१.
कामिनी कामायनी- उत्तराक
नोर २.
सत्यनारायण झा-दुटा बात
पुत्रक जन्म दिन पर ३.
कैलास दास, खोजय पड़त मातृत्व बालगीत
कामिनी कामायनी- उत्तराक
नोर २.
सत्यनारायण झा-दुटा बात
पुत्रक जन्म दिन पर ३.
कैलास दास, खोजय पड़त मातृत्व बालगीत
१
कामिनी कामायनी
उत्तराक नोर
केहेन उदासी के मोटगरि चद्दरि मे लपेटल लटपटायल . ई जगह .. .लागि रहल अछि ।जेना सदाबहार गाछक सबटा पात झरि गेल होय ।सायं सायं बहैत बसात मे कत्तेको रूदनक स्वर मिलि क’ एकटा भयंकर चित्कार करि रहल अछि ।ओ गाछ . ओ बिरीछ. . ओ चिडै. . ओ चुनमुनी .. .. अपन उत्साह बिसरि कहुना करि अपन दिन कटैत हो जेना ।दूर .. पहाड .. . शाश्वत भ्रमक परदाफाश करबा क प्रयास मे प्रकृति के रहस्यवादी दृष्टिकोण सॅ फराक हटि क’ किछु आओर राग अलापि रहल छल ।कत्तेक अपरिचित भ’ गेलै. ई सब जे कहियो ओकर जीवन क ह्दय प्रदेश बनि चुकल छल । कसकि त’ उठल रहै मोन ।
बड दिन क’ बाद . . आंगुर प’ गिनलक . .पॉच सावनक बाद .. . ओ आयल छल मसूरी फेर सॅ .. ।जगह त’ वएह छलै. . ओहिना आकास. . के छुबैत. . पहाड़ . .पहाड .. प’ झूमैत हरियर कचोर ऊॅच ऊॅच गाछ. . . ओहिना साफ . धोल चमकैत वातावरण. . .ओहिना मकान क छत प’ कार . . .मुदा ओकरा ओकर जादुई आकर्षण बड निघटल लगलै ।ओ गप नै छलै. . जे ओकरा बौरा देने छलैक़ . . कि खिलखिल करैत .. जीन्दगी सॅ लब लब भरल।. . . ओ वसंत. . सन्न सन्नबहैत बयार सडकक कात
बेंच प’ बैसैत मातर ओकर धियान दूर पर्वत प ससरति कारी सन कोने बिन्दु जकॉ वस्तु प’ पडलै. . वायनोकूलर सॅ झट देखलक़ . बकरी .. पहाडी बकरी .. ओकरा हॅसी लागि गेलए. . ठठा क’ हॅसि पडल छल. . बकरीयो के की सूझलै. . ओत्ते ऊपर चरय लेल गेल ।ओही दिन पूर्णिमा के चॉद ओही बकरी के झुंड सॅ कनिए उपर विश्राम करैत ओही परम सुन्दरता के निहारि रहल छली ।ओकर नजरि आब चॉद प’अटकि गेलय ।मुॅह सॅ स्वर फुटि पडलै. ‘चलो दिलदार चलो. . .चॉद के पार चलो. . . । . . ‘हम है तैयार चलो. . ।’आ विकल के स्वर मे स्वर मिलाएब ओकरा फेर सॅ जोर सॅ ठहाका लगाबए प’ मजबूर करि देने छल .. जे कनि क्षण के लेल ओही ठाम गूॅजए लागल छल।छुट्टी के दिन ओ दुनु अहिना सांझ पडय सॅ पहिने बौआबैत ढहनाबैत . .ओए पहाडी के चप्पा चप्पा छानि मारै. .गहराई मे उतरै. . चढाई प दौड दौड क’ चढबाक कोससि मे हाफैत हॉफैत ओही ठाम ओंघडा जाए. .. मौसम त’ अपने आप मे निराला. . .भंगतडाह. . .कखनो रूइस रहलौ. . कखनो. . कानए लगलहूॅ. . कखनो मंद मंद मुस्की. कखनो छिडियाएल. .. आब के संभारत. . .मुदा पहाड ओकर सब रूप प’ न्योछावर. . . कनियो रोषराख नै. . ..सनातन प्रेमी जे छलै. . ।साफ सुथरा निप्पल पोतल आकाश मे नहिं जानि कतय सॅ औचक मे कारी स्याह मेघ आबि झमाझम बरसि जाए .. .माल रोड प’ घुडसवारी करैत दुनु एकदम भींग जाए. . .तहन थर थर कॉपैत देह मे गरमी आनबा लेल. . लग पास के कॉफी हाउस मे जाकए चैन पाबए ।कैमल बैक हिल्स. . प’ घुमैत. . कंपनी बाग के झुल्ला प’ झुलैत. . .दिन सोन चिरैया सन फुर्र सॅ उडि जाए .।
लोकक नजरि के बेपरवाही सॅ फेकैत. . विकल .. ओकरा एक छण के लेल एसगर नै छोडय चाहै. . ।. उत्तरा के ओकरा सॅ भेंट सीनियर्स के फेयर वेल पार्टी के मंच प’ भेल रहै. . जखन दूनू गोटे एक टा कोरस गेने छल. . .कि जादू छलै. . ओकर आवाज मे. . राजस्थानी सूफी गायक बला . . देखैतो राजपुरूष. . .राजस्थान के बासिन्दो छलै.. . अहि सॅ बेशी ओकरा किछु जानबा के उत्कंठा कहियो भेबो नै कैल रहै ।
गीत संगीत सॅ दुनु के लगाव एक टा नव रिश्ता कायम करि देने छल. . जे सर गम के सातो स्वर मे ओ दुनु सेहो समाहित ।कैम्टी फॉल मे नहैत. . .धनोल्टी के गेस्ट हाउस के बरामदा प’ राखल बडका कुरसी प’ बैस. . ओ दूनू त संगीतक नदी मे पौडैत गप सॅ बेसी गीते गाबैत रहैत छल ।
सुरकंडा देवी के यात्र्रा लेल वएह जिद केन्ो रहै. . नै त’ विकल के धरम करम सॅ कोनो मतलब नै. . .मुदा ओतेक ऊॅचाई प’ मेघक अपन घर मे. . . देखलक एकरा की झूंड के झूंड खिहारैत. . पकडि लेलक जेना ओकरे सबहक सुआगत लेल ठाढ़ . भयंकर नाद से विष वमन करैत बरसैत रहल. . ।ऊत्तरा के त’ हिम्मत प’ मनोमन पाथरि लदा गेल रहै ।ओ त’ गाडिए मे बैसल रहल. . मुदा. . विकल पानि के चिरैत. . ऊपरक चढाई प चढैत रहल मात्र ओकरे लेल ।ओतेक पानि मे पिच्छडि के बिन परवाह केने .. अपना के चार्वाक शिष्य घोषित करए वाला. . ।
बाजै ओ बड कम . .मुदा ओकर ऑखिक छलकैत भाव मे उत्तरा के सब प्रश्न क’ उत्तर भेंट जाय ।ओकरा प्रेम के आध्यात्मिकता पर नजरि पडय लगलै. . .अहि इंस्टीच्यूट मे आबए सॅ पहिने ओकरा होशे हवास कत्त छलै. . इम्हर ओम्हर ताकए झॉकए के. . .पढाई. . पढाई आ’ पढाई. . .सदिखन प्रथम प्रथम पाबैत .. .ओकर मनोबल. . अप्रत्याशित रूपेन ताकतवर भ’ चुकल छल. . . आ जखन अहि ठाम आयल. . .अहूॅ मे प्रथम. . .।ओकरा लागै असफलता की होबैत छै. . .केहेन होय छै आकांक्षा के अपूर्ण रहि जेनाय ।घर सॅ बाहरि धरि ओकरा प’ ईश्वरक असीम अनुकंपा. . ओ त’ धरती सॅ जेना पचास फीट ऊपर .।आ’ विकल सॅ मिलब ओकरा लेल अप्रत्याशित अनुभव छल .. .प्रेमक प्रथम अनुभूति. ... . . .माता पिता के विरोध केनाय स्वभाविक छलै . क़त्तेको सुयोग्य वर छॉटिक क’ रखने रहैथ. .जै पर ओ आंगुर रखै. .।मुदा ओकर प्रचंड जिद्द. . .आब ओहि मे अहंकार से हो संग ध’ नेने रहै. . .जाति पॉति .. आब के मानै. . छै. . ई जिन्दगी फेर नै भेटत. . . ।के गारंटी लै छै जे स्वजातिय मे विवाह केला सॅ स्वर्ग जेबा के रास्ता खुलि जाए छै. .।आब एत्तेक योग्य . . .निर्णय लेबा मे माहिर संतान के सोझा कोन माता पिता टिकतैथ. . .हथियार खसा देलखिन ।
विकल कहल. . .हमर अहि संसार मे अप्पन कहए बला अछिए के. . पता . .नहि क़त्तय जनम लेलौ. . .केहेन मॉ के प्रेम ..होय छै. . केहेन पिता के दुलार होय छै .. .अनाथालय मे पलल बढल . . ।अहॉ लेल त’ अप्पन जान देबा के मौका आयत पाछॉ हटय बला प्राणी हमरा नहिं बूझब ।अहॉ सॅ हमरा संसार भेंट गेल. . जेना प्रेमक प्रथम पाठक ज्ञान क’ संग संसारक ज्ञान भेल. ।’ओ कुमारक गरिदनि प’ एक हाथ रखने .. गाडी के खिडकी सॅ बाहर . . प्रकृति के अवलोकन मे लागल छल. . क़ि . .किरर. ऽऽऽऽऽ््््. संगे गाडी रूकि गेलै. . । ‘की भेलै. . .ओ अकचकाएल. . “ट्रैफिक जाम. .’
. रहस्यमय मुस्कुराहट संग विकल बाजल । ‘पहाडो प’ ट्रैफिक़ . ।’ ओकरा मुॅह सॅ निकलल आ’ दुनू खूब जोर सॅ एक स्वर मे हॅसि पडल छल ।सोझा मात्र तीन टा गाडी लागल .. .पुलिस कंट्रोल करैत .. ।
जाडक छोटका दिन जकॉ अति शीघ्र ट्रेनिंगक ओ अल्पावधि बीत गेल छल. . .बिना झंझट. . खर्च वर्च के कोर्ट मे जाकए. . अपन जन्मजन्मांतर के संबंध पर मोहर लगबा लेलक .. ।एतेक लग रहिओ क’एक दोसर के किछु जानबा बूझवा के मौको नञ्ािं भेटलै . . .तखन लागै संगीते जीन्दगी छै. . मुदा बाद मे लगै . . ओ त’ मात्र .. दूनू के कॉमन हॉबी. . आर की.. ।
अचानक ओकर हाथ मे ज्ोना माइक्रोस्कोप आबि गेलै. . .ओकर. . बैसब. . ओकर उठब .. पहिने कोना बजै छलै. . आब. . .नै कोनो तमीज नैं तहजीब .. . छोट छोट गप प’ चिडचिडायल सन. . .एक दिन जूत्ता पर पॉलिस नै लागल रहै त’ तामसे आन्हार भ’ पियुन प’ जूत्ता फेंक देलकै. . हजारि रंगक अजगुत गारिक संग ।
पोस्टिंग त’ दूनू के एके शहर मे छलै .. मुदा दू मिनिस्ट्री मे ।आ अही बीच जेना प्रेमक रंगीन चादरि के एके धोआन मे रंग जबरदस्त भखरए लगलै .. ।छोट छोट गप. . सोचलक . .आर सब मैनर्स त’ सीखिए जैतै. . .मुदा एकरा भीतर तामस किएक एत्तेक भरल छै. . ओ कोना कम हेतै. . .कोन दुख छै. . .कोन अपराध भाव सॅ ग्रस्त छै. . बजतै. . तखन नै .. किछु समाधान . .कोनो काउंसिलिंग हेतै ।
अहि पोस्टिंग मे ओकर प्रथम शिशु के जन्म भेल रहै. . .मैटरनिटी लीव प छल. . .कुदरत के अजगुत ईनाम पाबि क’ ओकर आत्मा परि तृप्त भ’ गेल छल. . आब किछु नै चाही प्रभु. . .अपन कृपा अहिना बरसेने रहब ।ओकर मॉ पापा आबि क’ किछु दिन ओकर सुख मे शामिल भेल छलखिन्ह. .।
विकल के सुभाव ओकरा किछु विशेष बदलल लागै. . ।ऑफिस सॅ आबैत मातर बच्चा के कनी मन्ाि कोरा कॉख मे ल क’. . चाह ताह पीबि क’ सीधे अपन स्टडी मे चलि जाए. . ।कोनो खास गप सप्प नै. गीत संगीतक दरिया जेना सुखा गेल छल .. . .राति मे डिनर करैत दोसर कमरा मे जा कए सूति रहै. . बच्चा भरि राति कॉय कूय करैत सूतै जे नै दैक़ . इहो सही. . ओ त दिन मे सूति क’ नीद पूरा करि लैत छै. . मुदा विकल के दिन मे कत्त चैन . . ।
छुट्टी मे पडल पडल. .आब ओ बड बोर होबए लागल छल. . बच्चा के कामकाज देखभाल करए बाली बंगाली आया के वात्सल्य प्रेम देखि ओकर मन एकदम प्रसन्न .. ओकरे नीन सूतै ओकरे नीन जागै. . नहायब सफाई. . नैपकिन बदलब. . डिटॉल सॅ ओकर कपडा सब के पखारब . .एकदम समय प’ दूध बना क’ बोतल सॅ पियाएब. .सांझ मे प्रैम प’ सूता क अहाते मे कनी मन्ाि घूमा दै. . एक बेर ओकरा कहबा क’ देर छलै. . ओ फट स’ सीख क’ अनुकरण करए लागै. . ।उमहर सॅ धियान हटि क’ विकल प केन्द्रित भ’ गेलै. . .एतेक उदासीनता किएक एकर व्योहार मे. . .कनियो कोनो अपना पन नै. . पी 0आर 0के स्टाफ जेना बस ठोर पटपटा क’ हाल चाल पूछि लै. . ।नै ऑखि मे ओ चमक .. नै. . ठोर प’ मुस्कुराहट. .. . । ओकरा मोन पडलै. . .पहिनो त’ ओ नहिए बाजै. . छल बेसी. . जखन दूनू के भेंट होय. . त’ गीतकार .. संगीतकार क चर्चा सॅ सुरू होय आ’ गीत प’ आबि क’ समाप्त. . .।किंस्यात किछु परेशानी सॅ गुजरि रहल होयत ।घर मे पडल पडल ओकर दिमाग शैतानक अड्डा बनि गेल छल. सोचलक . बड आराम भेल आब ड्युटि ज्वाइन करि लेबा क’ चाही .. दू मास त’ भैए गेलै. . ।
एक दिन ओकरा जखन रहल नै गेलै. . ओ चुप्पे ओकर स्टडी मे जा कए पाछॉ सॅ ओर गरा मे हाथ धरि क’ अपन कान ओकर गाल मे सटबैत बाजल ‘कि भ’ रहल छै एतेक मुस्तैदीसॅ।’ हास्य मे कहल ई शब्द ओकरा एकदम चौंका देलकै. . चट सॅ अपन डायरी बन्न करि ओ अपना के ओकर बाहुपाश सॅ मुक्त करैत ठाढ भ’ गेल छल .. ‘अरे चलू तैयार भ’ जाए हमसब एक टा नाटक देखय चलैत छी ।’आ’ हाथ पकडने बाहर बरामदा मे चलि आयल छल ।
ओय दिन जे भेल हो मुदा एक टा संशय के बीजारोपण त’ अवश्य भ’ गेलै . .। ओकर मन औउनाइत रहलै. . ओ लिख की रहल अछि जे ओकरा सॅ दुराव छिपाव करए पडि रहल छै .।परोछ मे ओही कोठरी मे जाए त’ आलमरी मे ताला लटकैत. . .के जानै कुन्जी कत्तय छै. . ।आब जखन ठानिए नेने रहै ..रहस्यक उदघाटन करए लेल तखन कोन गप . .।ओय कोठरी मे बगीचा दिस सॅ सेहो एक टा खिडकी छलै. . जै प’ सदिखन परदा फैलल रहै छल।दिने मे ओ ओही परदा के कनी घिसका देने रहै ।रात के बारह बाजल . .चारों कात अन्हार .. सन्नाटा. . ।सब कियो खा पीबि क’ सूतल .. कुमार अंगेठीमोचाड करैत कुरसी सॅ उठल. .. ड़ायरी के अनबीरा मे बन्न करि कुरसी प’ चढि कुन्जी के रोशनदान मे राखि देलक ।बस . .ओ दिन छलै .. . ।
चक्र सुदर्शन सॅ ओकर गरा कटि गेल रहै . . .मस्तक . .कुरसी प’ बैसल .. शरीर. . धरती प’ खसल. .शोणित सॅ .. लथपथ. . .पॉच पॉच हाथ तडपैत. . .मुदा कत्तेक तडैपतैक़ . कनिए काल मे शान्त भ’ गेलै. . टेबुल प’ राखल मस्तक आब पूर्ण गंभीर भ’ क’ आगूॅ के रणनीति सोचैत रहल. . .।मामला गहीड छलै . .सोचबा मे समय लगलै ।
घर के शान्ति सामान्य रहल्ौ. . .भोजन बनै. . खेनाय खायल जाए. .बच्चा के झूला प’ झूलायल जाय. ..दासी मुसीक मुसीक क’ मेमसाहब के रंग बिरंगी किस्सा कहै. . मेम साहब ठहक्का मारै. . . मुदा ज्वाला मुखी धधकैत रहलै. . लावा नै बहरैलै. .तै स की . ।
अपन टा्रन्सफर नार्थ ईस्ट मे करा क’ बिना खड खडकेने . .निःशब्द महात्मा बुद्व जकॉ निशा रात्रि के फ्लाईट सॅ ओकर ओही घर सॅ .. पलायन भ’ चुकल छल ।
जीवन सॅ जीवन पथक लंबाई बेसी होइत एलैहैं ।नीचा हेरब . .खाधि. . गुफा. . वन .. पहाड़ . सागर. . .उपर मात्र एक टा नीरभ्र आकाश. .. .रंग बिरंगी उडैत पाखी . असीम शान्ति के खजाना .. .ऊपर सॅ धियान नीचा एलै. . ताकब सूरू कयल.. ..कोन पन्ना . .कोन पोथी. . कोन पंथ. . मंदिर .मस्जिद. .चर्च . .गुरूद्वारा . .गोनपा. . .ध्यान . .योग़ . ।मस्तिष्क फेर सॅ गरिदनि सॅ जुडि गेलै. . आब ह्दय मे जे परिवर्तन भेल होय. . दिमाग एकदम शान्त. . ।जीवन क’ ओही नाटकीय मोड प ‘यवनिका पतति’ कहि कहिया कत्त नै पूर्ण विराम लगा देल गेल छल।कोनो ‘हयु एन्ड क्राय’ नै मचलै ।
मसूरी मे फेर अयबा के कोनो सरकारिए प्रयोजन छलै ।आय ओकरा संग ओकर कोर्स मेट वान्या छल।समय अपन शाश्वत फेरी लगबैत ओहि ठाम कनि विसेष काल के लेल विलमल छल. .थाकल थेहियाएल. . ओंघाइत. . ओकर विश्राम क’ मूड देखि जडि चेतन सब अपन श्वॉस रोकने. . कियो कोनो उकठ्ठी नै करै. . कनियो सोर नै हुए . .।सडकक कात बनल बेन्च प’ बैसल ओ ओहिना सोझा के पहाड प’ दूर्््ऽऽऽऽऽऽ्चरैत
बकरी के देखय लागल।ओही दिन जेकॉ आय सेहो बकरी चरैत छल. . कारी कारी बिन्दु मात्र ।ऑखि मे चमैक उठलै. . . ‘गडेरिया क’ जीनगी. . पहाड हो वा रेगिस्तान . असुविधा .. कष्ट सॅ भरल. . दीन हीन लाचार बीमार ‘ भीतक छोट छोट घर .. .उजडल उडल छप्पर . . माटीक चूल्ही प’ चढल माटीक बासन .मे . . .खदकैत. . भात. . . .माटिए के परात मे .. सानैत. . बाजरा के आटा . .चुनरी सॅ गंदा हाथ पोछैत. . खीझैत. . धूऑ सन मूॅह वाली स्त्री. . नीमक गाछ तर पडल खटिया .. चीलम पीबैत. . खोंखी करैत जर्जर वृद्व. . .ताड के पटिया प’ चीक्कट केथडी .. .फुल्लल हाथ पयर . .पीडा सॅ कहरैत कृशकाय वृद्वा. . . कनिए हटि क’ पॉच. सात ..नौ .. बरखक नंग धडंग धीयापुत्ता . करिक्का बकरी के बच्चा संग खेलाइत ..गाछ सॅ बान्हल माटिक बासन मे पानि पीबैत बूढ घोडा चारहु कात पसरल लिद्दी. .।’ घबडा क’ ओ ओही दिस सॅ मुॅह फेर नेने छल. ।मुदा कनिए काल मे नै जाने ओकरा की फुरलै ।वान्या के ई प्रसंग सुना ओ ओकर मन्तव्य जानबाक’ कोरसीस कयल. . ‘ई बता जे ओ गडेरिया पैलवार केकर प्रतिक्षा करैत रहै छल .. ओहेन नितांत गरीबियो मे ओकरा केकर आस छल हेतैक ।’ देवदार के सुडौल वृक्ष निहारैत. . वान्या कनि काल मुस्कैत रहल फेर ओकरा दिस ताकैत बाजल. ‘आर केकर . .ओही रोटी ठोकए वाली के जे मैल हाथ अपन चुनरी मे पोछैत छल .. आ .. जेकर तीनों बच्चा बकरी के बच्चा संग दौड लगबैत छल. .ओकरे .घरबला के .. आखिर ओही पैलवार मे ओकरा अलावा और के हेतै कमाए बला . . ।’
“की।”
“नै एकदम ठीक ।कोनो पढल लिखल अपन पैर प’ ठाढ जागरूक स्त्री एहेन पैलवार के किएक शत्रु बनतै ।’
“मतलब’ ।वान्या कनि अचरज सॅ . कनि गहन दृष्टि सॅ ओकरा दिस ताकलक।
“तौं नै बूझबही।’अनंत मे ताकैत .. अत्यंत विरक्त भाव स क’हि’ ओ वान्या संग ओहीठाम सॅ उठि वापस अपन गेस्ट हाउस मे चुपचाप चलि आयल छल .।।
२
सत्यनारायण झा
दुटा बात पुत्रक
जन्म दिन पर---- आइ हमर जेष्ठ पुत्र
चि० श्री सुमनजीक जन्म दिन छनि |हमर आशीष आ शुभ
कामना |जिनगी मे पूर्ण सफलता पाबथि आ अपन मेहनतिक किछु
अंश गरीब गुरबाक मदति मे लगाबथि |बेटा कतबो पैघ भ’ जाइक,माय बाप क’ बच्चे
बुझायत छैक |बाल बच्चाक जन्म दिनक सुअवसर पर घर मे जन्म
दिनक गप्पक क्रम मे माय बाप क’ बरबस संतानक बचपन मोन परि
जाइत छैक ,से आइ हमरो सुमनजीक बचपन याद भ’ गेल अछि |कोना हुनक जन्म भेलनि ,कोना पैघ भेलाह ,कोना बच्चा मे ठेहुनिया देथि ,कोना चलनाइ सिखलनि,कोना पढलनि आ कोना एखन
वर्तमान मे छथि |एकएक पल मोन परैत अछि |किछु पल एहन होयत छैक जे माय बापक मोन उदास क’ दैत छैक आ किछु एहन होयत छैक जे देह मे अनेरे गुदगुदी लगैत छैक आ अनेरे
हँसी लागि जाइत छैक |हमरा तीन संतान दु पुत्र आ एक बेटी |तीनूक लालन पालन ,शिक्षा –दीक्षा ,पढ़ाई –लिखाई
बहुत अनुशासित ढंग सं कयल आ ओ लोकनि पूर्ण अनुशासित छथि |जाहि
ठाम अनुशासन नहि बुझू ओतय क’ मालिक भगबाने |
बालबच्चा क’ अनुशासन मे राखी
मुदा एकटा मित्र जकाँ बचचा संग खेलाऊ |हमहू सैह करैत छलौ |बहुत आनन्द होयत छल |आब ओ सभ त’ अतीतक एकटा खिस्सा भ’ गेलैक |एखन दु मास सं हमर पौत्र चि० आकर्ष हमरा संग पटना मे छल |ओना ओ लोकनि दुबई मे रहैत छथि |भरि दिन आकर्ष
संग खेलाइत छलौ |राति क’ ओ कहैत
छल जे दादाजी खिस्सा कहूँ आ हम सुमन जीक बचपन,विभुजीक
बचपन आ रजनीक बचपनक खिस्सा सूना दैत छलियैक आ ओ प्रसन्न भ’ जाइत छल |अपनो हम बहुत खुशी रहैत छलौ |खिस्सा सुनबैत काल हम सतत अतीत मे चल जाइत छलौ |खीस्से सुनबैत सुनबैत एकटा विचार मोन मे आयल जे जन्म दिन पर कियैक ने
एकटा कविता लिखी जाहि मे बचपन सं एखन तकक
झलक होयक |एहि कविता क’ अपने सभ अवश्य पढू |एहि मे कोनों साहित्य नहि छैक ,एहि मे मोनक बात बाते जकाँ लिखल
छैक जे सरल आ सहज छैक |आग्रह अपन पुत्र सं जे एहि पाँती क’ अवश्य
पढथि |
३
कैलास दास, पत्रकार, जनकपुर
खोजय पड़त मातृत्व बालगीत
हमरा अखनो स्मरण अछि बाल्यकालमे हमरा सभक खेलय वाला एकटा समूह छल । ओहिमे लडका–लडकी के अछि कोनो मतलव नहि । एकटा हाफ पैन्ट आ गँजी लगा कऽ कोनो आम गाछ होए वा घरक दलान चाहे कोनो सार्वजनिक स्थल किए नहि होएँ । झुण्ड बना कऽ कबड्डी, आम गाछी, गोटी गोटी सँगहि खपडाके फुटलहवा लऽकऽ जमिनमे चिर पारि ‘रेङ्ग, रेङ्ग ’खेलतहुँ त कखनो विद्यालय के घर या अपने दलाने मे जा कऽ पाच गोटे मिलकऽ ‘झिझिर कोनो झिझिर कोना कोन, कोन कोना जाउँ । साउस मारलक ठुमका पुतौहुँ कोना जाउँ’ स्मरण अबय त मनेमन अखनो मुस्की सेहो होबय लगय ।
ओहि समय केँ बहुत किछु याद त नहि अछि मुदा एकटा हाँस्य व्यँङ्ग हम सभ एहनो करैत छली ।
‘अण्टा रे भण्टा
हम दू भाई
पटना जाई
झुमका लाई
सासु के पहिनाई
तऽ पुतहुँ झुमकाई ।’
लेकिन आई हम सभ फेर सँ ओहि बाल अवस्था सभक बीच जाएबाक मौका मिलैत अछि तऽ आश्चर्य लगैत अछि । ओना तऽ पहिले जाका बच्चा सभक झुण्डो नहि अछि । आ एछियो तऽ ओकरा सभक बीचमे एहन गीत सुनवाक अवसर मिलैत अछि–
‘परदेशी, परदेशी, जाना नही
मुझे छोडके, मुझे छोड्के ।’
‘चलि आना तू...तू.. पान की दूकान पे
साढे तीन साढे तीन बजे ...।’
गाम ओहे छैक मुदा दलान नहि अछि । बच्चा बुच्ची ओहने अछि मुदा वातारण नहि । गाछवृक्ष छैक लेकिन ओ समूह आब नहि । मातृत्व बाल गीत (फकरा) के स्थान मे हिन्दी, अँग्रेजी,भोजपुरी वातावरण सभ ठाममे छा गेल छैक । कखनो काल हमरा सभक बीच झगडो होइत छल मुदा मुडही, लाई, चाउरक रोटी, भूजा खाएक लेल मुदा अखन देखैत छी सिंगरेट, दारु, गुटका पान परागके लेल आई हमर भाज त काल्हि तू नहि खुवाएबे त देखैबो कहि क झगडा करैत अछि ।
वास्तव मे कखनो काल बडा आश्चर्य होइत अछि कि देखते–देखते ऐहन परिवर्तन कोना भऽ गेलय । एकटा हम सभ रही जे गुरु जी के देखते नुका जाई । मायबाबु आ अपना से बडका से हरदम डर लगाय । आई परिवर्तन सँगहि बच्चामे शिष्टाचार, आदर स्वभाव किछुओ नहि अछि । कोन बुढ, कोन जवान सभलगय एक समान ।
तखन एकर दोषी के त ? अवसय एहन वातावरण बनाबयमे हमरे सभक दोष अछि । जाधरि हम कमजोर नहि भेली त हिन्दी, अँग्रेजी आ भोजपुरी वातावरण हमरा उपर कोना चढि गेल । एकर खोजी करबाक अखनो आवश्यकता अछि । जाधरि मैथिली मातृत्व बाल साहित्य के अगाडि नहि लाएब तऽ दोसरक कला संस्कृति भेषभूष आ वातावरण एहने हमरा सभक उपर लदाइत रहत । ऐकर परिणाम भेटत भूखमरि, लुटपाट, धोखाधरी एतबे नहि अपन बालबच्चा अपने माय बाबु के भुला कऽ कखन की करत नहि कहि सकैत छी । तँ एकरा सभक दूर करबाक लेल मैथिली मातृत्व बाल साहित्यके अगाडि बढाबही पडत । ओना तऽ गैर सरकारी संस्था आसमान नेपाल बालबालिकाक लिखल ‘बाल शक्ति पत्रिका’ तीन महिना पर प्रकाशित कय रहल अछि ।
एहि सँ ओकर समाधान नहि अछि । ओहि मे एकदूगो बाल कविता सँ मात्र मैथिली मातृत्व के नहि बचा सकैत छी । ऐकरा लेल एखनो बुढ पुरानक बात विचार आ ओहिक समय वातावरण के ब्यख्या करही टा पडत ।
हमरा अखनो स्मरण अछि बाल्यकालमे हमरा सभक खेलय वाला एकटा समूह छल । ओहिमे लडका–लडकी के अछि कोनो मतलव नहि । एकटा हाफ पैन्ट आ गँजी लगा कऽ कोनो आम गाछ होए वा घरक दलान चाहे कोनो सार्वजनिक स्थल किए नहि होएँ । झुण्ड बना कऽ कबड्डी, आम गाछी, गोटी गोटी सँगहि खपडाके फुटलहवा लऽकऽ जमिनमे चिर पारि ‘रेङ्ग, रेङ्ग ’खेलतहुँ त कखनो विद्यालय के घर या अपने दलाने मे जा कऽ पाच गोटे मिलकऽ ‘झिझिर कोनो झिझिर कोना कोन, कोन कोना जाउँ । साउस मारलक ठुमका पुतौहुँ कोना जाउँ’ स्मरण अबय त मनेमन अखनो मुस्की सेहो होबय लगय ।
ओहि समय केँ बहुत किछु याद त नहि अछि मुदा एकटा हाँस्य व्यँङ्ग हम सभ एहनो करैत छली ।
‘अण्टा रे भण्टा
हम दू भाई
पटना जाई
झुमका लाई
सासु के पहिनाई
तऽ पुतहुँ झुमकाई ।’
लेकिन आई हम सभ फेर सँ ओहि बाल अवस्था सभक बीच जाएबाक मौका मिलैत अछि तऽ आश्चर्य लगैत अछि । ओना तऽ पहिले जाका बच्चा सभक झुण्डो नहि अछि । आ एछियो तऽ ओकरा सभक बीचमे एहन गीत सुनवाक अवसर मिलैत अछि–
‘परदेशी, परदेशी, जाना नही
मुझे छोडके, मुझे छोड्के ।’
‘चलि आना तू...तू.. पान की दूकान पे
साढे तीन साढे तीन बजे ...।’
गाम ओहे छैक मुदा दलान नहि अछि । बच्चा बुच्ची ओहने अछि मुदा वातारण नहि । गाछवृक्ष छैक लेकिन ओ समूह आब नहि । मातृत्व बाल गीत (फकरा) के स्थान मे हिन्दी, अँग्रेजी,भोजपुरी वातावरण सभ ठाममे छा गेल छैक । कखनो काल हमरा सभक बीच झगडो होइत छल मुदा मुडही, लाई, चाउरक रोटी, भूजा खाएक लेल मुदा अखन देखैत छी सिंगरेट, दारु, गुटका पान परागके लेल आई हमर भाज त काल्हि तू नहि खुवाएबे त देखैबो कहि क झगडा करैत अछि ।
वास्तव मे कखनो काल बडा आश्चर्य होइत अछि कि देखते–देखते ऐहन परिवर्तन कोना भऽ गेलय । एकटा हम सभ रही जे गुरु जी के देखते नुका जाई । मायबाबु आ अपना से बडका से हरदम डर लगाय । आई परिवर्तन सँगहि बच्चामे शिष्टाचार, आदर स्वभाव किछुओ नहि अछि । कोन बुढ, कोन जवान सभलगय एक समान ।
तखन एकर दोषी के त ? अवसय एहन वातावरण बनाबयमे हमरे सभक दोष अछि । जाधरि हम कमजोर नहि भेली त हिन्दी, अँग्रेजी आ भोजपुरी वातावरण हमरा उपर कोना चढि गेल । एकर खोजी करबाक अखनो आवश्यकता अछि । जाधरि मैथिली मातृत्व बाल साहित्य के अगाडि नहि लाएब तऽ दोसरक कला संस्कृति भेषभूष आ वातावरण एहने हमरा सभक उपर लदाइत रहत । ऐकर परिणाम भेटत भूखमरि, लुटपाट, धोखाधरी एतबे नहि अपन बालबच्चा अपने माय बाबु के भुला कऽ कखन की करत नहि कहि सकैत छी । तँ एकरा सभक दूर करबाक लेल मैथिली मातृत्व बाल साहित्यके अगाडि बढाबही पडत । ओना तऽ गैर सरकारी संस्था आसमान नेपाल बालबालिकाक लिखल ‘बाल शक्ति पत्रिका’ तीन महिना पर प्रकाशित कय रहल अछि ।
एहि सँ ओकर समाधान नहि अछि । ओहि मे एकदूगो बाल कविता सँ मात्र मैथिली मातृत्व के नहि बचा सकैत छी । ऐकरा लेल एखनो बुढ पुरानक बात विचार आ ओहिक समय वातावरण के ब्यख्या करही टा पडत ।
डॉ.अरुण कुमार सिंह, भारतीय भाषा का भाषावैज्ञानिक
सांख्यिकी संकाय,भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर
मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा
किछु समयसँ देशमे उच्चशिक्षाक माध्यम
एवं विषयवस्तुकेँ लए कए विमर्श चलि रहल अछि। एक दिस बाबा रामदेव अनशनक समय अपन
मांग मे भारतीय भाषाक माध्यमसँ उच्च शिक्षाक मांग रखलन्हि, तँ दोसर दिस मुंबई
उच्च न्यायालयक एक गोट फैसलामे कहल गेल अछि जे लोक सेवा आयोगक अंतिम परीक्षा
अर्थात् साक्षात्कारमे परीक्षार्थी अपन मातृभाषामे जबाब दए सकैछ। एक तरहेँ ई
कार्यपालिका पर दुईतरफा दबाब अछि । एक दिसतँ लोकतांत्रिक दबाब जनसमूहक रूपमे
रामलीला मैदानमे जमा भएकेँ, तँ दोसर दिस न्यायपालिका
भारतीय भाषाक पक्षमे निर्णय दए केँ। विश्वमातृभाषा दिवसक अवसर पर दिल्लीमे
बुद्धिजीवी एवं लेखकक प्रतिनिधिमण्डल सरकारकेँ एक गोट विज्ञापन देने छलाह, जाहिमे कहल गेल छल जे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी
नियमावलीमे पी.एच.डी.क लेल अनिवार्य दुई शोध-पत्रमे सँ एक मातृभाषामे हो। एहि
तरहेँ देखल जा रहल अछि जे अंग्रेजीकेँ कात करैत भारतीय भाषाकेँ प्रश्रय देबाक बात
शुरु भए चुकल अछि । मातृभाषा ओहन भाषा होइछ, जकर माध्यमसँ
कोनो नेता अपन घर, परिवार आओर समाजकेँ बुझि पबैछ। पहिल
भाषा होएबाक कारणेँ मातृभाषे कोनो व्यक्तिक चिंतन-प्रक्रियामे कार्य करैछ। एहि लेल
प्रतिभाक सभसँ पैघ अभिव्यक्ति पहिल भाषे मे होइछ। जँ कोनो व्यक्ति बहुभाषी अछि तँ
ओ पहिल भाषाक पृष्ठभूमि पर कोनो दोसर भाषा सीखैछ आओर एक तरहेँ चिंतन-प्रक्रियाक
बीचे मे मातृभाषा आओर दोसर भाषाक बीच अनुवाद करैत रहैछ। एहि स्थितिमे ओ दोसर
भाषामे कतबा निपुण अछि ई
एहि पर निर्भर करैछ जे ई मानसिक अनुवाद ओ कतबा कम समयमे कए पबैछ। संविधान स्वीकृत
22 भाषामे जतबा उच्च शिक्षण कार्य भए रहल अछि, ओहिसँ बहुत
बेसी एक मात्र अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ भए रहल अछि। आब प्रश्न उठैछ जे
जाहि शिक्षण-पद्धतिकेँ मैकालेक विरासत एवं आओर अंग्रेजी साम्राज्यक विस्तार कहल
जाइछ, ओकर कोनो ठोस विकल्प आइ धरि किएक नहि उभरि पाओल? एकर प्रमुख कारणमे भारतीय भाषाक आपसी संघर्षकेँ नजरअंदाज नहि कएल जाए
सकैछ। दोसर ई जे एहि भारतीय भाषाक ज्ञान-परंपरामे कतए धरि पहुँच अछि? की आइ प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन
आदि विधाक उच्चतम रूपकेँ भारतक कोनो क्षेत्रीय भाषामे सहजतासँ अभिव्यक्त कएल जाए
सकैछ? हमरा बुझने कठिन अछि। एहन बात नहि अछि जे
भारतीयभाषाक क्षमता संदिग्ध अछि, जखनकि लोकभाषाक शब्द-सामर्थ्य
बहुत रास भाषाक तुलनामे समृद्ध अछि। मुदा विषयवस्तुक उपलब्धता एकटा पैघ समस्या
अछि। एहि बातकेँ सहर्ष स्वीकार कएल जएबाक चाही। ओनाहूँ कोन भाषामे कीसब सामग्री
रहबाक चाही ई भाषा नहि, अपितु समाजक जिम्मेदारी होइछ। जँ
भाषा दरिद्र अछि, तखनो आर समृद्ध अछि तखनो।
विकासक अपन परिवेश
आओर अपन शब्दावली होइछ, जकरा दोसर भाषामे सम्पूर्ण रूपसँ
घुलि-मिलि जएबामे सालक-साल लागि जाइछ। उदाहरणस्वरूप ‘हेलो’ शब्दकेँ लेल जाए सकैछ। कहल जाइछ जे अमेरिकी आविष्कारक थॉमसन पहिल बेर
टेलीफोनसँ ई जानबाक लेल जे ओकर आबाज पहुँचि रहल अछि कि नहि ताहि लेल ‘हेलो’ शब्द बजने छल। तहियासँ आइ धरि टेलीफोनक
कतेक स्वरूप सोझ आएल, मुदा पहिल बेर बाजल शब्द ‘हेलो’ मे कोनो परिवर्त्तन नहि आएल। जँ इएह
आविष्कार भारतमे भेल’ रहैततँ ई पहिल शब्द कोनो-ने-कोनो
भारतीय भाषाक शब्द रहल होएत।
जँ आत्मालोचनक
दृष्टिसँ देखल जाए तँ भारतीय भाषाक वैज्ञानिकता पर कोनो संदेह नहि अछि। मुदा ओहिमे
अभिव्यक्त विज्ञानकेँ संदिग्धताक घेरासँ बाहर नहि लाबल जाए सकैछ। किएकतँ विज्ञान
एहि भाषामे जन्म नहि लैछ, अपितु अनुदित होइछ। आय जँ एक
दिस विश्व बजार पर स्थापित होएबाक प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि तँ दोसर दिस अपन
क्षेत्रीयताक पहचान समाप्त नहि भए जाए तकर दबाब सेहो देखल जाए रहल अछि। एहन
परिस्थितिमे भारतमे उच्च शिक्षामे स्थानीय भाषाक प्रयोगक चहुँदिस मांग एक
स्वागतयोग्य डेग भए सकैछ। परंच ओकर स्थायी स्तित्व तखन रहत जखन मूल एहि भाषामे पल्लवित-पुष्पित
हो। भाषा अभिव्यक्तिक साधन होइछ; आत्माक अभिव्यक्तिक आओर
सत्ता अभिव्यक्तिक सेहो। वर्त्तमान मांगक फलस्वरूप जाहि लोकभाषासँ भूख आओर
प्रतिरोध अभिव्यक्त होइछ एवं एकरा माध्यमेँ सत्तामे घूसपैठक चर्चा सेहो भए सकैछ।
की ई प्रयास सत्तासीन वर्गकेँ मंजूर भए सकैछ? तेँ ई देखब
बेस उत्सुकताक विषय होएत जे कोर्टक फैसलासँ लाभान्वित होइत छात्र मातृभाषामे
साक्षात्कार दए केँ चयनित होएबामे कतबा सफल होइछ।
भारत एक बहुभाषिक
देश अछि, जतए 1652 मातृभाषा अछि। संविधान जाहि 22 भाषाकेँ
मान्यताक देलनि अछि ओहो कोनो अंतिम भाषा नहि अछि। संवैधानिक मान्यताक लेल बहुत रास
भाषा-भाषीक एक पैघ समूह बरोबरि सक्रिय अछि, आओर कोनो एहन
तर्क नहि अछि जकर आधार पर एकर सक्रियताकेँ नजरअंदाज कएल जाए सकैछ। जखन कोनो भाषा
रोजगारसँ जुड़ैछतँ एहि तरहक प्रयासकेँ आर बल भेटैछ। ओनातँ मैसूर स्थित भारतीय भाषा
संस्थानक अन्तर्गत भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’मे नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक माध्मयमे मैथिलीकेँ मशीनसँ जोड़बाक काज
प्ररांभ भए गेल अछि संगहि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन ज्ञानपरक पोथीक भारतक 22 भाषामे
अनुवादक योजनापर काज कए रहल अछि। एहि सबसँ माध्यम भाषे मे बदलाव आओत, जखनकि आवश्यकता एहि बातक अछि जे एहि भाषासभमे ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध
हुए जाहिसँ समाजक आग्रह स्वतः एहि भाषासभक प्रति बनए आओर उच्च शिक्षामे भारतीय
भाषाक संग-संग मैथिली
सेहो अपन वृहत्तर दायित्वक सामंजस्यपूर्वक निर्वहन कए सकए। ई सब तखन संभव भए सकत
जखन मैथिल (मिथिलामे निवास करए वला सभ जाति, वर्ग,
धर्म एवं सम्प्रदायक लोक) अपन मौलिक चिंतन एवं शोधक माध्यमसँ एकर
नेतृत्त्व करताह।
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