सिनेह-प्रीतिक गीत
सभ ,ओहिना गबैत छल |३
यारक दलान एखनो
पूबे मुँहे छल ,
बाबाक आँगन ,सुन सान लगैत छल |४
एकोटा लोक नहि, एकोटा बेद नहि ,
सांझे सं अंगना मे
कुकुर भुकैत छल |५
की कहू हाल हम, भैया भउजी केर ,
बेटाक मारि सं, बेदम रहथि फेर |६
गामक हालात छैक
एकदम खराब ,
टोले टोल भेटत आब
बोतल शराब |७
नहि छलै
ब्रह्मस्थान मे ओ पाकरिक गाछ ,
नहि छलै ओकरा आव, बरक गाछक साथ |८
महराजी पोखरिक छैक , आव हालत बेहाल
घाट सभ टुटल छैक ,रूप विकराल |९
आँगन मे आव ,एकटा हवा बहल छै ,
सभहक पुतौहु आव, रौदा तपैत छै |१०
बाँध बोनक हाल एखनो
हरियर लगैत छैक ,
घास काटय एखनो
घसवहिनी भेटैत छैक |११
देखलौ आँगन मे, गबैत सामाक गीत ,
पोखरिक मोहार पर, भेटल छला मीत |१२
कहलनि भजार ,अहाँ काज कएल नीक ,
गाम आबि गेलौ से, भेलै बर ठीक |१३
की कहू हम आब, गामक कथा ,
लिखि नहि सकै छी, गामक व्यथा |१४
माफ करब अहाँ हम, घूमि नहि सकब ,
गामक हालात जावे, किछु नहि सुधरत |१५
मोन हुए त’ गाम, अहूँ
आबि सकै छी ,
गामक सुधार मे, संग द’ सकैत
छी |१६
३
जवाहर लाल कश्यप
छी धन्य हम, हम्मर मिथिला
ई जन्जीर
तोडि , स्वीकार करु
सबल
छलहुँ, अबल भेलहुँ
सबल बनब संकल्प करु
नव गीत लिखु ,नव बात कहु
आ नवयुग के संधान
करु
जाअगु अहाँ
हुंकार करु
आ मंगल दिश प्रस्थान करु
नहिं बात बनाउ, नहिं घात लगाउ
पीठक पाछा अपमान
करु
सत्य कहु, सम्मान पाउ
आ दोसर के सम्मान
करु
भागु नहिं नेता के
पाछा
नहिं करु भीखक
अभिलाषा
आत्मबल के संग लय
डुनियाँ पर अहाँ
राज करु
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.
डॉ॰ शशिधर कुमर २.
नवीन कुमार "आशा"
डॉ॰ शशिधर कुमर २.
नवीन कुमार "आशा"
१.

जयति जय श्री त्रिपुरारी केर
(आगामी शिवराति पर विशेष)
बम - बम भोलेनाथ, जयति - जय श्री त्रिपुरारी केर ।
त्रिलोचन, चन्द्रधारी
केर ना ।।
कर मे त्रिशूल आ
डमरू विराजन्हि,
जनिकर अम्बर छन्हि बघछाल ।
गरा मे लटकनि साँप अहर्निश,
संगहि रुद्राक्षक छन्हि माल ।
शम्भू – गिरिजापति, जय नीलकण्ठ, जटाधारी केर ।
गंगा मस्तकधारी केर ना ।।
श्मशान मे राज जनिक
छन्हि,
भूत – प्रेत केर संग ।
कान मे कुण्डल, हाथ कमण्डल,
सौंसे देह रमओने भस्म ।
गौरीकान्त, गिरीश, उमापति, जय ऋतुध्वंशी केर ।
उगना मिथिलाविहारी केर ना ।।
वास जनिक कैलाशक
ऊपर,
हिमगिरि जनिक तपोवन ।
त्रिपुरासुर केँ
मारि खसाओल,
कएल जलन्धर भञ्जन ।
कार्तिक आओर गणेशक
तात, रुद्र - असुरारि केर ।
बसहा बरद सवारी केर ना ।।
हिनक भक्त रावण छल
रक्तप,
तइयो मान ओकर राखल ।
कयल तपस्या घोर भगीरथि,
मनवाञ्छित फल ओ
पाओल।
भोला - भंगिया – शिव - शंकर; भक्तक हितकारी जे ।
विष्णु - चरण पुजारी जे ना ।।
बसन्तक आगमण पर
भेल पुलकित दिग -
दिगन्त,
आ
खीलि उठल हर अन्तरा१ ।
स्वागतहि आगत वसन्तक,
सजि रहल ई वसुन्धरा
।।
कास केर तजि श्वेत अभरण,
पहीरि कुसुमक ललित
पहिरन,
कऽ सकल सिंगार
हर्षित,
कर प्रतिक्षा वसुन्धरा
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
चानने मलयक
सुवासित,
सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,
करय गमगम, मुदित
हर कण,
हर
दिशा, हर
अन्तरा२
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल
हर अन्तरा ।।
हँसि रहल निमिलित
कमलदल,
मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,
मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,
गाबय स्वागत अन्तरा३
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
अर्थ निर्देश :-
१) अन्तरा
= कोण /
कोणा – दोगा
२) अन्तरा
= दू
(दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)
३) अन्तरा
= गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)
कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल
कामिनी !
जुनि
तोड़ू अहँ फूल ।
फूलहि निर्मित अंग
अहँक अछि, गरि जायत कोनो
शूल ।।
मुँह अहँक जनु रक्त
कमल ।
नील कमलदल नयन युगल
।
ग्रीवा मृणाल, जल अलक बनल अछि, अधर कुसुम अरहूल ।
कामिनी !
जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
आँचरे झाँपि गुलाबक
थौका ।
श्वासक संग मलय केर
झोंका ।
अपनहि रमणि, रुचिर कुसुमादपि, तोड़ब किए अहँ फूल ?
कामिनी !
जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
पद पंकज अहँ केर
कोमलतर ।
उपवन बीच भ्रमर कर
सञ्चर ।
अहँ केँ देखि भ्रमर लोभायल, अयलहुँ, कयलहुँ भूल ।
कामिनी !
जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
२
बसन्तक आगमण पर
भेल पुलकित दिग -
दिगन्त,
आ
खीलि उठल हर अन्तरा१ ।
स्वागतहि आगत वसन्तक,
सजि रहल ई वसुन्धरा
।।
कास केर तजि श्वेत अभरण,
पहीरि कुसुमक ललित
पहिरन,
कऽ सकल सिंगार
हर्षित,
कर प्रतिक्षा वसुन्धरा
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
चानने मलयक
सुवासित,
सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,
करय गमगम, मुदित
हर कण,
हर
दिशा, हर
अन्तरा२
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल
हर अन्तरा ।।
हँसि रहल निमिलित
कमलदल,
मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,
मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,
गाबय स्वागत अन्तरा३
।
भेल पुलकित दिग
दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
अर्थ निर्देश :-
१) अन्तरा
= कोण /
कोणा – दोगा
२) अन्तरा
= दू
(दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)
३) अन्तरा
= गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)
२
नवीन कुमार "आशा"
बेटी हमर अभिमान
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी
माता-पिताक प्राण अछि बेटी;
जॅ नहि होयत किनको बेटी
बुझि हुनक ङाढ़ गेल टुटि
अभिमान अछि बेटी।
मॉ के दुःख ओ बुझैत
हृदय सॅ कठोर नै होयति
बापक करेजक होय ओ प्राण;
बेटा सॅ बढ़ि होय अछि बेटी के ज्ञान
मान अछि बेटी
माता-पिता के प्राण अछि बेटी।
आजुक बेटी; बेटा सॅ बढ़ि के
इ सगरे दुनिया जानैत अछि
तहियो ने जानी पापी दुनिया के
बेटी जन्मक सोच सतबैत अछि;
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी।
‘‘आषा’’ के गप्प पर दियो ध्यान
अवष्य करू एकटा कन्या दान;
जॅ करब कन्या दान
तखन बाजव- ‘‘बेटी तु हमर अभिमान’’।
अभिमान ----------
मान-------------
माता-पिताक --------
(भगिनी सौम्या ‘‘गुनगुन’’ लेल)
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी
माता-पिताक प्राण अछि बेटी;
जॅ नहि होयत किनको बेटी
बुझि हुनक ङाढ़ गेल टुटि
अभिमान अछि बेटी।
मॉ के दुःख ओ बुझैत
हृदय सॅ कठोर नै होयति
बापक करेजक होय ओ प्राण;
बेटा सॅ बढ़ि होय अछि बेटी के ज्ञान
मान अछि बेटी
माता-पिता के प्राण अछि बेटी।
आजुक बेटी; बेटा सॅ बढ़ि के
इ सगरे दुनिया जानैत अछि
तहियो ने जानी पापी दुनिया के
बेटी जन्मक सोच सतबैत अछि;
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी।
‘‘आषा’’ के गप्प पर दियो ध्यान
अवष्य करू एकटा कन्या दान;
जॅ करब कन्या दान
तखन बाजव- ‘‘बेटी तु हमर अभिमान’’।
अभिमान ----------
मान-------------
माता-पिताक --------
(भगिनी सौम्या ‘‘गुनगुन’’ लेल)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
मुन्नाजी-
१७ टा गजल
1
बनलै सरकारी किरानी जिनगी
नेहाल भ' गेलै
प्रूफ पढ़ि संपादक कहेबा लेल
बेहाल भ' गेलै
रंगकर्म केर ज्ञानक बिन पिटए
डंका सगरो
मैथिली रंगकर्म क्षेत्रक ओ
बुझू दलाल भ' गेलै
मारि अंघोरिया तकै प्रायोजक
खरचा-पानि
लेल
मैथिली केर नाम बेचि बुझू जे
मालो-माल
भ' गेलै
रंगोत्सवमे लागै सर्वभाषा
रंगमंचनक भीड़
देखू जे अपन भाषाक नाटकक अकाल
भ' गेलै
आखर---19
2
धार एखन धरि तँ उफानपर अछी
लोक ताका-ताकी करैत बान्हपर अछी
नहि जानि किओ केखनो जाएत
भसिया
किओ कोठा पर किओ मचानपर अछी
कोठो बलाकेँ तँ नै बकसथिन्ह
कमला
दूनू बगलीक बान्ह कटानपर अछी
भोर होइते मचि गलै गरद-मिसान
कोठा आ मड़इया दूनू भसानपर
अछी
आखर-15
3
आजुक युगक कथा पुराण सुनू
जाहिसँ पेट भरए सएह गुनू
नै करू देखाँउसे दूइर समय
स्वंय कोनो समस्याक निदान
चुनू
जँ लागल पसाही अनका घरमे
तकरा लेल अहाँ नै कपार धुनू
घर तँ बचाउ सदिखन अप्पन
मुदा तेँ दोसरा बेर नै आँखि
मुनू
आखर—13
4
माछ मँगैए आरक्षण गणतंत्रक
लिहाजसँ
माटि-पानि छोड़ि देलक आब
चलैए जहाजसँ
छोड़ि भरोसा जालकेर निकलै छलै
ओ गाँजसँ
एलेक्ट्रीक-मशीन आबि करैए बहार
माँझसँ
कनिक्के पानि पसीन नै निकलैत
छी बैराजसँ
बर्फक बीच जीबि आब खुश भ' गेलौ सुराजसँ
ओतौ नेता भेल प्रविष्ट जुटै
छी एक अवाजसँ
मनुक्खो डरैत अछी सिंगी-माँगुर जाँबाजसँ
आखर---18
5
फिकर जिनगीक भ' नै सकल
तैँ आइ खाधिमे खसि गेलौं हम
सुरता रखै छी आइयो अपन
मुदा बेगरता नै बुझलौं हम
गाछसँ खसै छल पहिने लोक
आइ जमीनेपर खसलौं हम
बुझि धारक कछेर अपनाकेँ
नाव केर फेरा बढ़ा देलौं हम
माँझ आँगनमे कतिआएल छी
अपने चालिसँ बेरा गेलौं हम
आखर---12
6
बिगड़लो रुपकेँ नकल करैए आब
लोक
नकलोकेँ यथार्थ संजोगि राखैए
आब लोक
दायित्व बुझैए मात्र अपन
स्वार्थपूर्ति लेल
अनकामे अपनाकेँ विलगा लैए आब
लोक
धुँआधार हँकैए गप्प लोक
कल्पनाकेँ भावेँ
यथार्थमे अपनाकेँ सुनगा लैए
आब लोक
जीबनक दशा-दिशा तय करैए मात्र
स्वंय
भाइ देखावामे स्यंवकेँ हेरा
लैए आब लोक
देखू पहिनेसँ आरक्षित भ'केँ जिबैए सभ
मुदा बेर पड़ने देखार होइए आब
लोक
स्तरसँ उपर जीबाक भ' गेलैए परिपाटी
पाइक फेरमे भ्रष्टाचारी भेलैए
आब लोक
आखर---17
7
नेताक फाँसमे फँसल ई भारत भाए-भैय्यारी जकाँ
देखू छटपटा रहल माछ भरल
अपियारी जकाँ
लोक तँ कटैए घिसिऔर महँगाइसँ
मारल भ' क'
भावे मुदित मुदा स्वर निकलैछ
फकसियारी जकाँ
आर्थिक उदारीकरण कमाइ आब
लाखमे होइछ
मुदा वैश्विक परिस्थितिमे मोल
लागए हजारी जकाँ
बिहारक सिरखारी बदलि गेल सन
लगैए आब
श्रमिक घटलासँ कंपनी-मालिक लगै बिहारी जकाँ
आइ धिया-पुता घुमैए प्रशिक्षित
बेरोजगार भ' क'
महँगाइमे आंशिक लाभ पाबि
बुझैए दिहाड़ी जकाँ
आखर---20
8
आइ सगरो समाज लागै दलाल छै
पाइ लेल अपनोकेँ करै हलाल छै
रखने रहै अछी मुट्ठीमे माटि
नुका
कहि क' सोना बेचबा लेल बेहाल
छै
आधुनिक दौड़मे अछी मातल सन
आर्थिक उदारीकरणकेँ कमाल छै
टल्हाकेँ किनैए सोना बुझि लोक
सभ
विदेशी ब्राण्ड-नाम पाबिए बेहाल छै
खुलल पोल छलै दलालक जखने
इंटरपोल धरि मचल बबाल छै
तखन सरेण्डर करै तस्कर सभ
कहै छै जे इ देशभक्तिक सबाल
छै
भरि लेलक अछी स्विस बैंकक
खाता
जोड़ि हाथ कहै गलतीकेँ मलाल
छै
आखर---14
9
कएल कोनो कुकृत्यसँ लोक नै आब
ढ़ठाइए
वएह कुकर्मी सभ-सभ ठाम आब ठठाइए
लोक पबैए रोजगार तँ बुनैए नव
समाज
जत' जा कमाइए ओतुके भ'
आब सठिआइए
उघरल लोक सभकेँ छुट्टा भ' घुमैत देखब
मुदा झँपलाहा लोक सभ लाजे आब
ढ़ठिआइए
नीक काज केनिहार सभ झँपले
रहैत अछी
नीच काज केनिहारक झंडा आब
उधिआइए
आखर---18
10
बुझाइ नै अछी बात जे कोन
अभिप्राइ छै
कटै अपनोकेँ पाछू ने कोनो
सम्प्रदाइ छै
गनै अछी पाइ केर सदिखन आँखि
खोलि
काजक बेरमे देखिऔ लागत औंघाइ
छै
मातल छै दिनोमे कैंचाक जोगारक
लेल
मंगनी बला काजकेँ पुछीऔ तँ
खौंझाइ छै
सटू किरानी बाबूसँ घूस केर
गप्प लेल
पाइ लैते अनर्गलो काज पूरा भ' जाइ छै
संत रहै छै सभ उपरसँ देखलापर
पकड़ेला पछातिये किओ चोर
कहाइत छै
आखर---16
11
ई दौड़ए नेतबा दिल्ली धरि
जेना भैंसी दौड़ै मालक थरि
खाँहिस तँ भरब जेबी छै
दूनू छोड़ए ने कोनो कसरि
बीत नापि क' हाथ गनाबए
छै एकल नापिक नै असरि
भरल पंचैती माथ झुकाबै
ई जान बचाबै कोना ससरि
बाँटै धरमकेँ दुनू मीलि क'
कूटि-चालि तँ जाइछ घोसरि
आखर---11
12
फाटैत छल जतए मेघ आ जमीन
पहुँचल पहिने ओतहि अभागल
बुझनुक बुझए सियार अपनाकेँ
जा धरि छल टिकल नीलमे राँगल
फँसि गेल अपनेसँ व्यूहमे
बेचारा
नै भेलै लाठी अपने ओकरा भाँजल
जत' शेर राज करै छल
पहिनेसँ
बुधियार छल ओ पहिनेसँ माँजल
सियार जा क' पढ़ौलक मंत्र जखन
प्रजा शेरसँ छल पहिनेसँ साधल
आखर---14
13
कसमकस सन जिनगी जीब कतेक दिन
इ कहू खूनक घोंट पीब कतेक दिन
भाइ जँ जीबाके अछी तँ जीबू
एना
देखू जेना जिबै छै माछ पानिक
बिन
14
जे चुबै छै ठोर-आँखिसँ ओकरा ताड़ी
बुझू
जँ पीतै केओ संसारमे तँ
बरबादी बुझू
आब तँ एहने बिआहक परिपाटी
बुझू
लिव-इन-रिलेशन वाली घरवाली बुझू
भाइ जेबीमे घुसल हाथक की
महत्व छै
तालसँ ताल मिलए तँ ओकरा ताली
बुझू
निराशा संग आशापर टिकल छै
दुनियाँ
जँ देखलहुँ भगजोगनी तँ दिवाली
बुझू
बहुतों अछी संसाधन देश-परदेशमे
मुन्ना अछी निकम्मा तँ ओकरा
मवाली बुझू
आखर-----16
15
जुग बीति गलै लगबैत जोगारमे
मुदा पता नै की लीखल छै
कपारमे
दिन बितेलौं दोस्तीए निमाहि
हम तँ
तैयो छल हत्यारा अपने भजारमे
भाइ जे काटैए गरदनि सदिखन
ओ माथा टेकैए मंदिर-मजारमे
हे एना नै चलू हाथ छोड़ि
बाटपर
बहि जाएब कहियो उन्टा बयारमे
जे बुझतै बितैत समय केर मोल
मुन्ना ओकरे दिन बिततै बहारमे
आखर-----14
16
आब कविता आ गीत नै गजल चाही
अपहर्ता चाँगुरसँ सकुशल चाही
ठोरक मुस्की बनल रखबाक लेल
धन आ जन सभहँक सबल चाही
जहिया धरि रहत पेट खाली सन
गीत आ संगीत नै पेटक अमल चाही
कते आश करू हुनकर मड़ैयाक
आब अपन बनाओल महल चाही
तकनीकी रुपें भ' रहल छी सबल
तँए इ भ्रष्ट व्यवस्था बदलल
चाही
आखर-----14
17
इ लोक कहैत हो किच्छो मुदा
एहन बात भेल छै
जाहि नगरसँ गेल बिहारी ओ
मसोमात भेल छै
आएल सुबुद्धि अपन श्रमकेर
बूझल महत्व
आब तँ अपनो राज्यमे विकासक
परात भेल छै
देखू जकरा नामपर माँगल गेलै
सुख-सुविधा
देशमे ओ बेचारा तँ बहुत दिनसँ
कात भेल छै
बोनिहार बिन अछी डुबल कतेको
कंपनी देशमे
आब बुझू जे सभ अहंकारीकेँ
पक्षाघात भेल छै
दोसरक बलें रहैए ओ बहुत कुदैत-फनैत
मुन्ना तँए साहित्यो ओकर बापक
जिरात भेल छै
आखर-----19
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
१
राजनाथ मिश्रचित्रमय मिथिला स्लाइड शो
चित्रमय मिथिला (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )
२.
उमेश मण्डलमिथिलाक वनस्पति स्लाइड शो
मिथिलाक जीव-जन्तु स्लाइड शो
मिथिलाक जिनगी स्लाइड शो
मिथिलाक वनस्पति/ मिथिलाक जीव जन्तु/ मिथिलाक जिनगी (https://sites.google.com/a/videha.com/videha-paintings-photos/ )
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विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ
मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली
अनुवाद धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
बालानां कृते
डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह” –
अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस
(21 फरबरीक अवसरि पर विशेष)
एक – आध महिना पहिनुक गप्प थिक ।
शीतलहरीक समय छल । साँझ खन दलान पर, लालटेमक ईजोत मे धिया
– पुता सभ पढ़ि रहल छल । सोझाँ मे घूर पजड़ल रहै आ सभ
बूढ़ – पुरान लोकनि घूर लग बैसल छलाह ।
रेडियो बाजि रहल छल, गप्प – सड़क्का
चलि रहल छल । धिया – पुताक मोन सेहो पढ़बा पर कम्मे आ घूर
लग बाजि रहल रेडियो आ चलि रहल गप – शप दिशि बेशी छल । एक तऽ
शीतलहरी, दोसर रतुका
भोजनक समय लगिचाएल आ तेसर सामने बजैत रेडियो आ गप्प सड़क्का – तखन तऽ स्वभाविकहि जे पढ़बा मे मोन कोना लगओ ? मोन मसोसि कऽ बैसल किताब दिशि ताकि रहल छल आ प्रतिक्षा मे छल जे
कोनहुना समय बीतय आ खएबाक लेल जएबाक अनुमति भेटओ ।
एतबहि मे हम आङ्गन
सँ दलान पर अयलहुँ । हमरा देखितहि धिया – पुता सभ केर मोन खुश । खुश होयबाक कारण ई जे आब ओकरो सभ केँ गप्प
मारबाक संवैधानिक अधिकार भेटैत बुझि पड़लै । जे लोकनि घूर लऽग बैसल रहथि से बहुत
पैघ, बहुत बुजुर्ग – तेँ पढ़ब
छाड़ि हुनिका सभ सँ बतिअएबाक मतलब छल डाँट सुनब । हुनिका सभक आशय जे जा धरि अङ्गना
जयबाक बिझो नञि भऽ जाय ता धरि किताब लऽ कऽ बैसल रहह ।
हमरा अबैत देखि कऽ
सोनी हमरा कुर्सी
दैत बाजलि – यौ बैसू ।
– की पढ़ैत
छी अहाँ सभ ? वस्तुस्थिति तऽ हमरा बुझाइए गेल छल तथापि हम
पूछल ।
- यौ की पढ़ब ? रेडियो सुनि रहल छी – से तऽ अहूँ केँ बुझाइए गेल होयत । प्रिया धीरे सँ बाजलि ।
पढ़बा छाड़ि कऽ
बतिआएब हमरो पसिन्न नञि पर बेमोन सँ किताब लऽ कऽ बैसबा सँ की लाभ ? इएह सोचैत हम पूछल – ई बात तऽ नीक नञि ?
केओ किछु नञि बाजल
आ चुपचाप हमरा दिशि ताकए लागल । हमरो बुझाएल जे एहि मे धिया – पुताक कोन दोष । नेनपन तऽ निर्दोष
होइत अछि, ओकर अप्पन कोनो दिशा नञि होइत छैक, जे दिशा देखाओल जाइछ तकर अनुसरण करैछ । दोष ओहि वातावरणक थिक जाहि मे
किछु लोकनि पढ़बाकेँ मात्र नित्य कर्म जेकाँ बुझैत छथि आ धिया – पुताक अध्ययन – अध्यापन केर प्रति एखनहु
लापरवाह छथि । ई स्थिति कोनो एक ठामक नञि अपितु मिथिला मे एखनहु एखनहु स्थिति एहि
दिशा मे बहुत असन्तोषप्रद अछि । अनायस मोन मे श्री अरविन्द कुमार “अक्कू”जीक गीतक दू पाँती याद आबि गेल
सखी पिया केँ पत्र आइ हम, कोना कऽ लिखबै हे ?
ककरा
सँ
अ
– आ – क – ख – ग – ङ सिखबै हे ?
...............................................................
पाँचे
बरष सँ फुलडाली लए, तोड़ब
सिखलहुँ फूल अरहूल ।
जानी ने हम चिट्ठी - पत्री, छी बेटी मिथिला केर मूल ।
जानी ने हम चिट्ठी - पत्री, छी बेटी मिथिला केर मूल ।
हलाकि आजुक स्थिति
उपरोक्त गीतक पाँती सन नञि अछि, पर बेशी किछु एखनहु नञि बदलल अछि । आन ठामक धिया – पुता केर पढ़बाक व पढ़एबाक तरीका परिस्कृत भेल अछि, ओ सभ एहि क्षेत्र मे सजग भेल अछि, ओहि ठाम
धिया – पुता नेनपनक आनन्द सेहो उठबैछ आ अपेक्षाकृत कम
मेहनति कऽ कऽ नीक शैक्षणिक स्तर केँ सेहो प्राप्त करैछ । अपना सन्दर्भ मे बात एकदम
उनटा । मैथिल धिया – पुता केर जे किछु उपलब्धि देखैत छी
से अपेक्षाकृत बेशी मेहनति कऽ कऽ आ नेनपनक बलिदान कएलाक उपरान्त भेटैछ । विशिष्ट
उपलब्धि – जेना कि आइ॰ ए॰ एस॰, आइ॰
पी॰ एस॰ आदि - केर सुची भलहि नम्हर हो पर मैथिल धिया – पुताक
औसत उपलब्धि बहुत असन्तोषजनक अछि । या तऽ नेनपनक पाछाँ शिक्षा हेराए जाइत अछि या
फेर शिक्षाक पाछाँ नेनपन, जखन कि आन ठामक धिया – पुता केँ दुहुक लाभ ओ सुख भेटैछ । आ गामक सन्दर्भ मे “धिया – पुता” कहाँ -
एखनहु मात्र “पुता” । “धिया” केर पढ़ाई तऽ बहुशः एखनहु ओहिना अछि –
हाँ चिट्ठी पढ़ि - जरूर लीखि आ पढ़ि सकैत छथि, पर ताहि सँ की ? एखनहु बहुधा स्थिति ओएह अछि,
ओएह मानसिकता कि धिया – पुता किताब लऽ
कऽ बैसल अछि, सामने फलतूक गप्प चलि रहल अछि, रेडियो बाजि रहल अछि ..........................। बियाह काल वर पक्ष पुछैत अछि कि कनिञा कते पढ़ल छथिन्ह तेँ नाँव लिखा
देने छियै, पास तऽ भइए जेतै .........................
। एखनहु कते घण्टा किताब लऽ कऽ बैसल से देखल जाइत अछि, की पढ़लक से नञि ।
- यौ एकटा चीज
पुछबाक अछि । सोनीक शब्द हमर मोनक विचार - प्रवाह केँ तोड़लक ।
- की ? पूछू । हम बजलहुँ ।
- ई “मातृभाषा दिवस” की होइत छै ?
- अहाँ केँ के कहलक
?
- नञि, रेडियो पर किछु बजैत छलै ।
- 21 फरवरी कऽ हर साल “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” (International Mother Language
Day) केर रूप मे मनाओल जाइत अछि ।
- से किएक ? पवन बाजल ।
- अहाँ सभ केँ तऽ
बुझलहि होयत कि जखन 15
अगस्त 1947 ई॰ कऽ जखन भारत स्वतन्त्र भेल तऽ भारत केर
विभाजन भेल आ पाकिस्तान नामक देश बनल ।
- हाँ । से तऽ सभ
केँ बुझल छै - सोनी
बाजलि ।
- ओहि समयक
पाकिस्तानक दू टा भाग छल पच्छिमी पाकिस्तान यानि कि आजुक “पाकिस्तान” आ
“पुरबी पाकिस्तान” अर्थात् आजुक “बाङ्गला देश” ।
- 21 मार्च 1948 ई॰ कऽ पाकिस्तानक तत्कालीन गवर्नर जनरल स्व॰ मोहम्मद अली जिन्ना जी
आदेश देलन्हि कि सम्पुर्ण पाकिस्तान केर राजकाजक एकमात्र भाषा होयत “उर्दू” ।
- जेना कि अपना देश
मे “हिन्दी” - पवन बाजल ।
- नञि पवन बाबू, अहाँक ई जानकारी गलत अछि । भारत एहि
परिप्रेक्ष्य मे थोड़ेक उदार नीति अपनओलक । भारत केर आठम अनुसुची मे मान्यता
प्राप्त हरेक भाषा राष्ट्रभाषा थिक आ नैतिक व संवैधानिक रूपेण समान अधिकार रखैछ ।
जा धरि “हिन्दी” केर लेल
सम्पुर्ण भारतवर्ष मे समान रूप सँ सहमति नञि होइछ ता धरि पूरा भारत मे “हिन्दी” आ “अंग्रेजी”
राजकाजक भाषा रहत । संगहि - संग आठम अनुसुची मे शामिल आन भाषा सभ
सेहो अपन – अपन क्षेत्र वा राज्यविशेष मे राजकाजक भाषा
रहत । जेना कि बंगाल मे बंगाली, महाराष्ट्र मे मराठी आ .............
- ............... आ मिथिला मे मैथिली ।
पवन बिच्चहि मे लोकैत बाजल ।
- हाँ । तऽ स्व॰
जिन्ना जी केर आदेश सँ तत्कालीन पच्छिमी पाकिस्तानक लोक सभ केँ खुशी भेलन्हि किएक
तऽ हुनिका लोकनि केँ उर्दू नीक जेकाँ अबैत छल । पर तत्कालीन पुरबी पाकिस्तानक लोक
क्षुब्ध भऽ उठलाह कारण हुनिका लोकनि केँ “बाङ्गला” केर अतिरिक्त आन भाषा वा उर्दू नञि
अबैत छलन्हि ।
- तऽ फेर की भेलै ? उत्सुकता भरल स्वरेँ प्रिया पुछलक ।
- फेर पुरबी पाकिस्तान
मे एहि प्रस्तावक भयंकर विरोध भेल । पुरबी पाकिस्तानक राजधानी ढाका मे छात्र लोकनि
शान्तिपुर्ण प्रदर्शन कएलन्हि आ बन्न आयोजित कयलन्हि । पर तत्कालीन पाकिस्तान
सरकार एहि विरोधक यथासम्भव दमण कएलक । 21
फरबरी 1952 ई॰ केर दिन शान्तिपुर्ण
प्रदर्शन कए रहल छात्र लोकनि पर गोली चलाओल गेल । बहुत लोकनि घायल भेलाह आ बहुतहु
प्राण गमओलाह । प्राण गमओनिहार आन्दोलनकारी छात्र लोकनि मे प्रमुख छलाह स्व॰
अब्दुर्सलीम, स्व॰ रफ़ीक़ उद्दीन अहमद, स्व॰ अब्दुल बर्कत आ स्व॰ अब्दुल ज़ब्बार ।
- ई तऽ जलियाँबाला
बाग जेकाँ काज भेल । पवन बाजल ।
- हाँ । बाङ्गला
देशक स्वतन्त्तताक बाद 21 फरबरी 1952 ई॰ केर दिन दिवंगत भेल सभ गोटेक
स्मरण चिन्हक रूप मे “ढाका विश्वविद्यालय” केर प्राङ्गन मे एक गोट स्मारकक निर्माण कराओल गेल, जकर नाँव थिक “शहीद मिनार” ।

चित्र १ – ढाका विश्वविद्यालय परिसर स्थित “शहीद मिनार”
(साभार सौजन्य – विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन)
- तऽ तहिये सँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस”
मनाओल जाय लागल । प्रिया बाजलि ।
- नञि । एतेक आसान
नञि छल । बहुतहि संघर्ष चलल । 26 मार्च 1971 ई॰ कऽ पुरबी पाकिस्तान अपना आप केँ
स्वतन्त्र घोषित कएलक पर पाकिस्तान सरकार केँ से मान्य नहि । अन्ततः 16 दिसम्बर 1971 ई॰ केर दिन युद्ध मे पुरबी
पाकिस्तान द्वारा पच्छिमी पाकिस्तान पराभूत भेल । पुरबी पाकिस्तान स्वतन्त्र देश बनल जकर नाँव
राखल गेल “बाङ्गला देश”
। यद्यपि फरबरी 1974 ई॰ मे पकिस्तान बाङ्गला देश केँ स्वतन्त्र देश मानलक तथापि 26 मार्च 1971 ई॰ केर दिन केँ “बाङ्गला देश” मे स्वाधीनता दिवस केर रूप मे मनाओल जाइत अछि ।
- हाँ 1971 ई॰ केर युद्धक चर्च हमर इतिहासक
किताब मे अछि । विकास बाजल ।
- बहुत बाद मे 17 नवम्बर 1999 ई॰ कऽ यूनेस्को (UNESCO; United Nations Educational, Scientific and
Cultural Organization) द्वारा 21 फरबरी केँ औपचारिक रूपेँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” केर रूप मे घोषित कएल गेल । आ ताहि दिन सँ हरेक वर्ष 21 फरबरी केर दिन “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” दिवस केर रूप
मे मनाओल जाइत अछि । एहि दिवस केँ मनएबाक मुख्य उद्देश्य भाषायी आ सांस्कृतिक
वैविध्य केँ संरक्षण करब आ बहुभाषिता (multilingualism)
केँ बढ़ायब थिक ।

चित्र २ – ऑस्फील्ड पार्क, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया स्थित “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस स्मारक”
(साभार सौजन्य – विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन)
- चलू, आइ बहुत नीक चीज बताओल अहाँ ।
प्रिया बाजलि ।
- हाँ, ओना तऽ हम सभ खाली किताब खोलि बैसल
रही आ घूर तऽरऽक गप्प पिबैत रही । अहाँ केँ अयला सँ किछु नऽव सीखल । सोनी बाजलि ।
- तऽ आब रतुका भोजन
केर लेल चली ? हम पूछल ।
- हँ ........ हँ .......... सभ धिया – पुता बाजल । आ हम सभ रतुका भोजनक
लेल आङ्गन दिशि विदा भेलहुँ ।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने)
सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’
ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे
वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले
स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ
लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन
करबाक थीक।
२.संध्या
काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले
स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे
शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल
भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर
स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक
काल-
रामं
स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः
स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ
दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४.
नहेबाक समय-
गङ्गे च
यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे
सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं
यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं
तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक
उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या
द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं
ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ
दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा
बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः
परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते
भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन
तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः
साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव
यन्यूधि शशिनः कला॥
९.
बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे
पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता
देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा
रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒
युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो
न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।
शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ
विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ
नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ
दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक
सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन
देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश
होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि
मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी
र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए
बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक
रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे
ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय
बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर
वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम
सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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