विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक:
उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा खेतानक हिन्दी उपन्यासक
सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ मैथिली
अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
४.
नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली
अनुवाद अनुवाद कर्ता
आशीष अनचिन्हार ५.प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली
अनुवाद
आशीष अनचिन्हार)
नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली
अनुवाद अनुवाद कर्ता
आशीष अनचिन्हार ५.प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली
अनुवाद
आशीष अनचिन्हार)
६.“रेहनपर रग्घू”-
श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
श्री विनीत उत्पल) ७.असगर
वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- 
श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
श्री विनीत उत्पल) ७.असगर
वजाहत- हम हिन्दू छी हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल द्वारा- 
४.
नित्यानंद गायेन केर दूटा हिंदी कविताक मैथिली
अनुवाद अनुवाद कर्ता
आशीष अनचिन्हार
१
हम नै चाहै छी अपना उपर संदेह
हमरा अहाँक माँझ
एहिना बनल रहए दूरी
अम अपन सफाइ दए क नै करए चाहैत छी
अपना उपर संदेह
आ ने अहीँकेँ करए चाहैत छी
बेइज्जत........
२
रौद पघलि रहल अछि
मनुख सुखा रहल अछि जरि कए
आ रौद पघलि रहल अछि------
राजा लूटि रहल
मंत्री सूति रहल
ओकील जागि रहल
विपक्ष नाचि रहल
कूकूर बाटपर भूकि रहल
"हम"
देखि रहल छी चुपचाप ई सभ।
५
प्रस्तुत अछि कुरानक मैथिली अनुवाद
अनुवाद कर्ता (
आशीष अनचिन्हार)
आशीष अनचिन्हार)
नोट-- ई अनुवाद मधुर संगम संदेश द्वारा अरबी-हिन्दी
कुरान पर आधारित अछि----
तँ शुरू करैत छी आइसँ कुरान केर मैथिली अनुवाद।
कुरानक पहिल अध्यायकेँ " अल-फातिहा" कहल जाइत
छै। एहि अध्यायमे सात टा आयत छै ( आयत मने श्लोक )। ई सातो आयत पैगम्बर मोहम्मद
मक्का नामक जगह पर कहला।
१) शुरू करै छी अल्लाह खुदा भगवानक नामसँ जे की एकमात्र
प्रशंसा केर हकदार छथि।
२) जे की बड़का कृपाशील आ दयावान छथि।
३) जे की रोजे-रजा ( बदला लेबए आ देबएकेँ ) मालिक छथि।
४) जिनकर हम सभ पूजा करैत छिअन्हि आ जिनकासँ मदति माँगै
छिअन्हि।
५) जे की हमरा सोझ आ सही बाटपर चलबा लेल प्रेरित करै
छथि।
६) ओहि लोकक बाट पर सेहो चलबाक लेल कहै छथि जे की खुदा
केर प्रिय छथि।
७) आ हुनका संग रहबा लेल सेहो प्रेरित करै छथि जे की ने
नीच छथि आ ने पथभ्रष्ट।
६.
“भरनार रग्घू”-
श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
श्री विनीत उत्पल)
श्री काशीनाथ सिंह (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
श्री विनीत उत्पल)
श्री काशीनाथ सिंह: जन्म:०१ जनवरी १९३७, कथा संग्रह: कहनी उपखान , उपन्यास- अपना मोर्चा , काशी का अस्सी, रेहन पर रग्घू । संस्मरण: घर का जोगी जोगड़ा , याद हो कि न याद हो ,
नाटक: घोआस
विनीत उत्पल:विनीत उत्पल
(जन्म: 7 अप्रैल, 1978, ननिहाल
पूर्णिया जिलाक सुखसेना गाममे)। पैत्रिक घर: आनंदपुरा, मधेपुरा।
प्रारंभिक शिक्षा मुंगेर जिला अंतर्गत रणग्राम आ तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर
विश्वविद्यालय, भागलपुर सँ गणित विषय मे बी.एस.सी.
(आनर्स), मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर। जामिया मिल्लिया
इस्लामिया, नई दिल्ली क हिंदी विभाग सँ जनसंचार आ रचनात्मक
लेखन मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली
सँ अंग्रेजी पत्रकारिता मे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय,
हिसार सँ जनसंचार मे मास्टर डिग्री। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,
नई दिल्ली क नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कानफ्लीक्ट रिजोल्यूलशन
क पहिल बैचक छात्र आ सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली सँ फ्रेंच भाषाक शिक्षा। छात्र जीवनमे रोट्रेक्ट क्लब,
भागलपुर (रोटरी इंटरनेशनलक युवा शाखा) सँ जुड़ल, कएकटा संबद्ध पत्र-पत्रिकाक संपादन। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,
नई दिल्लीक हिन्दी विभागमे अध्ययनक दौरान 'हमारी पहचान" नामक पाक्षिक समाचार पत्रक संपादक मंडलक सदस्य।
दिल्लीसँ प्रकाशित कएकटा राष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्रमे ग्रामीण विकासक खबरिक
विश्लेषण, हिन्दीक प्रचार-प्रसारमे केंद्रीय वित्त
मंत्रालयकेँ योगदानक अलावा गुजरात दंगामे अंग्रेजी आ गुजराती मीडियाक भूमिकापर
लघुशोध। हिन्दी, मैथिली, अंग्रेजी
भाषामे विपुल लेखन आ सुनीता नारायण, शशि थरूर, महेश रंगराजन आदिक लेख सभक अंग्रेजीसँ हिन्दीमे अनुवाद। वरिष्ठ पत्रकार
अरविंद मोहन द्वारा संपादित 'लोकतंत्र का नया लोक"
मे उपलब्ध द्वैपायन भट्टाचार्य, जी.कोटेश्वर प्रसाद आ
नलिनी रंजन मोहंतीक अंग्रेजी लेख सभक अनुवाद आ पुनर्लेखन। अनियमितकालीन कला पत्रिका
'कैनवास" मे समन्वय संपादक।मैथिली कविता संग्रह 'हम पुछैत छी" प्रकाशित।
साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत छथि।
साहित्य अकादमी सँ पुरस्कृत हिन्दीक वरिष्ठ कथाकार उदयप्रकाशक दीर्घ-कथा/ उपन्यास 'मोहनदास" क मैथिली अनुवाद।पत्रकार, लेखक, कवि आ अनुवादक विनीत उत्पल, दैनिक भास्कर, दिल्ली प्रेस, हिन्दुस्तान, देशबंधुमे पत्रकारिताक बाद आइ-काल्हि राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्लीमे वरिष्ठ उपसंपादकक पदपर कार्यरत छथि।
भरनापर रग्घू
(पछिला अंकसँ आगाँ)
अहाँक सीनियर सेहो, क्लासफेलो सेहो। मुदा बेटा भारी
संकटमे छी, अहीं उबारि सकै छी ऐ संकटसँ। पछिला बरख ई बाजल
छल जे बियाह करब तँ संजयसँ, नै तँ नै करब बियाह। अपना भीतर
नुकेने रहलौं ऐ गपकेँ। आइ बाजि रहल छी, सेहो ऐ दुआरे जे
फैसलाक घड़ी आबि गेल अछि। तीन-चारि मास आर अछि कैलिफोर्निया जेबामे। ऐ बीच बियाह
अछि, हवाइ टिकट अछि, पासपोर्ट
अछि, वीजा अछि, सभटा तैयारी अछि।
सोनल अमेरिका आ हनीमूनकेँ लऽ कऽ उत्साहित अछि।”
ओ आँखि पोछलक आ संजयकेँ देखलक।
“सभ बापक सपना होइ छै आ हमरो अछि। नै
हेतिऐ तँ सेंट्रो कार किए लैतिऐ? अपना लेल फिएट तँ छेबे
करल। नव घर गृहस्तीक समान किए जुटैबितिऐ? अहाँक नग्रमे
एकटा कॉलोनी अछि अशोक विहार। ओइमे एकटा छोट सन बंगला बनबैले छी। सभ किछु कम्प्लीट
अछि। बस फिनिशिंग टा बाकी अछि। सोचले रही जे एतऽसँ रिटायर करब तँ काशीवास करब। सभ लोक
यएह चाहै छै। अहाँक पापा-मम्मी सेहो चहैत होएत। मुदा सोचैत छी जे काल्हि सोनल
विश्वविद्यालयमे ज्वाइन करत तँ कतए रहत? हमर तँ सभटा जीवन
राँचीमे बीतल, सभटा दोस्त-मित्र, सर-सम्बन्धी एतए अछि। ओतऽ जा कऽ की करब? तइसँ
बंगला ओकरे नाम कऽ रहल छी।”
संजय चिन्तित भेल। ओकर आँखिमे पापा-मम्मीक
चेहरा घूमि रहल छलै। ओकरा लागि रहल छलै जे ओ हुनका हँ करैमे जल्दी कऽ देने छल।
बाजल “बड देर कऽ देलौं
सर सोनलक बात बताबैमे।”
“देर सबेर किछु नै होइत अछि संजू,
सभ चीजक बेर होइ छै। आब यएह देखू, हमर
साढ़ू प्रोफेसर अस्थानाकेँ बनारस मे एहने घड़ीपर कुलपति किए हाँकि देने छल जखन सोनल
थीसिस जमा कऽ रहल छलि?”
ओ सिगरेट जरेलक- “ओना तँ सिगरेट मना अछि मुदा कहियो
काल एकाध सोंटा लऽ लैत छी। तँ अहाँक पापा। हुनकर परेशानी बुझि सकैत छी। कहैत रहल
छी हुनका लऽ कऽ। छोट भाइ अछि अहींक। पछिला तीन-चारि बर्खसँ कैट-मैट परीक्षा दऽ रहल
अछि। लोक सेवा आयोगक परीक्षा दऽ रहल अछि। आ कोनोमे नै आबि रहल अछि- ओकर परेशानी।
गप आएल बीचमे तैं, परेशान भऽ कऽ किछु कऽ नै लिअए तेँ ओइसँ
पहिने कोनो मैनेजमेन्ट इन्स्टीट्यूटमे नामांकन करा दियौ। एना नै तँ डोनेशन दऽ कऽ।
ऐं यौ, कत्ते लागत? डेढ़ लाख,
दू लाख, आर की? अहाँ बतेने छलौं जे अहाँक पढ़ाइ लेल ऋण लेल गेल छल आ खेत सेहो भरनापर
राखल अछि। ऐ सभ परेशानीसँ बहार होइले कतेक जरूरति हएत हुनका? हुनकासँ गप कऽ कए तँ देखू। की चाहैत छथिन ओ। देखू, बरियाती, धूम-धरक्का, गाजा-बाजा ई सभ फुसियाहींक बखेरा छी। कोनो जरूरति नै अछि देखावटी
व्यवहार आ तमाशाक। बियाह लेल कोर्ट अछि आ दोस महीम लेल एकटा स्वागत समारोह राखि
देबै। ई हम कऽ देब, फेर? ओना
एकटा गप बता दै छी, जेहेन कम्पनी आ जेहेन शर्तपर अमेरिका
जेबाक अछि ओइसँ तीन बरखमे कियो एते कमा लेत जे जौँ ओकर बाप चाहै तँ गामक गाम कीनि
लेत। बुझलौं?”
“प्रश्न ई नै अछि सर। पिताजी कने
लोक-लाज आ जाति-पातिमे विश्वास करऽबला पुरान ढङक लोक छथिन।”
सक्सेना गम्भीर भऽ गेला। कनी काल धरि चुप
रहलखिन। ऐ बीच सोनल साड़ीमे आएल। खाइक लेल बजाबैक लेल।
“देखू संजू। लॉ ऑफ ग्रेविटेशनक निअम
गाछ आ फड़ धरि लेल मात्र लागू नै होइत अछि। मनुक्खक सम्बन्धपर सेहो लागू होइत अछि।
सभ बेटा-बेटीक माँ-बाप पृथ्वी अछि। बेटा ऊपर जाइले चाहैत अछि आर ऊपर, कनिक आर ऊपर तँ माँ-बाप अपन आकर्षणसँ ओकरा घिचैत अछि। आकर्षण संस्कार
भऽ सकैत अछि आ प्रेम सेहो, माया-मोह सेहो। मंशा गिराबैक
नै होइत अछि। मुदा खसा दैत अछि। जँ हम अपन बापक सुनने हेतिऐ तँ हेतमपुरमे पटवारी
बनि गेल हेतिऐ। तँ ई अछि। हमरा जे कहबाक रहए, से कहि
देलौं। अहाँकेँ जे नीक लगैत अछि से करू। हँ, जाइसँ पहिने
सोनलसँ गप कऽ लेब।”
४
जुलाइमे बियाह भऽ गेल चिरंजीवी संजय आ सोनलक
कोर्टमे।
नहिये बरियाती आ नहिये बाजा-गाजा।
प्रीतिभोजक लेल नोत आएल छल, रघुनाथक नामसँ सेहो। मुदा ओ नै
गेला।
एहेन चोट लागल छल रघुनाथ आ शीलाकेँ जे ओ
दोसरकेँ नै देखा सकैत छल आ नहिये ककरोसँ नुका सकै छल। एहेन ठामपर जाएब ओ बन्द कऽ
देने छल जतऽ दू-चारि गोटे जुमैत होथि। ओ मानि लेने छल जे दू बेटामे एकटा बेटा मरि
गेल। जखन माए-बापक प्रतिष्ठाक ओकरा चिन्ते नै तँ मरले बुझू।सितम्बरमे ओ अमेरिका
जाए आकि नर्क, ऐसँ ओकरा
कोनो सरोकार नै।
ऐ घड़ी लेल ओ ओकरा पालने-पोसने छल, पढ़ेने-लिखेने छल, गाछ कटने छल, कर्ज लेने छल, भरनापर खेत देने छल, आ दुनिया भरिक तगेदा
सुनने छल?
हुनकर लाख मना केलाक बादो राजू गेल छल, रामू माने संजयक भाए धनंजय, घुरल तँ ओकरा हाथमे एकटा ब्रीफकेश छल जे रघुनाथ लेल सक्सेना पठेने छल।
रघुनाथ कॉलेजक तैयारी कऽ रहल छल। कुमोनसँ
ब्रीफकेश दिश देखलक आ बाजल- “राखि दियौ।”
“ऐं, एना
कोना राखि दी। अप्पन संदूकमे राखू।”
बाबा जमानाक सन्दूकमे की कहाँ राखै छल
रघुनाथ आ ओकर चाभी ओ ककरो नै दै छल। बिना किछु बजने ओ चाभी ओकरा दिश फेकि
देलक।राजू ब्रीफकेशकेँ संदूकमे राखि चाभी घुरा देलक आ बाजल, “आर किछु नै पुछब?”
शीला उदास मोनसँ दरबज्जापर ठाढ़ि छल, भीतर चलि गेलि।
“अहाँ सभ तँ एना गुम्म छी जेना कोनो
बिपति आबि गेल”, राजू हँसैत माँक पाछाँ भीतर चलि गेल। “कनियाँ एहेन जे लाखमे एक। माँ अहाँ चिन्ता नै करू। सभ किछु करत ओ जे
संजय बाजैत छल। हाथ-पएर जाँतत, मुँह दबाएत, बर्तन माँजत, बाढ़नि लगाएत, खेनाइ बनाएत, जे जे चाहत से सभ किछु करत। कनी
अमेरिकासँ घुरिकऽ आबऽ तँ दियौ। अखन हनीमूनपर जा रहल अछि दार्जिलिंग, ओतएसँ दमदम हवाइ अड्डा, फेर ओतएसँ अमेरिका।
बचि गेलौं अहाँ, जँ गेल रहितिऐ तँ मुँह देखाइ देबऽ
पड़ितिऐ। ई लिअ, अहाँले फोटो पठेलक अछि स्वागत समारोहक…।”
राजू नै जानि की-की बजैत रहल, ओ सुनितो रहल, नहियो सुनैत रहल।
दुनू गोटेक फोटो ओतए पड़ल रहल जतऽ ओ बैसल छल।
एकटा मन कहि रहल छल, “देखी”,
दोसर कहि रहल छल, “छोड़ू, जाए दियौ”।
सभटा सख धरले रहि गेल।
राति भऽ गेल छल।
गाममे सनाटा पसरि गेल छल।
एक दिन पहिनहिये खूब बरखा बुन्नी भेल छल।
हरियरी पसरि गेल छल। झिंगुरक अबाज गामकेँ गनगनेने छल। मेघ घटाटोप केने छल। दूर
अकाशमे बिजलौका लौकै छल। ओम्हर कतौ पानि पड़ल हेतै, एम्हर नै भेल।
रघुनाथक घर दुआर गामक बाहरी इलाकामे छल। घरक
अगुलका हिस्सा दुआर पछुलका घर। दुआरक माने दलान आ बरण्डा। ऐ बरण्डामे सुतै छल
रघुनाथ आ राजू। राजूक सुतलाक बाद रघुनाथ आध रातिमे नुका कऽ भीतर गेल, ढिबरी लेसलक आ सन्दूकसँ ब्रीफकेश
निकाललक। जखन ओ ढिबरी आ ब्रीफकेश लऽ कऽ शीलाक बगलबला कोठली गेल तँ ओकरा मोन पड़लै
जे ब्रीफकेशक चाभी तँ राजू देबे नै केलक। ओ रकमसँ राजूकेँ जगेलक। राजू बतेलक जे
ब्रीफकेश चाभीसँ नै नम्बरसँ खुजत, ऐ नम्बरसँ। आ बड़-बड़
करैत ब्रीफकेश खुजि गेल। रघुनाथ ब्रीफकेशकेँ खोललक तँ भाव-विभोर। बेटा संजयकेँ लऽ
कऽ जत्ते तामस रहै सभ टा बिला गेलै। टाकाक एतेक गड्डी अपन आँखिक सोझाँ एकटा
ब्रीफकेशमे ओ पहिल बेर देखि रहल छल। आ ई कोनो सिनेमा नै वास्तविकता छलै।
गामक लोक रघुनाथकेँ झगड़ा-झंझटिसँ दूर रहैबला
मुदा कंजूसक श्रेणीमे गनती करै छल जे टाकामे अठन्नी भजबैत अछि। लोक ईहो कहै छल जे
बड्ड लोभ नै केने रहितिऐ तँ ई दिन नै देखऽ पड़ितिऐ।
रघुनाथ ब्रिन्चकेँ अपना दिस घिचलक। पहिने
सए-सएक गड्डी गननाइ शुरू केलक। ओ एक-एक बण्डलक संख्या सेहो लिखि रहल छल। फेर ओ
पाँच-पाँच सएक नोटक गड्डी उठा कऽ गनब आ लिखब शुरू केलक। गनैत-गनैत राति बेशी भऽ
गेल आ सभटा रुपैयाक जोड़ भेल चारि लाख साठि हजार।
हुनकर हअदय काँपल, जँ गनैयोमे गलती भेल हएत तँ एतेक
टाका कोना? ओ उठि गेल आ सन्दूकमे झोंकि फेर आनि लेलक।
घुरतीमे भंसाघरसँ कटोरामे पानि लऽ रहल छल तँ शीला जागि गेल। अंगुर भिजा-भिजा कऽ
फेरसँ टका गनलक मुदा फेर वएह चारि आ साठि।
ओ माथ पकड़ि बैसि गेल।
“कोन गप अछि?”, शीला पुछलक।
“पाँच लाखमे कम अछि चालीस हजार,
कियो सन्दूक तँ नै खोलने छल?”
“चाभी तँ अहीं लग छल, खोलत के?”
“कियो आर तँ नै आएल छल घरमे?”
“अहाँ आ राजू आएल छलौं, आर तँ कियो नै।”
कनी कालक बाद ओ नै जानि की सोचि कऽ उठल आ
राजूकेँ जगा कऽ लऽ अनलक। राजू आँखि मिड़ैत आएल।
“ब्रीफकेश के देने छल अहाँकेँ,
संजू आकि सक्सेना?”
“किए? की गप
अछि?”
“बताउ, कम
अछि पाँच लाखमे?”
राजू हँसल, “मंगनीक बाछीक दाँत नै गानल जाइ छै। संतोष करू, जत्ते भेटि गेल से मंगनीमे, सएह बुझू।”
ओ एकटक राजूकेँ देखैत रहल, “अहाँ तँ किछु एम्हर-ओम्हर नै केने
छी?”
“हम जनै छलौं जे यएह शक करब अहाँ,
अहाँ स्वभावेसँ शक्की छी।”
“चुप्प”, शीला
बाजलि, “अहिना बापसँ गप्प कएल जाइ छै?”
“बुझि गेलौं, यएह चोरेलक अछि। बतेलक नै।”
“पहिने बुझि जेबाक चाही। चोरा कतौ
बतबै छै जे चोरि वएह केने अछि”, राजू बाजल।
रघुनाथ आश्चर्यसँ देखलक ओकरादिस, “की भऽ गेल छै ऐ छौड़ाकेँ। एकर भाए
कम्प्यूटर अभियन्ता। ओ ऐ तरहेँ कहियो गप नै केने अछि बापसँ।”
“गप्प नै केलक, तेँ अस्थिरेसँ चुपचाप बियाह कऽ लेलक आ बापकेँ खबरि धरि नै केलक।”
झनझना उठल गुस्सा सं रघुनाथ। मन भेल-ओकरा घर सं निकलि
जायैक कहियै मुदा नहि जानि की सोचहि के ओतय सं उठल आ आंगन मे आबि गेल। कोना मे
बंसखट पड़ल छल, ओहि पर
बैसि गेल। ओ भगवानक लेल माथ उठैलक आसमान दिस।
'देखू मां, हम डेढ़ बरख सं कहि
रहल छलहुं हिनका सं जे मोटरबाइक दऽ दियौ। घरानाक सभ छौड़ा लग अछि, एकटा हमहीं छी जकरा लग नहि अछि। हिनकर कहब छल जे हाथ-पाइर तोड़बाक अछि
की? माथ फोड़बाक अछि की? चोरी-चकारी
आ लफंगई करबाक अछि की? डाका डलबाक अछि की? केकर हाथ-पइर टूटल अछि, कहू ते? ते संजू हमरा सं पुछलक-'अहां के की चाहि?
जखैन हम ओतय सं घुरहि लागलहुं। हम कहलहुं-'हां, मोटरबाइक। ओ हमरा टका थमा देलक। ओ
ब्राीफकेस मे सं देलक या कतय सं देलक हमरा नहि पता।"
'सरासर झूठ। ई जानैत अछि जे संजय आब नहि आबय बला अछि। हम
नहि पूछि सकब ओकरा सं।" रघुनाथ के ई झूठ बर्दाश्त नहि भेल।
शीला ठाढ़-ठाढ़ डिबरीक मद्धिम रोशनी मे कानि रहल छलि। ओ
अप्पन बेटाक अहि रूप सं अनजान छलि।
'आैर कहू। हमर बापजानक दूटा बेटा-संजू आ हम। ई एक्को आंखि
सं हमरा देखलक तक नहि। सभटा मेहनत आ सभटा पाय ई ओकरे पर खर्च करलखिन। पढ़ैलक,
लिखैलक, कंप्यूटर इंजीनियर बनैलक आ हमरा
लेल। कामर्स पढ़ू। जकरा पढ़हि मे नहि ते मदद कऽ सकैत छल, नहि
हमरा मन लागैत छल। कोनो तरहे बीकाम करलहुं ते कोचिंग करू, ई टेस्ट दियौ, ओ टेस्ट दियौ। हम थाकि गेल छी
टेस्ट दैत-दैत। हिनका सं कहियौ, ई टका कत्तौ इमढ़-उमढ़ खर्च
नहि करैथ, डोनेशन लेल राख्ौथ। बिना डोनेशन कत्तौ एडमिशन
नहि हय बला छै। परछा के बता दैत छी।"
'जौं डोनेशनक टका नहि देब तऽ?"
'ते कहियौ नहि पूछब जे ई की कऽ रहल छी?"'कियअ कऽ रहल छी?"
'की करब? डाका डालब? तस्करी करब? गांजा हेरोइन बेचब? कत्ल करब?"
की बक-बक कऽ रहल छी अहां? फालतू? झमाइर के शीला बाजल,
'आओर अहां चुप रहू। अनाप-शनाप कहि रहल छी बाप सें।"
राजू कमरा सं बाहर निकलैत पिता सं बाजल, 'बस कहि देलहुं।"
'सुनू-सुनू। भागू नहि। अपना लऽ कऽ सोचैत छी आ कहियौ अप्पन
बहिन कऽ लऽ कऽ सोचने छी? जखैन होयत अछि तखन जाइत छी हजार
पांच सौ मारि के आबि जायत छी ओकरा सं? ओकर ब्याह कऽ लऽ कऽ
कखनो सोचैत छी?"
'देखि रहल छी हिनकर?" ओ मां
दिस मुड़ल, 'जकरा सं कहबाक छल, ओकरा
सं नहि कहलल, कहि हमरा सं रहल अछि, जे एखन पढ़ि रहल अछि। डोनेशनक गप आयल ते दीदीक ख्याल आबि रहल अछि। पहिले
हिनका सं कहियौक जे कंजूसी आ दरिद्रता छोड़ैक आब। हंसी उड़ाबैत अछि लोक। ई ढिबरी आ
लालटेन छोड़य आ आन जना तार खींचवांके-कम से कम आंगन आ दरवाजा पर लट्टू ते लगवाय
लियै। इजोत हुयै घर मे। एकर संगे फोन लगा रहल अछि लोक। घर मे फोन होयत ते संजू जखन
चाहत, गप कऽ लेत। अहां सरला दीदी सं गप कऽ लेब। दीदी से
टा किया भौजी सं सेहो।"
माथा फोड़ैत फेर सं बैस गेल रघुनाथ-'यहि छी भाग्य। जकरा लेल कंजूसी
करलहुं, ैओकरे मुंह से ई सुनबाक छल।"
'आओर एकटा गप कहि दैत छी अहां से आओर हिनको सं। फेर एहन
बेवकूफी नहि करैथ जेहन संजूक काल मे कइलय अछि। दीदी से परछा के गप कऽ लहुं चे ओ
हिनकर तय करल सं ब्याह करत या नहि। ई ते दौड़-भाग कऽ कत्तौ तय कऽ अइथिन आ ओ कहि
दियै जे हमरा ब्याह नहि करबाक अछि। फेर भद पिटत हिनकर।"
'ई अहां कोनो कहि सकैत छी।"
'कियैकि हम एकटा आदमी के अकसर हुनका संग देखनी छी। के छी
ओ, नहि जानैत छी।"
'देखलियै नै? एकरा शरम धरि टा
नहि अछि बहिन कऽ लऽ के अहि तरहे गप करैत?" रघुनाथ
दांत पीसैत ओतय सं बाजल।
५
सरला दुविधा मे छल-ब्याह
करि आ नहि करि?
पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नहि करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत।
कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे!
आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नहि छूटहि छल।
अहिना मे नहि जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल।
कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नहि युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नहि छल। नहि कोनो खतरा, नहि कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नहि छल।
कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नहि सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ।
सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नहि। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नहि छल, जतय हुनका कियो नहि जानैत हुयै।
निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ।
प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नहि अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन!
सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो।
जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नहि सकल नीक सं। नींद नहि आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नहि बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि...
एखन नहि जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नहि, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल?
कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नहि, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नहि, विद्वान अछि।
कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नहि हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नहि बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नहि हुयै ओहि दिन!
अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नहि, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नहि!
मनु श्रद्धा सं देखलक!
श्रद्धा मनु के देखलक!
दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नहि, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल।
ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।"
स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी!
ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नहि!"
ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल।
अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक।
चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!"
कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक!
'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे!
पक्का एतबेक टा छल जे ओकरा ओ ब्याह नहि करबाक अछि जे पापा खोजि के आनत।
कतेक रास लोचा छल ओकर दुविधा मे!
आजुक सं कोनो सात-आठ बरख पहिने। ओ अपना भीतर किछु अजब-सन महसूस केने छळ-मन उखड़ल रहैत छल, कत्तौ हरायल-हरायल सन छल, बिना गप्पक हंसी आबैत छल, हरदम गुनगुनाबैक जी चाहैत छल, बाहर आबैत छल, ते दोस्तनी सब हंस के कहय लागल छल-देखू-देखू। पैरक चप्पल-दू डिजाइनक। क्लास कहानी के, किताब कविताक हाथ मे। ई वहि दिन छल जखन नगर मे आबि बला कोनो फिल्म ओकरा सं नहि छूटहि छल।
अहिना मे नहि जानि कोना कौशिक सर नुका के आयल आ ओकर दिल मे आबि के बैसि गेल।
कौशिक सर कविताक अध्यापक। बड़ गंभीर आ चुप रहि बला आ सिद्धांतवादी। पातर-दुबर, नमर गर आ देखहि मे आकर्षक। अधेड़ आ तीन नेना नहि युवाक पिता? अद्भुत 'सेंस ऑफ ह्यूमर"क मालिक। हुनका सं प्रेम करहि मे कोनो खतरा नहि छल। नहि कोनो खतरा, नहि कोनो तरहक संदेह। ओ बड़ बुधियारी आ विवेक सं काज लेने छल अप्पन 'ब्वायफ्रेंड" चुनहि मे। छौड़ा-छौड़ीक 'गॉसिप"क डर सेहो नहि छल।
कौशिक सर कृतज्ञ आ अभिभूत छल। मिज्झर होयत जिनगीक अंतिम प्यार। सेहो सरला जेहन सुनर छौड़ी सं। पचास-पचपनक उमर मे ते कियो सोचहि नहि सकैत अछि, एहन भाग्यक लऽ कऽ।
सरलाक मन बेचैन छल, देह सेहो। बस प्रेमक गप आ तड़प। आर किछु नहि। सऽ ते ओकर सहेलीक संग भऽ रहल छल। किछु ्ते अलग हुयै-कौशिक सर कोनो विद्यार्थी थोड़े अछि। अहिने इच्छा कौशिक सर के सेहो छल मुदा नगर मे कत्तौ एहन ठाम नहि छल, जतय हुनका कियो नहि जानैत हुयै।
निश्चित भेल जे कौशिक सर एक दिन टैक्सी सं 'अमुक ठाम" पहुंचत, ओतय सं सरला के 'पिकअप" करत आर दू-चारि घंटाक लेल सारनाथ। फेर सोचल जायत 'एकांत" आ 'निर्जन"क लऽ कऽ।
प्रेम बंद आ सुरक्षित कोठलीक चीज नहि अछि। खतरा सं खेलहिक नाम अछि प्रेम। लोकक भीड़ सं बचाबैत, हुनका धत्ता बताबैत, हुनकर नजरि के चकमा दैत जे करल जायत अछि-ओ अछि प्रेम। ब्याह से पहिने यहि चाहैत छल सरला। ब्याहक बाद ते ओ विश्वासघात होयत, व्याभिचार होयत, अनैतिक होयत। जे करबाक अछि, पहिने कऽ लियअ। अनुभव कऽ लिअ एक बेर। मर्दक स्वाद! एकटा एडवैंचर! जस्ट फॉर फन!
सरला रोमांचित छल। नर्वस छल आ उत्तेजित सेहो।
जहि दिन जैबाक छल ओकरा सं पहिलुक राति। ओ सुति नहि सकल नीक सं। नींद नहि आबि रहल छल। कतेक रास गप, कतेक रासक ख्याल, कतेक रासक गुदगुदी। अपने सं लजाबैत छल, अपने आप हंसैत छल। ओ सोच लेने छल जे अवसर भेटय पर एत्ते आगू नहि बढ़हिक दैक अछि कौशिक सर के जे ओ ओकरा गलत बुझि लियअ। ई ते शुरुआत अछि...
एखन नहि जानि कतेक मुलाकात बाकी अछि। नहि, आबि कतय मुलाकात? 'फेयरवेल" भऽ चुकल अछि। दू-चारि दिन आर चलि सकैत अछि क्लास, ओकर बाद ते इम्तहान! फेर कतय संभव अछि भेंट? कोन बहाना रहत भेंट करबाक लेल?
कौशिक सर लोकप्रिय लोक छल! विश्वविद्यालयक नहि, नगरक सेहो! जानहि बला बड़ छल। तरह-तरहक लोक! अहि बातक गर्व छल सरला के जे ओ जेकरा सं प्यार करैत छल, ओ कियो सीटी बजाबहि बला, लाइन मारहि बला सड़क छाप विद्यार्थी नहि, विद्वान अछि।
कौशिक सर बड़ सावधानी बरतलक-ओ छुट्टीक दिन नहि हुयै, स्कूल-कॉलेज खुजल हुयै, कियैकि छौड़ा-छौड़ी पढ़हि मे आ अध्यापक पढ़ाबै मे व्यस्त हुयै, पिकनिक आ भ्रमणक कार्यक्रम नहि बनाबै, सारनाथक मेला सेहो नहि हुयै ओहि दिन!
अहि सावधानीक संग कौशिक सर सरलाक संग टैक्सी सं पहंुचल चौखंडी स्तूप! सारनाथ से पहले! सड़कक कात पहाड़ीनुमा ढूडक ऊपर खंडहर जेहन टूटल-फूटल स्तूप! ठाड़ भऽ जाऊ ते पूरा सारनाथ ते नहि, दूर-दूर धरि गाम गिरावं आर बाग-बगीचा नजर आयत। खाली पड़ल छल स्तूप! नीचा चौकीदार, सिपाही, माली अप्पन-अप्पन काज मे लागल छल। एकदम निर्जन असगर ठाढ़ छल स्तूप! 'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर" के तरहे। कियो दर्शनार्थी नहि!
मनु श्रद्धा सं देखलक!
श्रद्धा मनु के देखलक!
दूनू टैक्सी सड़कक कात मे ठाढ़ करलक आ चलि पड़ल। घुमावदार बाट से चक्कर काटैत। आगा-पाछां नहि, अगल-बगल। संगे-संग। हाथ मे हाथ लेल! सरला असगरे मे कौशिक सर के 'मीतू" कहैत छल। ओहि दिन ओ सत मे मीतू भऽ गेल छल। सरला-जे सदिखन समीज सलवार आ दुपट्टा मे रहैत छल-ओ सरला हरका बार्डरक बासंती साड़ी मे गजब ढ़ा रहल छल। बार्डरक रंगक साड़ी सं मैच करैत ब्लाउज आर माथ पर छोट-सन लाल बिन्दी! हवा उड़ायल जा रहल छल आंचल के, जकरा ओ बेर-बेर संभारि रहल छल।
ओ चढ़ाय खत्म कऽ स्तूपक लग पहुंचल आ चारो दिस देखलक-दूनूक मुंह सं एक संग निकलल-'जेहन अछोर, अनंत, असीम हरियालीक समुद्र"। आर ओहि मे पीयर फुलल तोड़ीक जतय-ततय खेत--एहन लागि रहल छल जेहन पाल बाली हिलैत-डुलैत डोंगी! 'आ हम?" सरला पुछलक! कौशिक सर मुस्कुरायल! बाजल-'मस्तूल बला बड़ पैग जहाज के डेक पर।"
स्तूप के अहि धरि छांह छल आ ओहि धरि कुनकुनी रौद! छांह नम्हर होयत ओतय धरि चलि गेल छल, जतय माली काज कऽ रहल छल। ओ ओहि कात गेल रौद मे, जिम्हर समुद्र छल आ हिलैत-डुलैत पीयर डोंगी!
ओ स्तूप से सटल साफ-सुथर ठाम पर बैसि गेल-चुपचाप! ओ चुप छल मुदा हुनकर दिल बाजि रहल छल-अपने आप सं, आर एक-दोसर सं सेहो! हुनका लग की रहि गेल छल कहैक-सुनैक लेल? डेढ़ बरख सं यहि ते भऽ रहल छल-गप, गप आर गप्पे टा! गप सं ओ थाकि गेल छल आ मन सेहो ऊबि गेल छल। सरला बगल मे बैसल लगातार कौशिक सर दिस देखहि जा रहल छल आ ओ देखहि के देखैत दुबरी ने नोचि रहल छल। फेर एकाटक दिलीप कुमार स्टाइल मे मुस्कुरा के बाजल-ऊं! की कहलियै! हंसैत सरला अप्पन सिर हुनकर कान्हा पर राखि देलक-'बड़ रास गप? सुनहुं तखैन नहि!"
ओ दिल, जे आबि धरि खंडहरक पाछां गुटर गूं कऽ रहल छल, कुकड़ू कूं करहि लागल छल भरि दुपहरिया मे! कौशिक सर सरलाक पीठक पाछां सं हाथ बढ़ाके ओकर सुडौल गोलाई मसैल देलक! सरलाक पूरा बदन मे एकटा झुरझरी भेल आ ओ शरमाबैत हुनकर कोरा मे ढहि गेल।
अबकी बेर कौशिक सर कनि जोर सं मसललक।
चिहंुक कर सीत्कार कऽ उठल सरला आ आंखि बंद कऽ लेलक-'जंगलियै छियै की!"
कौशिक सर माथ सं लिबा के ओकर आंखि के चूमि लेलक!
'ई की भऽ रहल अछि चचा?" अचानके एकटा कड़कड़ाती आवाज आ आगू सं ठाड़ ऐतिहासिक धरोहरक पहरेदार आ सिपाही खाकी बर्दी मे!
(जारी….)
७.
असगर वजाहत- हम हिन्दू छी
हिन्दी कथाक मैथिली रूपान्तरण विनीत उत्पल
द्वारा

हम हिन्दू छी (लघु कथा)
एहेन कन्नारोहट जे
मुर्दो कब्रमे ठाढ़ भऽ जाए। लागल जे अबाज सोझे कान लगसँ आएल अछि। ओइ स्थितिमे.. हम
कूदि कऽ बिछौनपर बैसि गेलौं,
अकासमे अखनो तरेगन छल.. किंशाइत रातिक तीन बाजल हएत। अब्बोजान उठि
कऽ बैसि गेला। कन्नारोहट फेरसँ सुनाइ पड़ल। सैफ अपन अखड़ा खाटपर पड़ल चिकड़ि रहल छल।
अंगनामे एक दिससँ सभक खाट लागल छलै।'लाहौलविलाकुव्वत. . .' अब्बाजान लाहौल पढ़लन्हि 'खुदा नै जानि ई किए सुतलेमे किए चित्कार करऽ लगैए।' अम्मा बजली। 'अम्मा एकरा राति भरि छौड़ा सभ डरबैत रहै छै. . .' हम कहलिऐ। 'ओइ सरधुआ सभकेँ सेहो चेन नै पड़ै छै. . .लोक सभक जान आफदमे छै आ ओकरा सभकेँ बदमाशी सुझाइ छै', अम्मा बजली।
सफिया चद्दरिसँ मुँह बहार कऽ बाजलि, 'एकरा कहू छतपर सुतल करए।' सैफ अखन धरि नै जागल छल। हम ओकर पलंग लग गेलौं आ झुकि कऽ देखलौं जे ओकर मुँहपर घाम छलै। साँस खूब चलि रहल छलै आ देह थरथरा रहल छलै। केस घामसँ भीजल छलै आ किछु केस माथपर सटि गेल छलै। हम सैफकेँ देखैत रहलौं आ ओइ छौड़ा सभक प्रति मोनमे तामस घुरमैत रहल जे ओकरा डराबैए।
तखन दंगा एहेन नै होइत छल जेहेन आइ काल्हि होइए। दंगाक पाछाँ नुकाएल दर्शन, ईलम, काजक पद्धति आ गतिमे ढेर रास बदलेन आएल अछि। आइसँ पच्चीस-तीस साल पहिने नहिये लोककेँ जिबिते भकसी झोका कऽ मारल जाइ छलै आ नहिये सौंसे टोल-मोहल्लाकेँ सुनसान कएल जाइत छलै। ओइ जमानामे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आ मुख्यमंत्रीक आशीर्वाद सेहो दंगा करैबलाकेँ नै भेटै छलै। ई काज छोट-मोट स्थानीय नेता अपन स्थानीय आ क्षुद्र स्वार्थ पूरा करै लेल करै छला। व्यापारिक प्रतिद्वंद्व, जमीनपर कब्जा करैले, चुंगीक चुनावमे हिंदू वा मुस्लिम वोट समटैले इत्यादि उद्देश्य भेल करै छल। आब तँ दिल्ली दरबारपर कब्जा करबाक ई साधन बनि गेल अछि। सांप्रदायिक दंगा। संसारक सभसँ पैघ लोकतंत्रक मुँमे जाबी वएह पहिरा सकैए जे सांप्रदायिक हिंसा आ घृणापर शोनितक धार बहा सकए।
सैफकेँ जगाएल गेल। ओ बकरीक असहाय बच्चा सन चारू दिस ऐ तरहे देखि रहल छल जेना माँकेँ ताकि रहल हुअए। अब्बाजानक बेमात्रे भाइक सभसँ छोट सन्तान सैफुद्दीन प्रसिद्ध सैफ जखन अपन घरक सभ लोककेँ चारू दिस घेरने देखलक तँ ओ अकबका कऽ ठाढ़ भऽ गेल। सैफक अब्बा कौसर चचाक मरबाक खबरि लेने आएल कोनमे कटल पोस्टकार्ड हमरा अखनो नीक जकाँ मोन अछि। गामक लोक सभ चिट्ठीमे कौसर चचाक मरबाके टा खबरि नै देने छला संगमे ईहो लिखने छला जे हुनकर सभसँ छोट सन्तान सैफ आब ऐ दुनियामे असगर रहि गेल अछि। सैफक पैघ भाइ ओकरा अपना संग बम्बै नै लऽ गेल। ओ साफे कहि देलन्हि जे सैफ लेल ओ किछु नै कऽ सकै छथि। आब अब्बाजानक अलाबे ओकर ऐ दुनियामे कियो नै छै। कोन कटल पोस्ट कार्ड पकड़ि अब्बाजान बहुत काल धरि चुपचाप बैसल रहथि। अम्मांसँ कएक बेर जगड़ा केलाक बाद अब्बाजान पैतृक गाम धनवाखेड़ा गेलथि आ बचल जमीन बेचि, सैफकेँ संग लऽ घुरलथि। सैफकेँ देखि हमरा सभकें हँसी आएल रहए। कोनो देहाती बच्चाकेँ देखि अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटीक स्कूलमे पढ़ैवाली सफियाक आर की प्रतिक्रिया भऽ सकैए, पहिले दिन ई बुझा गेल जे सैफ खाली देहातिये नै वरन् अर्द्ध-बताहसन सोझ वा मूर्ख छल। हमसभ ओकरा कबदाबैत आ फुचियाबैत रहै छलिऐ। एकर एकटा फाएदा सैफकेँ एना भेलै जे अब्बाजान आ अम्मांक हृदय ओ जीत लेलक। सैफ खूब मेहनति करए। काजसँ ओ देह नै नुकाबए। अम्मांकेँ ओकर ई व्यवहार खूब पसिन्न पड़ै। जँ दूटा रोटी बेसी खाइए तँ की? काज तँ सेहो देह झारि कऽ करैए। सालक साल बितैत गेलै आ सैफ हमर सभक जिनगीक अंग बनि गेल। हम सभ ओकरा संग सामान्य होइत गेलौं। आब मोहल्लाक कोनो बच्चा जँ ओकरा बताह कहि दै तँ हम ओकर मुँह नोंचि लै छलिऐ। हमर भाइ अछि ई एकरा तूँ बताह कोना कहै छेँ? मुदा घरक भीतर सैफक की स्थिति रहै से हमरे सभ टाकेँ बुझल छल।
नग्रमे दंगा ओहिने शुरू भेल छल जेना भेल करै छल, माने मस्जिदसँ ककरो एकटा पोटरी भेटलै, जइमे कोनो प्रकारक माउस छलै आ माउसकेँ बिन देखने ई मानि लै जाइ छल जे किएक तँ ई माउस मस्जिदमे फेकल गेल छल तेँ ई सुग्गरक माउस हेबे टा करत। तकर बदलामे मुगल टोलमे गाय काटि देल गेल आ दंगा शुरू भऽ गेल। किछु दोकान जड़ि गेल मुदा बेसीकेँ लुटल गेल।छूरी-चक्कूक ढेर रास घटनामे मोटा-मोटी सात-आठ गोटे मुइलाह आ प्रशासन एतेक संवेदनशील छल जे कर्फ्यू लगा देल गेल। आइ-काल्हिबला बात नै छल जखन हजारक हजार लोकक मुइलाक बादो मुख्यमंत्री मोंछपर ताव दैत घुमैत छथि आ कहैत छथि जे, जे किछु भेल ठीक भेल।
दंगा किएक तँ लगपासक गामोमे पसरि गेल छल तइ दुआरे कर्फ्यू बढ़ा देल गेल छल। मुगलपुरा मुसलमानक सभसँ पैघ मोहल्ला छल से ओतऽ कर्फ्यूक प्रभाव छल आ जिहाद सन वातावरण सेहो बनि गेल छल। मोहल्लामे तँ गली-कूची होइते छै मुदा कएकटा दंगाक बाद ई अनुभव कएल गेल जे घरक भीतरसँ सेहो रस्ता हेबाक चाही। माने आप्तकालक व्यवस्था। से घरक भीतरसँ, छातक ऊपरसँ देवारकेँ तड़पैत किछु एहनो रस्ता बनि गेल छल जे ओकरा जानैबला मोहल्लाक एक कोनसँ दोसर कोन आरामसँ जा सकैत छल। मोहल्लाक लोक तैयारी युद्ध जकाँ केने छल। एहेन बेबस्था रहै जे जँ एक्को मास धरि जँ कर्फ्यू जाइए तैयो जरूरतक बौस्तुजात मोहल्लेमे भेटि जाए।
दंगा मोहल्लाक छबारी सभकेँ अद्भुते उत्साह देखेबाक मौका दैत छल। रौ.. हम सभ तँ ऐ हिन्दू सभकेँ गर्दा फँका देबै.. की बुझि राखने अछि ई धोती बान्हैबला सभ.. धुर्र डरपोक होइ जाइए ई सभ।.. एक मुसलमान दस हिन्दूपर भारी पड़ैए.. हँसि कऽ लेने छी पाकिस्तान, लड़ि कऽ लेब हिन्दुस्तान.. एहने सन वातावरण बनि जाइ छल। मुदा मोहल्लासँ बाहर निकलैक नामपर सभक जान निकलऽ लागै छलै। पी.ए.सी.क चौकी दुनू दिस रहै। पी.ए.सी.क बूट आ राइफलक हत्थाक मारि कतेको गोटेकेँ मोन रहै, से मौखिक धरि तँ सभ ठीक रहै मुदा ओइसँ आगाँ….
संकटमे एकता लोक सीखि लैत अछि। एकता अनुशासन आ बेबहार। सभ घरसँ एकटा छौड़ा पहरापर रहत। हमर घरमे हमरा अलाबे, आ हम २५ बरख पार कऽ गेल रही से हमरा छौड़ा नै कहल जा सकैत छल, छौड़ सैफ टा छल, से ओकरा रतुका पहरापर रहऽ पड़ैत छलै। रतुका पहरा छातपर होइत छल। मुगलपुरा किएक तँ नग्रक सभसँ उपरका हिस्सामे छल से छातपर सँ सम्पूर्ण नग्र देखाइ पड़ैत छल। मोहल्लाक छौड़ा सभक संग सैफ पहरापर जाइत छल। ई हमरा लेल अब्बा लेल आ साफिया लेल बड्ड नीक गप छल। जँ हमरा घरमे सैफ नै रहितए तँ शाइत हमरे रातिमे धक्का खाए पड़ितए। सैफक फरापर जेबाक कारणसँ ओकरा किछु सुविधा सेहो देल गेल रहै, जेना आठ बजे धरि ओकर सूतऽ देल जाइत रहै। ओकरासँ बाढ़नि नै दिआएल जाइत रहै। ई काज साफियाक जिम्मा भऽ गेल छल जे साफियाँकेँ एक्को रत्ती पसिन्न नै रहै।
कखनो-कखनो रातिमे हम सेहो छातपर चलि जाइत रही, लाठी, लकड़ी आ पजेबाक ढेरी एम्हर ओम्हर लागल छलै। दू चारिटा छौड़ा लग देशी पेस्तौल आ बेसी लग चक्कू रहै। ओइमे सँ सभ छोट-मोट काज करैबला कारीगर छला। बेशी गोटे तालाक कारखानामे काज करै छला। किछु दर्जी, काठ-लकड़ी सन काज करैत छला। एम्हर बजार बन्न छल से हुनकर सभक काज सेहो बन्न छल। ऐमे बेशी गोटेक घरमे कर्जासँ चूल्हि जरि रहल छलै। मुदा ओ सभ प्रसन्न रहथि। छातपर बैसि कऽ ओ सभ दंगाक नव खबरि पर टीका-टिप्पणी करै जाइ छला आ नै तँ हिन्दू सभकेँ गारि पढ़ै जाइत छला। हिन्दूसँ बेशी गारि ओ सभ पी.ए.सी.केँ दैत छला। पाकिस्तान रेडियोक सभटा कार्यक्रम हुनका सभकेँ जबानी मोन छलन्हि आ कम अबाजमे ओ सभ रेडियो लाहौर सुनल करथि। ऐ छौड़ा सभमे दू-चारि गोटे जे पाकिस्तान गेल रहथि हुनकर सभक इज्जति हाजी सन छल। ओ सभ पाकिस्तानक रेलगाड़ी “तेजगाम” आ “गुलशने इकबाल कॉलोनी”क एहेन खिस्सा सुनबैत रहथि जे लगै छल जे स्वर्ग जँ कतौ अछि तँ ओ पाकिस्तानमे अछि। पाकिस्तानक बड़ाइसँ जखन हुनकर सभक मोन भरि जाइ छलन्हि तखन ओ सैफ संगे हँसी करै जाइ छला। सैफ पाकिस्तान, पाकिस्तान आ पाकिस्तानक वर्णन सुनलाक बाद एक दिन पुछि देने रहए जे ई पाकिस्तान अछि कतऽ? ऐपर सभ गोटे ओकरा संग बड हँसी केने रहथि। ओ किछु बुझने रहए मुदा ओकरा ठीकसँ ई पता नै चललै जे पाकिस्तान अछि कतऽ?
ई पहरुआ छौड़ा सभ सैफकेँ मजाकमे दरबैत रहथि, “देख सैफ, जँ हिन्दू तोरा देख लेतौ तँ बुझै छहीं की करतौ? पहिने तोरा नाङट कऽ देतौ।” छौड़ा सभकेँ बुझल रहै जे सैफ अर्द्ध बताह हेबाक बादो नंगटे भेनाइकेँ बड खराप आ अधला गप बुझै छल, “तकर बाद हिन्दू सभ तोरा तेलसँ मालिश्त करतौ।”
“किए, तेल-मालिश्त किए करत?”
“किएकि जखन ओ सभ तोरा बेंतसँ मारौ तँ तोहर खाल निकलि जाउ। तकर बाद धीपल छड़सँ तोरा दागै जेतौ।…”
“नै”, ओकरा बिसवास नै भेलै।
रातिमे ओकरा डरौन आ मारि-काटि बला जे खिस्सा सुनाओल जाइ छल, ओइसँ ओ खूब डरा गेल छल। कखनो काल ओ हमरासँ भसियाएल गप करऽ लागै छल। हमरा रञ्ज होइ छल आ ओकरा चुप करा दै छलौं, मुदा ओकर मोनक प्रश्नक उत्तर नै भेटि पाबै छलै। एक दिन ओ पूछऽ लागल- “भैया, पाकिस्तानमे सेहो माटि होइ छै की?”
“किए? ओतऽ माटि किए नै हेतै?”
“ओतऽ खाली सड़के सड़क नै छै? ओतऽ टेरीलीन भेटै छै.. ओतऽ सस्त छै.. आ”
“देखू ई सभटा मोनक गढ़ल गप अछि… तूँ अल्ताफ आ ओकर संगी सभक गपपर काने नै दिअ।” हम ओकरा बुझेलिऐ।
“भैया, की हिन्दू आँखि बहार कऽ लै छथि..”
“फूसि.. ई तोरा के कहलकौ?”
“बच्छन।”
“फूसि।”
“तखन चरसा सेहो नै खिचैत छथि?”
“ऊँह.. ई की सभ पूछि रहल छेँ..”
ओ चुप भऽ गेल, मुदा ओकरा आँखिमे सैकड़ाक संख्यामे प्रश्न छलै। हम बाहर चलि गेलौं। ओ साफियासँ यएह सभ गप करऽ लागल।
कर्फ्यू बढ़िते गेल। रतुका पहरेदारी सेहो चलैत रहल। हमर घरसँ सैफे जाइत रहल। किछु दिन बाद एक दिन अनचोक्के सुतलमे सैफ चिकड़ऽ लागल। हम सभ घबड़ा गेलौं मुदा ई बुझबामे भाङठ नै रहल जे ई सभ ओकरा डराएल जएबाक कारणसँ अछि। अब्बाकेँ छौड़ा सभपर बड्ड पित्त लहड़ल छलन्हि आ ओ मोहल्लाक एकाध मुँहपुरुख लोकनिकेँ ई गप कहनहियो रहथिन्ह, मुदा तकर कोनोटा असरि नै भेल। छौड़ा सभ आ सेहो मोहल्लाक छौड़ा सभ किए ऐ मनोरंजनकेँ छोड़ितथि?
बात कतऽसँ कतऽ धरि पहुँचि गेल अछि एकर कनियो अंदेशा हमरा ओइ दिन धरि नै भेल जहिया सैफ हमरासँ खूब गम्भीर भऽ पुछलक, “भैया, हम हिन्दू बनि जाउ?” प्रश्न सुनि हम गुम्म पड़ि गेलौं, मुदा तुरत्ते हमरा बुझऽ मे आबि गेल जे ई रातिमे डरौन खिस्सा सुनाओल जएबाक परिणाम अछि। हमरा तामस उठि गेल, फेर सोचलौं जे बताहपर तामस केलासँ नीक जे तामस पीबि जाइ आ ओकरा बुझेबाक प्रयत्न करी। हम पुछलिऐ,
“किए? अहाँ हिन्दू किए बनऽ चाहै छी? बचबा लेल? एकर माने भेल जे हम नै बचि पाएब?”
“तँ अहूँ बनि जाउ..”, ओ बाजल।
“आ तोहर कक्का, हमर अब्बा”, हम अपन अब्बा आ ओकर कक्काक गप पुछलिऐ।
“नै.. हुनक सभकेँ…”, ओ किछु सोचऽ लागल। अब्बाजानक उज्जर आ नमगर दाढ़ीमे कतौ ओ ओझरा गेल छल।
“देखलौं, ई सभ छौड़ा सभक किरदानी छी जे अहाँकेँ भटकाबैए। ई जे ओ सभ अहाँकेँ कहै छथि, से सभटा झूठ अछि। रौ, महेशकेँ नै चिन्है छेँ?”
“ओ जे स्कूटरपर अबै छथि…” ओ प्रसन्न भऽ गेल।
“हँ हँ, वएह।”
“ओ हिन्दू छथि?”
“हँ हिन्दू छथि”, हम कहलिऐ। पहिने तँ ओकर मुँहपर निराशाक छाह एलै फेर ओ गुम्म भऽ गेल।
“ई सभ उच्क्का सभक काज छी.. नहिये हिन्दू लड़ैत अछि आ नहिये मुसलमान… उच्क्का सभ लड़ैत अछि, बुझलौं?”
दंगा शैतानक अँतड़ी सन नमड़ैत गेल आ मोहल्लामे लोक परेशान हेबऽ लगला- भजार न्ग्रमे दंगा करैबला हिन्दू आ मुसलमान उचक्का सभकेँ जँ मिलाइयो देल जाए तँ कतेक हेता.. बेशीसँ बेशी एक हजार, चलू दू हजार मानि लिअ। तँ भाइ दू हजार गोटे लाख लोकक जिनगी नर्क बनेने छथि आ हम सभ घरमे सुटकि कऽ बैसल छी।
ई तँ वएह भेल जे दस हजार अंग्रेज कोटि हिन्दुस्तानीपर राज करैत छला आ सम्पूर्ण सरकार ओकर अन्तर्गत चलैत छल, आ फेर ऐ दंगासँ फाएदा ककर अछि, फाएदा?
औ जी हाजी अब्दुल करीमकेँ फाएदा अछि जे चुंगीक चुनाव लड़त आ ओकरा मुसलमान वोट भेटतै। पंडित जोगेश्वरकेँ हेतै जकरा हिन्दूक वोट भेटतै। आब तखन हम की छी? तूँ वोटर छेँ हिंदू वोटर, मुसलमान वोटर, हरिजन वोटर, कायस्थ वोटर, सुन्नी वोटर, शिआ वोटर, यएह सभ होइत रहत ऐ देशमे? हँ, किए नै? जतऽ लोक मूर्ख अछि, जतऽ भाड़ापर हत्या केनिहार भेटै छै, जतऽ राजनीतिज्ञ अपन गद्दी लेल दंगा करबै छथि ओतऽ आर की भऽ सकैए? भजार, की हम लोक सभकेँ पढ़ा नै सकै छी? बुझा नै सकै छी? हह- हह- तूँ के होइ छह पढ़बैबला, सरकार पढ़ेतै। जँ चाहत तँ सरकार आ जँ नै चाहत सरकार तँ ऐ देशमे किछु नै भऽ सकैए? हँ.. अंग्रेज हमरा सभकेँ यएह सिखेने अछि.. हम एकर अभ्यासी छी.. चलू छोड़ू, तखन दंगा होइत रहत? हँ होइत रहत। मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा मुसलमान हिन्दू भऽ जाथि? लाहौलविलाकुव्वत ई की कहि रहल छी? बेस तँ मानि लिअ जे ऐ देशक सभटा हिन्दू मुसलमान बनि जाथि? सुभान अल्लाह केहेन चोटगर गप कहलौं.. तखन की दंगा रुकि जाएत? ई तँ सोचबा जोग गप अछि। पाकिस्तानमे शिया सुन्नी एक दोसराक जानक पाछाँ छथि.. बिहारमे ब्राह्मण दलितक छाहसँ बचैत छथि.. तँ की भजार लोक आकि मनुक्ख कहू सार अछिये एहेन जे लड़िते रहऽ चाहैए? ओना देखू तँ जुम्मन आ मैकूमे बड़ दोस्तियारी छै। तँ किए ने मैकू आ जुम्मन बनि जाइ… एह, केहेन बात कहि देलौं, माने… माने… माने…
हम भोरे-भोर रेडियोक कान अमेठि रहल छलौं, साफिया बहारि रहल छलि आकि राजाक छोट भाइ अकरम भागैत भागैत आएल आ फूलल साँसकेँ रोकबाक असफल प्रयत्न करैत बाजल, “सैफकेँ पी.ए.सी. बला सभ मारि रहल अछि।”
“की? की कहि रहल छी?”
“सैफकेँ पी.ए.सी. बला मारि रहल अछि”, ओ कने रुकि कऽ बाजल।
“किए मारि रहल अछि? की बात अछि?”
“की जानी.. चौबटियापर..”
“ओतऽ जतऽ पी.ए.सी.क चौकी अछि?”
“हँ, ओतै।”
“मुदा किए…”, हमरा बुझल छल जे आठ बजे सँ दस बजे धरि कर्फ्यू खुजऽ लागल अछि आ सैफकेँ आठ बजेक करीब अम्मा दूध अनबा लेल पठेने छलि। सैफ सन बताहोकेँ बुझल रहै जे जल्दी-जल्दी आपस एबाक अछि, आब तँ दस बाजि गेल अछि।
“चलू हम चलै छी।”, रेडियोसँ बहराइत अनटोटल अबाजक चिन्ता केने बिनु हम तेजीसँ बहरेलौं। बताहकेँ किए मारि रहल अछि पी.ए.सी.बला सभ, ओ कोन एहेन कर्म केलक अछि? ओ कइये की सकैत अछि? अपने एहेन भयभीत रहैत अछि जे ओकरा मारबाक आवश्यकते की.. फेर की कारण भऽ सकैए? पाइ, औजी ओकरा तँ अम्मा दू टका देने अछि। दू टका लेल पी.ए.सी. बला सभ ओकारा मारत?
चौबटियापर मुख्य सड़कक बराबर कोठापर मोहल्लाक किछु गोटे जमा रहथि। सोझाँमे सैफ पी.ए.सी.बलाक संग ठाढ़ छल। ओकर सोझाँमे पी.ए.सी.क जवान सभ छल। सैफ जोर-जोरसँ चिकड़ि रहल छल, “हमरा तूँ सभ किए मारलेँ.. हम हिन्दू छी.. हिन्दू छी…”
हम आगाँ गेलौं। हमरा देखलाक बादो सैफ बजिते रहल, “हँ, हँ हम हिन्दू छी..”, ओ थरथरा रहल छल। ओकर ठोढ़क कोनसँ शोनितक एक बुन्न निकलि कऽ टघरि कऽ ठोढ़ीपर ठाढ़ छल। “तूँ हमरा मारलेँ कोना.. हम हिन्दू..”।
“सैफ… ई की भऽ रहल अछि… घर चलू।”
“हम.. हम हिन्दू छी।”
हमरा बड्ड आश्चर्य भेल.. की ई वएह सैफ छी जे ई छल.. एकर तँ रूपे बदलि गेल अछि। ई एकरा भऽ की गेल अछि?
“सैफ, होशमे आउ”, हम ओकरापर जोरसँ तमसेलिऐ।
मोहल्लाक लोक सभ नै जानि केकरापर भितरे भीतर दूरसँ हँसि रहल रहथि। हमरा पित्त चढ़ल। सार, ई सभ ई नै बुझै छथि जे ओ बताह अछि।
“ई अहाँक के अछि?”, एकटा पी.ए.सी. बला हमरासँ पुछलक।
“हमर भाए छी.. कनेक मानसिक परेशानी छै एकरा।”
“तँ एकरा घर लऽ जाउ”, एकटा सिपाही बाजल।
“हमरा सभकेँ बताह बना देलक”, दोसर बाजल।
“चलू… सैफ घर चलू। कर्फ्यू लागल अछि, कर्फ्यू..”।
“नै जाएब… हम हिन्दू छी.. हिन्दू.. हमरा… हमरा…”, ओ हबोढकार कानऽ लागल।
“मारलक… हमरा मारलक.. हमरा मारलक.. हम हिन्दू छी.. हम”, सैफ चितंग निच्चा खसल.. शाइत बेहोश भऽ गेल छल.. आब ओकरा उठा कऽ लऽ गेनाइ आसान छल।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
बालानां कृते
१.
जगदीश प्रसाद मण्डलक एकटा बाल कथा ‘एकोटा
ने’ २.
चंदन कुमार झा- बाल गजल
चंदन कुमार झा- बाल गजल
१.
जगदीश प्रसाद मण्डलक एकटा बाल कथा
‘एकोटा ने’
पुरमपुर गाममे पुरन कक्काक परिवारकेँ गौआेँ
आ अनगौआेँ पुनचन परिवारसँ जनैत छन्हि। ओना अस्सी बर्खक अवस्थामे कहियो पुरन
काका कनमा-कनइ नै पढ़लनि मुदा कनमा-कनइ दुनूक किरदानी देखि-देखि सदिखन क्षुब्ध
रहै छथि। गरे ने बैसै छन्हि जे जे वस्तु तरजूपर रखि बटिखाड़ासँ तौलल जाएत, ओ जँ बँटैत-खोंटैत, पौआ-कनमा होइत रत्ती-माशामे चलि जाएत तँ चलि जाएत, मुदा दुनियाँक एते नमहर धरती केना बँटाएत-खोंटाएत कनमा-कनइ-फनै दिसि
पहुँचि जाइए। बादलक किरदानी की पतालक पानि सोखि लेत?
जँ सोखए चाहत तँ राखत कतए? हवा-बिहाड़ि केत्तेकाल अँटका
कऽ रखि सकैए। खैर जे होउ मुदा पुरन काका करैला लत्तीक मचान जकाँ अपना परिवारकेँ
बना हरिअर, तड़गर खेबे करै छथि। जहिना सक्कत-कड़गर बीआ
धरती धारण करिते, दीयाक तेल-बत्ती जकाँ अपन तिल-तिल
अर्पित करए लगैत अछि तहिना ने करैलोक बीआ केने अछि। वएह अंकुर ने धरती धारण करैत
ऊपर आबि लत्ती बनि लतड़ए लगल। भलहिं पातर-छीतर कड़चीक आलम संग मचानपर किअए ने
पहुँचल हुअए। तँए कि ओ अपन शरीरक रच्छा करैत मुँह बँचबैत नै पहुँचल? जरूर पहुँचल अछि।
पुरन काकाक परिवारोक सभ तेहने छन्हि जे
अपनामे जे घंघौज होन्हि मुदा काका लग पहुँचते मन सकदम भऽ जाइत छन्हि, किअए तँ सभ बुझैत जे अगिआएलमे
हँसियो ही-ही-आ कऽ धड़ैत छै। तँए जहिना रस्तापर ऐँठैत-जुठैत चलैत साँप बोहरिमे
प्रवेश करिते सोझ भऽ जाइत तहिना काकाक सोझमे परिवारक सदस्य। ओना, बिनु पएरक चलैबला साँप माटपर चलि केना सकैए। मन-चित्त मारि पुरनो
काका राति-दिन परिवारेक पाछू लगल रहै छथि। अखनो मनमे ओहिना ओ बात तड़गर बनल
छन्हि जे वीर भोग्या बसुंधरा। जे ऐ धरतीसँ प्रेम करत ओकरे प्रेमी बनि धरतियो
चुम्मा लेत। कखनो माए बनि, कखनो भाए-बहिन बनि।
चेतनसँ बालबोध धरिक परिवार पुरन काकाक छन्हि।
तालो मेल अजीव छन्हि। चेतन सभ पुरनकाकाकेँ गार्जन बूझि अपन छुट्टी नेन रहैए तँ
बालो-बोध सभ अपन बाबा बूझि अपन सभ किछु बुझैए। परिवारक सभसँ छोट बच्चा चारि
सालक छन्हि। तालो-मेल नीक छन्हि। अंगनाक सभ समाचारक समदिया रहितो
संवाद-बाहकक काज करिते छन्हि। एहेन चेला भेटबो मोसकिल। मुदा से तँ छन्हिये।
नवका दोसितियारे तँए बेसीकाल एकठाम रहने चाहो-बिस्कुट संगे करै छथि। काका
खुशी जे अपन बात पहिने उसारि, भरि दिन गप सुनैले तैयार रहैए। आ पोता दीनमा खुशी जे आँखि-कान तँ
तखने काजक बनत जखन ओकरासँ काज कराएब। नइ तँ गमे-गमे गेड़ी बनि जाएत। मुदा से कहाँ
होइ, एक काने सुनै आ दोसर काने उड़ि जाए। उड़ैत-उड़ैत
सुतली रातिमे सभ उड़ि जाए।
वसन्तक आगमन भऽ गेल। किछु दिन पूर्ब जे
जाड़सँ जड़िआएल छल, पालासँ
पलाएल छल ओ फुड़फुड़ा कऽ उठल। सुखाएल-सड़ल लत्ती आ कुमही जकाँ पबिते वसन्ती
हवामे उड़ए लगल। मुदा तैयो बेदरंग भेल धरती, घर-अांगन
जकाँ बाहरै-सोहरै ले इशारा दिअए लगल। रसे-रसे रस भरल हवाक रमकी रमकए लगल। जहिना
सेवा िनवृत्तिक समए कोनो अफसरकेँ स्वर्ग सुझैत तँ कोनोक आगूमे नांगट नर्कक नाच
होइत अछि, तहिना शिशिर -सिरसिराइत समए- वसन्तक बीच
होइत। मुदा से बात पुरन काकाक परिवारमे नै छन्हि। कोल्हुक बड़द जकाँ सभ परिवारक
अपने-अपने नाचक पाछू लागल रहैत छन्हि।
दिन उगिते दीनमा, बाइस खा जत्ताक -माटिक बनाओल- दुनू
पट्टा दुनू हाथमे नेने दरबज्जाक आगूमे बैसि, रस्ताक
धूरा-गरदाकेँ जत्तामे पीसए लगल। बिनु देखनौं आशा बनले रहै जे बाबा दरबज्जेमे छथि।
सुतल छथि कि जागल, तइसँ कोन मतलब दीनमाकेँ। ओ तँ अपन
काजमे बेहाल। मनमे रहबे करै जे चाहक बेर भऽ गेल अछि माए चाह आनि देबे करतनि, हमहूँ पीबे करब। परिवारक बोझसँ दबल थोड़े रहै जे नून नै अछि तँ केसक
तारीखपर जाए पड़त। जहिना तत्ववेत्ता तत्वचिन्तनमे रमल रहैत तहिना दीनमा अपन
काजमे हराएल। कोन मतलब ओकरा रहै जे बुझैत, काजक हराएल
अधखड़ुआ रहि जाइए।
माइक हाथक चाह देखिते दीनमा, जत्ता छोड़ि आगूए आगू दरबज्जाक
ऊपर चढ़ल। दीनमापर नजरि पड़िते पुरन काका मुस्की दैत कहलखिन-
“की दीनबाबू, चाहो-ताहक बेर भेलैए आकि नै?”
तहि बीच चाह नेने पुतोहु पहुँच गेलनि।
दीनमाक नजरि देबालमे टँगल हनुमान जीक छातीक रामपर पहुँचि गेल। देबालमे सटल फोटो
देखि दीनमा बाजल-
“बाबा, उ
फोटो उतारि दिअ।”
दीनमाक बात सुनि पोल्हबैत पुरनकाका कहलखिन-
“बौआ, पहिने
चाह पीब लिअ, पछाति ई सभ हेतइ?”
जना बुझले रहै तहिना दीनमा बाजल-
“पहिने अहाँ पीब ने लिअ, पाछू हम पीब।”
बहाना पकड़ाइत देखि पुरनकाका कहलखिन-
“हमरा हाथमे गिलास अछि केना उतारल
हएत?”
चाह पीब, खिड़कीपर राखल खुरपी उतारि पुरनकाका बाड़ी-झाड़ी दिसि
विदा होइक विचार केलनि। हाथसँ खुरपी छिनैत दीनमा आगू-आगू विदा भेल।
दाड़िमक बाड़ी पहुँचि काका हिया-हिया हियबए
लगलाह। गाछक जड़िमे पानिक अभाव बूझि पड़लनि। मुदा गाछक डगडगी आ फूलसँ लदल गाछ
देखि मन ललिया गेलनि। लाल-लाल फूलसँ लदल गाछ। सभ डारिमे फूल लागल। खुरपी नेने
दीनमा खाधि खुनैक जगह हियबैत। जँ कियो पैघ अफसर नै बनि पाओत तँ कि ओ ओहिना
रहि जाएत। हिया-हिया फूलकेँ देखैत हरिआएल-हरिआएल फड़ो देखलनि। मन भेलनि जे
जतबे-ततबे जड़ि सबहक खढ़ उखाड़ि दिएे। मुदा नजरि दाड़िमक काँटपर गेलनि। डारिये
काँट भऽ जाइए। ऊपर-निच्चा सगतरि काँट। जखने अपने खढ़ उखाड़ए लगब तखने इहो
-दीनमो- किछु ने किछु करए लगत। तहूमे खुरपी हाथेमे छै। तेहेन झाड़ी अछि जे
सुगबा साँप जकाँ माथमे गड़तै कि गरदनिमे तेकर कोन ठेकान। जखने काँट गड़तै कि
कानब शुरू करत। जखने कानत तखने ओकरा चुप करब आकि गाछक जड़िक खढ़ उखाड़ब। समझौता
करैत काज मनमे एलनि। काज ई जे फड़क गिनती कऽ ली। दीनमा हाथक खुरपी आड़िपर रखि, कोरामे उठा काका कहलखिन-
“बौआ, अहाँकेँ
नेने हम टहलब आ अहाँ फड़ गनब।”
नव फड़क गिनतीक काज देखि दीनमाक मन खुशीसँ
आरो खुशिया गेल। मुदा कट्टा भरि झाड़ीक बगानमे पचासोसँ ऊपर गाछक फड़ केना गनि
लेब। तहूमे बीसे तक गनल होइए। गाछक सभ फड़ अपने हिया-हिया देखथि, जे फड़क बीच कीड़ोक असर भेलहेँ आकि
नै। अपने तँ एक्केटा गाछक फड़ देखि अन्दाजि लेलनि जे कते हएत? जहिना गोल-गोल, किछु नमती नेने लाल-लाल फूल
हरिअर होइत अपन जिनगीक फल पकड़ि रहल अछि, तहिना तँ
गोटि-पङरा कड़ुआएल आमक आकार सेहो पकड़ि रहल अछि। एकसँ दोसर गाछक फड़ गनैमे
दीनमा बेर-बेर बिसरि जाए। कखनो गिनतिये छूटि जाइ तँ कखनो अंके बिसरि जाए।
कखनो बीससँ ऊपर नै बढ़ल। अंतमे काका पुछलखिन-
“बौआ, कते
फड़ भेलह?”
बाबाक प्रश्न सुनि दीनमाक मुँहसँ निकलि
गेल-
“दसटा।”
“अच्छा बड़बढ़िया। आब एतए आबि के
खेलिहह। ओगरबाहियो भऽ जेतह आ खेलबो करबह।”
नीक फसल भेलनि। खेबा जोगर फल हुअए लगल। फड़
फल बनि गेल। ओना सजमनि फड़क-फड़े रहि जाइत। मुदा दाड़िम, आम, लताम
इत्यादि फड़सँ फल बनि जाइत अछि। अंतिम अवस्था अबैत-अबैत तूबि-तूबि फल अपने
खसए लगल।
गाछक सभ फल समाप्त भऽ गेल। जहिना परसौती
जनानाकेँ देख-भालक जरूरति पड़ैत तहिना ने बाड़ियो-झाड़ीक अछि। ई सोचि
पुरनकाका दीनमाक संगे दाड़िमक गाछ लग पहुँचलाह। जे कहियो फड़ फूलसँ लदल छल ओ
सून-सून भेल, अपन बेथा
सुना रहल अछि। व्यथित मने दीनमाकेँ पुछलखिन-
“बौआ, कते
फड़ अछि?”
विचलित होइत दीनमा बाजल-
“एकोटा ने।”
“ऐ लेल विचलित किअए होइ छी। जहिना
समए आएल छलइ तहिना फेनो औतै।”
“केना औतै?”
“समए अनुसार एकर ताक-हेरि करबै तँ
एबे करतै।”
२.
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार
बाल-गजल-७
मस्जिद जखने परल अजान
कोइली ठनलक पराती गान
कौआ डकलक खेत खरिहान
बगुला खत्ता बिच करय स्नान
गर-गर दुध दुहैछ बथान
टक-टक पड़रू लगौने ध्यान
बाबा छथि बाड़ी बान्हथि मचान
बाबी अँगना मेँ लगाबथि पान
टुह-टुह लाल पूब असमान
'चंदन'जलखै
मे दूध मखान
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने)
सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’
ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे
वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले
स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ
लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन
करबाक थीक।
२.संध्या
काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले
स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे
शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल
भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर
स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक
काल-
रामं
स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः
स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ
दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४.
नहेबाक समय-
गङ्गे च
यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे
सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं
यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं
तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक
उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या
द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं
ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ
दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा
बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः
परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते
भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन
तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः
साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव
यन्यूधि शशिनः कला॥
९.
बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे
पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता
देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा
रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒
युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो
न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।
शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ
विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ
नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ
दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक
सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि।
अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश
होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि
मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी
र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए
बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक
रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे
ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय
बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर
वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम
सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8.VIDEHA
FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI
LITERATURE IN ENGLISH
8.1.4.NAAGPHANS
(IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya
Verma
विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/
रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/
Roman.)
English
to Maithili
Maithili to English
Maithili to English
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू
बढ़ाऊ,
अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
२३.गजेन्द्र ठाकुर इडेक्स
२४.
नेना भुटका
२५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइट
२६.२७.
२८. विदेह मैथिली नाट्य
उत्सव
२९.समदिया
३०. मैथिली फिल्म्स
३१.अनचिन्हार आखर
३२. मैथिली हाइकूhttp://maithili-haiku.blogspot.com/
३३. मानक मैथिली
http://manak-maithili.blogspot.com/
३४. विहनि कथा
http://vihanikatha.blogspot.in/
३५. मैथिली कविता
http://maithili-kavita.blogspot.in/
३६. मैथिली कथा
http://maithili-katha.blogspot.in/
३७.मैथिली समालोचना
http://maithili-samalochna.blogspot.in/
महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइट http://www.shruti-publication.com/ पर ।
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर
गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह
(सहस्राब्दीक चौपड़पर),
कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य
(त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक
बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist
edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)-
essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups
literature in single binding:
Language:Maithili
६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
(add courier charges Rs.50/-per copy for Delhi/NCR and Rs.100/- per copy for outside Delhi)
For Libraries and overseas buyers $40 US (including postage)
The book is AVAILABLE FOR PDF DOWNLOAD AT
https://sites.google.com/a/videha.com/videha/
http://videha123.wordpress.com/
Details for purchase available at print-version publishers's site
website: http://www.shruti-publication.com/
or you may write to
Language:Maithili
६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
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विदेह: सदेह : १: २: ३: ४ तिरहुता : देवनागरी "विदेह" क, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिका (http://www.videha.co.in/) क चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह:सदेह:१: २: ३: ४
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर।
Details for purchase available at print-version
publishers's site http://www.shruti-publication.com
or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com
२. संदेश-
[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक
सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ
बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]
१.श्री गोविन्द झा-
विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ।
सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल।
हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।
२.श्री रमानन्द रेणु-
मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम
हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।
३.श्री विद्यानाथ झा
"विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन
महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक
अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।
४. प्रो. उदय नारायण सिंह
"नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक
इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट
मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल
अभिनन्दन।
५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि
विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन,
मैथिलीक
प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट
फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष
शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया
बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर
हार्दिक बधाई स्वीकार करी।
६. श्री रामाश्रय झा
"रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय
वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
७. श्री ब्रजेन्द्र
त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह"
केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
८. श्री प्रफुल्लकुमार
सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक
समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि
दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई
जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक
क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि।
पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
१०. श्री आद्याचरण झा-
कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग
करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान
यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
११. श्री विजय ठाकुर-
मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु
हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
१२. श्री सुभाषचन्द्र
यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित
हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१३. श्री मैथिलीपुत्र
प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग
रहत।
१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा-
"विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ
एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि
अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।
१५. श्री रामभरोस कापड़ि
"भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ
अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन
अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।
१६. श्री राजनन्दन
लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अंक जखन प्रिंट निकालब
तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ
होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ,
मुदा उमर आब
बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति
अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ
द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।
(स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री
आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल
उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ
प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण
नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष
शुभकामनाक संग।
१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह-
अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत
मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ
मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक
प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर
आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
१८.श्रीमती शेफालिका
वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल
अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ
तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।
१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर
छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे
मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।
२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ
समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी।
"विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा
सकैछ।
२१. श्री किशोरीकान्त
मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि-
बधाई स्वीकार कएल जाओ।
२२.श्री जीवकान्त- विदेहक
मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।
२३. श्री भालचन्द्र झा-
अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर
विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे
उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।
२४.श्रीमती डॉ नीता झा-
अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य
शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक
उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।
२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल
गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल
जाए।-गजेन्द्र ठाकुर)
२६.श्री महेन्द्र हजारी-
सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ
गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।
२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।
२८.श्री सत्यानन्द पाठक-
विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।
२९.श्रीमती रमा
झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर
गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी।
विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।
३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह
नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।
३१.श्री रामलोचन ठाकुर-
कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल
परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।
३२.श्री तारानन्द वियोगी-
विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना
आ बधाई।
३३.श्रीमती प्रेमलता
मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल।
बधाई।
३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र-
बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल
बधाई।
३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा-
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।
३६.श्री अग्निपुष्प-
मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा
दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।
३७.श्री मंजर
सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।
३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा
ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे
क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।
३९.श्री छत्रानन्द सिंह
झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।
४०.श्री ताराकान्त झा-
सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि।
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।
४१.डॉ रवीन्द्र कुमार
चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।
४२.श्री अमरनाथ-
कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य
मध्य।
४३.श्री पंचानन मिश्र-
विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।
४४.श्री केदार कानन-
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद,
शुभकामना आ
बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास
अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा
समाहित अछि।
४५.श्री धनाकर ठाकुर-
अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत
तऽ नीक।
४६.श्री आशीष झा- अहाँक
पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब
नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ
सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।
४७.श्री शम्भु कुमार
सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा
सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत।
ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम्
तँ अशेष अछि।
४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक
प्रयासक कतबो प्रशंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल
काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।
४९.श्री बीरेन्द्र
मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति
प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।
५०.श्री कुमार राधारमण-
अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल।
हमर शुभकामना।
५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह
पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ
गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।
५२.श्री विभूति आनन्द-
विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।
५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि
नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।
५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता-
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद;
कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक
स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद।
५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।
५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।
५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक देखल,
बधाई।
५८.डॉ मणिकान्त
ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ
गेल अछि।
५९.श्री धीरेन्द्र
प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित
सहयोग नहि कऽ पबैत छी।
६०.श्री देवशंकर नवीन-
विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।
६१.श्री मोहन भारद्वाज-
अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा
शीघ्र सहयोग देब।
६२.श्री फजलुर रहमान
हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी
छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा
"सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी
अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद
मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ
पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक,
एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन्
सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष
मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल
शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद
मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि
अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे
एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।
६७.बुद्धिनाथ मिश्र-
प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक’ विलक्षण
पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि
प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।
६८.श्री बृखेश चन्द्र
लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल ,
हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।
६९.श्री परमेश्वर कापड़ि -
श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।
७०.श्री रवीन्द्रनाथ
ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ।
मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक
चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि
आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक
लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि
देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)
७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल
आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय
अछि।
७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ
अछि।
७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ
अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि।
७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्
अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले
अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना।
७५.प्रोफेसर कमला चौधरी-
मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन
होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल।
पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो
अहाँसँ आशा अछि।
७६.श्री उदय चन्द्र झा
"विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने
छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि।
७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप:
गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि
बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि।
७८.श्री मणिकान्त दास:
अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम्
अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ।
त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल।
७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक
ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ
अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना।
विदेह

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बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। ’विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका अछि आ एहिमे
मैथिली, संस्कृत आ अंग्रेजीमे मिथिला आ मैथिलीसँ संबंधित
रचना प्रकाशित कएल जाइत अछि। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक
०१ आ १५ तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
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