विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य
भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक:
उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत
उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा
खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल
नेपालीसँ मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग-
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद
विनीत उत्पल)
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद
विनीत उत्पल)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग
पहिलुक परिच्छेद
अंग महिमा
प्राचीन अंगक निर्माणकेँ लऽ कऽ कतेक रास कथा प्रचलित अछि।
वाल्मीकि रामायणक मुताबिक, जतए शोभाशाली कामदेव अप्पन अंग छोड़ने छल,
ओ अंग देशक नामसँ विख्यात भेल।
अयोध्यासँ सिद्धाश्रम जाए कऽ बाटमे राम-लक्ष्मणक संग
विश्वामित्र एक राति गंगा आ सरयूक कातमे बितौने छल। ओतए शुद्ध अंत:करणबला महर्षि
सबहक पवित्र आश्रमक परिचय दैत विश्वामित्र बाजल छल जे कहियो एतए भगवान शिव
चित्तकेँ एकाग्र कऽ तपस्या करैत छल। ओइ काल कामदेव मूर्तिमान छल। ओ अप्पन देह धारण
कऽ विचरण करैत छल। एक दिन भगवान शिव समाधिसँ उठि कऽ मरुद्गणक संग कत्तौ जा रहल छल।
ओइ काल ओ दुर्बुद्धि हुनकापर आक्रमण कऽ देलक। भगवान शिव हुंकार कऽ हुनका रोकलक आ
अवहेलनापूर्वक ओकरा दिस ताकलक।
फेर तँ कामदेवक सभटा अंग हुनकर देहसँ जीर्ण-शीर्ण हुअए
लागल। कठिन तापसँ दग्ध भेल कामदेव ओतएसँ भागि गेल। जइ ठाम पर कन्दर्पक देह पूरा
तरहे नष्ट भेल, वएह प्रदेश अंग देशक नामसँ विख्यात भेल। 1
अंग देशक नामकरण ओतुक्का एकटा राजा अंगक नामपर भेल छल। आनव
राज्य, जकर धूरी अंग छल, पाँच टा राज्यमे
विभक्त छल, जकर नामकरण राजा बलिक पाँचटा पुत्रक नामपर भेल
छल। आनवक अधिकारमे संपूर्ण पूर्वी बिहार, बंगाल आ उड़ीसा छल,
जइमे अंग, बंग, पुण्ड्र,
सुहा आ कलिंङ्क राज्य छल। अइ मे अंग एकटा बड़ शक्तिशाली जनपद छल।
वाल्मीकि रामायणक मुताबिक सुग्रीव सीताकेँ ताकै लेल अप्पन
वानर सैनिककेँ पूरबक देशमे भेजने छल, जइमे अंग सेहो एकटा छल।2
तइ कालमे अंगक विस्तार असीम छल। किएकि बलि पुत्र अंगक बाकी चारि
भायक राज्यक सत्ताक केंद्र अंग राज्य छल।
ई तथ्य सेहो विचारणीय अछि जे महाभारतक (शांतिपर्व, 296) मुताबिक, आदिकालमे चारि टा गोत्र छल, भृगु, अंगिरा, वशिष्ट आ कश्यप।
ऋग्वेदक दोसर, तेसर, चारिम, छअम आ आठम मंडलमे जइ ऋषि सभकेँ मंत्र प्राप्त होइत अछि ओ अछि, गृत्समद, गौतम, भारद्वाज आ
कण्व। आचार्य अश्वलायन अष्टम मंडलक वंशकेँ गोत्र द्योतक मानैत अछि, संग-संग अइ मंडलक ऋषिक प्रगाथा सेहो कहल जाइत अछि। हुनका अनुसार, अइ मंडलक पहिलुक सूक्तक ऋषि प्रगाथ छल जे स्वयं कण्व वंशी छल। अइ मंडलक
एगारह वालखिल्य मिल कऽ कुल १०३ सूक्त कण्वक अछि। गौतम आ भारद्वाज अंगिरा वंशक मानल
जाइत अछि आ कण्व सेहो अंगिरसेक अछि। अइ तरहेँ अइ पाँच मंडलमे अंगिरसक प्रधानता
स्वयं सिद्ध अछि।
अइ मंडलक ऋषि कुल अंगिरस, अंग द्वीपक ऋषि
छल। स्वयं इंद्रक ऐरावत हाथी पदमर्दन कऽ देने छल, अइसँ
तमसाएल दुर्वासा इंद्रकेँ शाप दऽ कऽ हुनका सत्ताच्युत कऽ देलखिन। इंद्र राजा बलिसँ
सहायता मांगलक। राजा बलि इंद्रक संकेतपर देवलोकेपर अधिकार कऽ लेलक। बलि अंगद्वीपक
राजा छल।4 ओ अप्पन पाँच शक्तिशाली पुत्रमे अंगक जनपद बाँटि
हुनका सभकेँ ओइ ठामक राजा बना देलक। एकर बादो अंग असुर-सुर संस्कृतिक मुख्य केंद्र
छल। ऋग्वेदसँ स्पष्ट ज्ञात होइत अछि जे अंगिरस आ हुनकरे वंशज यज्ञ कर्मक जनक छल। ओ
अइ रहस्यक पहिलुक ज्ञाता छल जे यज्ञाग्नि काष्ठमे निहित छल। अइ तरहेँ अंगिरिस सभ
अग्निक प्रयोगसँ सभसँ पहिलुक यज्ञोत्सवक नींव देने छल।
प्राचीन भारतमे जे सोलह महाजनपदक चर्चा अछि, ओइमे अंग प्रमुख छल। शेष महाजनपद छल, मगध, काशी, कौशल, बज्जि, मल्ल, वत्स, चेदि, पांचाल, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति,
गान्धार आ कम्बोज।
अंग आ मगधमे निरंतर संघर्ष चलैत रहैत छल। बुद्ध कालमे मगधक
राजा बिम्बसार अंगकेँ जीत कऽ मगधमे मिला लेने छल।
अंग वा अइ पूर्वी प्रदेशक लोग आ राजतंत्र ब्रााह्मण ग्रंथमे
व्रात्य नामसँ जानल जाइत अछि। व्रात्यक शाब्दिक अर्थ अछि व्रतकऽ धारण करैबला मुदा
एतए एकर प्रयोग बड़ गर्हित अर्थमे भेल अछि। एकर तात्पर्य अछि अनार्य, वैदिक कर्मकांड विरोधी आ वर्णसंकर। सावित्री आ उपनयनसँ भ्रष्ट द्विजातिकेँ
मनुस्मृतिमे ब्राात्य कहल गेल अछि।
द्विजात्य: सवर्णास्त जनयन्तवुतास्तयान।
तान सावित्री परिभ्रष्टान व्रात्यानिति विनिर्दिशेत।।
मनुस्मृति 10/20
महाभारतमे व्रात्यकेँ पातकी कहल गेल अछि। एकरा मुताबिक, व्रात्यकेँ आग लगाबैबला, विष दैबला, मदिरा बेचैबला, कुसीद भक्षण करैबला, मित्र द्रोही, भ्रूण हत्यारा, व्यभिचारी
आ ब्रह्मघाती कहल गेल अछि।5
अइ तरहेँ व्रात्यकेँ ब्रााह्मण ग्रंथमे पतित कहल गेल अछि।
वेदमे सेहो अइ ठामकेँ बड़ हेय दृष्टिसँ देखल गेल अछि।
ऋग्वेदक प्रमगन्द शब्द अंग भंग आ मागध लेल प्रयुक्त भेल अछि। मागधकेँ वेदमे कीकट
कहल गेल अछि। एहन लागैत छै जे संपूर्ण पूर्वी प्रदेश कोनो सांस्कृतिक अभिशापक
आगिमे झुलसि रहल अछि आ वैदिक राजनीतिक शिकार बनि गेल अछि। अइ ठामक लोकक लेल
चुनल-चुनल खराब शब्दक प्रयोग करैमे नै तँ वेद मंत्रकार पाछाँ रहल आ नहिये महामुनि
व्यासे।
ऋग्वेदमे एकटा ऋषि इंद्रसँ प्रार्थना करैत अछि, मगधक गाय कोन काजक अछि जकर दूध यज्ञमे अहाँक काज नै आबैत अछि। (यानि कीकटक
गायक दूध सेहो अपवित्र अछि आ ओकरासँ यज्ञ कर्म करैक लेल वर्जना अछि) सोमरसक संग
मिल कए ओ दूध यज्ञपात्रकेँ गर्म नै करैत छै। तइसँ हे इंद्र! ओइ नैचाशाख प्रमगन्दक
(निचला शाखाक अंग बंग आ मागध) ओ धन हमरा दिअ।6
अथर्ववेद तँ एक डेग अओर आगू अछि। अथर्ववेदक एकटा ऋषि कहैत
अछि, जेना मनुख आ उपभोगक अन्य सामान एक ठामसँ दोसर ठाम भेजल जाइत
अछि, ओइ तरहेँ ज्वरकेँ गन्धार भूजवान, अंग, मगध प्रदेशमे भेजि देल जाइत अछि।7
आखिर वेद ब्रााह्मण ग्रंथकेँ अइ प्रदेशपर एतेक कोप किए अछि? आउ, विचार करी। ब्रााह्मण द्वारा विनिर्मित जइ यज्ञ-योगादि क्रियाक उदय सप्त सिंधुक घाटीमे भेल, बड़ जोर
मारलाक बादो ई विधि-क्रिया भारतक अइ पूब क्षेत्रमे अप्पन जड़
नै जमा सकल आ ने ब्रााह्मणवाद आ ब्राह्मण विचारधारा अइ भागमे अप्पन सत्ता काएम कऽ सकल।
किएकि व्रात्य आर्य भेलाक बादो वैदिक कर्मकाण्ड, पशु
हिंसाबला यज्ञ आ बड़ खर्चबला विधि कर्मक विरोधी छल।
ब्रााह्मण अपनो अइ धरतीपर बसै लेल नै चाहैत छल। एतुक्का
निवासी स्वतंत्र विचारक, ज्ञानी आ तपस्वी छल। ओ अपन आचरण, व्यवसाय आ संस्कृतिपर ब्रााह्मणक छाया धरि सहन करै लेल तैयार नै छल। जे
कोनो ब्रााह्मण तपस्वी तपस्याक लेल अइ क्षेत्रमे छल, सेहो
कमलक तरहेँ जलसँ ऊपर छल। हुनका एतुक्का व्रात्यसँ कोनो संपर्क नै छल। स्वयं
ऋष्यश्रृंङ्ग लऽ कऽ रामायणकार वाल्मीकि कहैत अछि- सदिखन
पिताक संग रहैसँ विप्रवर ऋष्यश्रृंङ कोनो दोसराकेँ नै जानैत छल।"8 अइसँ स्पष्ट अछि जे ब्राह्मण ऋषि जन-सामान्यक
संपर्कसँ अपनाकेँ अलग राखैत अछि।
कौशिकी महिमा, पुण्याश्रम
विश्वामित्र सेहो तपस्याक लेल अइ पूर्वी इलाकाकेँ चुनने छल।
कोशीक कातपर ओ बड़ कठिन तपस्या केने छल जइसँ सृष्टिक मूलचक्रे हिल गेल छल। एहन भूभागमे
कतेक तत्वज्ञानी क्षत्रिय-ब्रााह्मण केर चलाएल गेल विधि क्रियाकेँ
त्यागब प्रतिष्ठित करैपर जोर देलक। अइ भागक पिछड़ल आ गरीब जनताक लेल ई नब आ
क्रांतिकारी मार्ग-पद्धति अनुकूल सिद्ध भेल।9
चारू दिस नदीसँ आच्छादित अंगक ई उत्तरबरिया हिस्सा, घना जंगलसँ परिपूर्ण छल। एकर रमणीयता सेहो अद्वितीय छल। तइसँ महर्षि
कश्यपक पुत्र विभाण्डक नामक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ भूभागकेँ नीक बुझने छल।
ब्रााह्मण ग्रंथक मुताबिक, राजा बलि अंगक
शासक छल। हुनका कोनो संतान नै छल। हुनकर स्त्री सुदेक्षणा दीर्घतमा नामक ऋषिसँ
पाँचटा पुत्रकेँ जन्म देलक। ई ऋषि आन्हर छल। 10 महाभारतक
मुताबिक, ई ऋषि सभ लोकक सोझाँमे स्त्री संभोग करैत छल। 11
हुनकर पिता छल उत्तथ, जिनकर स्त्रीकेँ
वरुण भगा कऽ लऽ गेल आ हुनका संग संभोग करलक। बादमे वरुणकेँ दंडित कऽ उत्तथ अप्पन
स्त्रीकेँ वापस आनि सुखपूर्वक रहए लागल।12
गर्हित पौराणिक मिथकीय कथा जाल आ ओकर टीकाकार, भाष्यकार, रचनाकारसँ बचैत ई कहएमे कोनो संकोच नै अछि
जे पूरा अंगक वासी आ राजतंत्र आर्य आ अनार्य संस्कृतिक संगमपर फल-फूलि रहल छल।
विभिन्न जाति, विचार आ संस्कृतिसँ समन्वित ई इलाका प्राचीन
षोडश महाजनपदमे प्रमुख छल।13
वैदिक ग्रंथमे जलाशय, जल आ धारक प्रशस्ति अछि।
ऋग्वेदमे तँ कतेको ऋचामे ई अछि। जलक पवित्रता प्राकवैदिक अछि यानी आर्यकेँ आबएसँ
पहिनेसँ अछि। एकर जीवात्मा आ उर्वरतासँ गहींर संबंध अछि। तइसँ महर्षि कश्यपक
तेजस्वी पुत्र विभाण्डक ऋषि अप्पन तपश्चर्याक लेल अइ कोशिकाच्छादित भूभागकेँ सभसँ
उपयुक्त बुझलक।
तीर्थ तपस्याक लेल नै होइत अछि। तीर्थक प्रथा तँ अनार्य
स्रोतसँ ग्रहीत भेल अछि। हिन्दूक सभटा तीर्थ आर्यक मूल स्थानसँ बाहरक अछि। आर्यक
आगमनसँ पहिने एतुक्का धर्ममे तीर्थ छल। आर्यक सम्मिलन स्थल यज्ञ छल आ अनार्यक
तीर्थ। ई तीर्थ शब्द सेहो वेदवाह्य अछि किएकि वेद विरोधी मतकेँ तैर्थिक मत कहल
जाइत अछि। तइसँ तपस्याक लेल तीर्थ नै, अरण्य आ पवित्र धारक कात
सभसँ उपयुक्त अछि। तइसँ व्रात्यक भूमि भेलाक बादो महर्षि विभाण्डक उत्तरबरिया अंगक
सघन अरण्य क्षेत्रमे कौशिकीक धारक कातमे अप्पन आश्रम बनेने छल। कोशी एकटा पौराणिक
धार अछि। एकर कातमे साक्षात भगवान शंकर बसै छै। इंद्र, विष्णु
आ ब्रह्मा केँ भगवान शिवसँ भेंट करहि कऽ पूर्व, निर्दिष्ट आ
निर्धारित ठाम ई कोशीक मनोरम तीर अछि।14 अप्पन बहिन कौशिकीक
संबंधमे स्वयं विश्वामित्र कहैत अछि,
दिव्य पुण्योदकारम्या हिमवन्तमुपाश्रिता।
लोकस्य हित कार्यार्थो प्रवृत्ता भगिनी मम।।15
अप्पन बहिनक प्रति स्नेहक कारण अइ काजमे विश्वामित्र निअमसँ
बड़ सुखसँ निवास करैत छल। ओ यज्ञसँ जुड़ल अप्पन निअमक सिद्धिक लेल अप्पन बहिन
कौशिकीक सानिध्यकेँ छोड़ि सिद्धाश्रम आएल छल। अइ कौशिकीक कात विश्वामित्र सहस्र बरख
धरि घनघोर आ अतिशय कठोर तपस्या केने छल जइसँ सभटा सृष्टि चक्र हिल गेल छल।
कौशिकी तीर मसाध तपस्तेपे सुदारुणम
तस्य वर्ष सहस्त्रणि घोरं तप उपासते।
रामायण 1-34-25
वाल्मीकि रामायणमे कतेको बेर कौशिकी सरितां वरा (सभ
धारमे श्रेष्ठ कौशिकी) बालकाण्ड श्लोक 11, कौशिकी सरितां
श्रेष्ठा कुलो द्योतकारी इव (धारमे श्रेष्ठ कौशिकी सेहो
अप्पन कुलक कीर्ति केँ प्रकाशित करैवाली छथिन। श्लोक 21) जेहन
उक्ति आएल अछि, जइसँ पुण्य सलिला कोशीक महिमा रेखांकित होइत
अछि। तइसँ कश्यप पुत्र महर्षि विभाण्डकक तपस्या लेल कोशीक कात सभसँ उपयुक्त छल,
जतए विश्वामित्र कठोर तपस्या कऽ कतेक रास सिद्धि प्राप्त केने छल।
धारक कात सुदूर धरि फैलल पैघ पाथरक अद्भुत श्रृंखला सेहो
विद्यमान छल, जे कोशीक तीव्र धारकेँ नियंत्रित करैत छल। लगभग साढ़े सात
हजार बरखक भौगोलिक परिवर्तनक परिणामस्वरूप ओ पाथरक (चट्टान) श्रृंखला जमीनक भीतर
गहींरमे चलि गेल आ ओकर ऊपर माटिक मोटका परत जमैत गेल।16
वेगवती नदी, विशाल चट्टान, रमणीय प्रकृति, समिधा बाहुल्य, आैषधियुक्त वनस्पतिसँ आच्छादित अरण्य आ कुलांच भरैत मृगादि वन्य पशु, एहन शांत स्थानमे छल विभाण्डक ऋषिक आश्रम, कोशीक धारक
कज्जल वनमे।
कोशी आ ओकर छाड़न धारक कातपर अप्पन सघनताक लेल प्रसिद्ध
कज्जल वन स्थित पुण्याश्रम पूरे आर्यावर्तमे प्रसिद्ध छल। ई क्षेत्र असुरक
प्रभावसँ सेहो मुक्त छल। तइसँ एतए कऽ ऋषि आश्रम निरापद छल। एतए निर्विध्न वेद पाठ
चलैत छल आ आश्रमवासीक समए समिधा संचय, अग्निहोत्र आ कृषि काजमे
व्यतीत होइत छल। ई आश्रम ऋषि आ कृषि परंपराक अद्भुत संगम स्थल छल। भूमि
बड़ उर्वरा छल। महर्षि विश्वामित्र अप्पन कालक महान कृषि वैज्ञानिक सेहो छल। हुनकर
तपस्या आ प्रयोग स्थल कोशीक मनोहर तट सेहो छल। पूरा इलाका वन्य पशुक अभ्यारण्य छल।
विश्वामित्र केर अप्पन कठोर तपस्यासँ ऊर्जावान बनाएल इलाका मुनि विभाण्डक लेल
सर्वथा उपयुक्त छल। अप्पन वंश परंपराक अनुरूप ओ सेहो विपुल प्रतिभाक पुंज छल।
महर्षि व्यास हुनकर वंश परिचय एना देने अछि:-
मरीचि: मनसस्य जज्ञे तस्यापि कश्यप:।
मश्यपात्कारश्यप: जात: तस्यसुतो विभाण्डक: ऋष्यश्रृङ तस्य
पुत्रोस्ति।।17
ब्रह्माक मानस पुत्र मरीचक पौत्र विभाण्डक छल। उच्च
वंशोद्भव ई ऋषि वेद विहित संस्कारसँ संपन्न छल। कोशीक कातक ई कज्जल वन हुनकर साधना
तपस्याक लेल पूर्ण उपयुक्त आ निरापद छल।
अति प्राचीन कालमे (महाभारत, पुराण, वराहमिहिर आ भास्काराचार्यक मतानुसार) भारत नौ खंडमे विभक्त छल। ई खण्ड छल,
इंद्र, कसेरुमत, ताम्रवर्ण,
गभस्तिमत, कुमारिक, नाग,
सौम्य, वरुण आ गान्धर्व। पौराणित साक्ष्य आ
एकर पहचानक जे संकेत भेटल अछि, ओकर मुताबिक पूर्वी भारतक ई
क्षेत्र इंद्रखण्ड छल। अइ क्षेत्रपर इंद्रक विशेष कृपा छल। तइसँ ई सदिखन हरिअर
फल-फूल आ धान्यसँ संपन्न क्षेत्र छल। धार सदानीरा छल।
ऋग्वेदमे अंगक उल्लेख नै अछि। तइसँ एहन लागैत अछि जे उत्तर
वैदिक कालमे अंग जनपदक उदय भेल अछि। ऋग्वेदमे कीकट शब्दक प्रयोग भेल अछि जेकरा मगध
आ अंग क्षेत्रक लोक लेल प्रयोगमे आनल गेल हएत। मुदा कतेक रास आचार्य एकरा सप्त
सिन्धुक पर्वतीय भाग लेल सेहो प्रयुक्त करैत अछि।18 जे भी भेल हुअए,
रामायण युगक आर्य सभ्यता केर अइ क्षेत्रमे उदय भऽ चुकल छल। मुदा
राक्षसी सभ्यता अओर आर्येतर वानरी सभ्यता एतए अप्पन जमीन नै बना सकल छल। अइ
क्षेत्रमे स्थापित ऋषि आश्रम अध्ययन, अनुसंधान आ यज्ञादि
क्रियाक संपादन लेल उपयुक्त छल।
ऐ
रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com
पर पठाउ।
बालानां
कृते
१.
जगदीश प्रसाद मण्डल- बाल
विहनि कथा- घटक काका २.
शिव कुमार यादव- बाल कविता ३.
जगदानन्द झा मनु- करुण
हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह
शिव कुमार यादव- बाल कविता ३.
जगदानन्द झा मनु- करुण
हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह
१
जगदीश प्रसाद मण्डल
बाल विहनि
कथा-
घटक
काका
एहेन
अगिआएल क्रोध घटक बाबाकेँ जिनगीमे पहिल दिन छलनि,
जेहेन आइ भोरे उठलनि। एक तँ ओहुना देह घटने थोड़-थाड़ क्रोध सदिखन रहबे करै छन्हि
मुदा घटबी जिनगीमे घटती काज भेने जहिना होइ छै तहिना भेलनि। ओना देहक घटबी
अनका जकाँ नै छलनि, किएक तँ सभ दिन रहने केकरो फेहम बनल
रहै छै, सभ किछु दुरुस्त रहै छै, मुदा
तइसँ भिन्न घटक बाबाकेँ भेलनि। जेना केरा गाछक वा अनरनेबा गाछक पानि सुखने
खलपैट जाइए तहिना भेने घरक पहिलुका सभ कपड़ो-लत्ता आ जुतो-चप्पल भऽ गेलनि।
दहेजुआ देल कुरतो-गंजी आ जुत्तो-पप्पल ढील-ढीलाह बनि गेलनि। एकर माने ई नै जे
कुरतो-गंजी आ जुतो-चप्पल बढ़ि कऽ ताड़ भऽ गेलनि तँए ढील-ढीलाह भऽ गेलनि। अपने
सुखि कऽ पलास भऽ गेल छथि। ओना घरमे तते-रास कपड़ो-जुत्तो-चप्पल छन्हि जे अपन
जीता-जिनगीकेँ के कहए जे मुइलोपर दान-पुन करैत उगड़िये जेतनि। मुदा कुछप भेने
ओहो सभ कुछपिये जेतनि जइसँ कोनो सोगात नै लगतनि। जँ अपनो पहीरता तँ लेबरे जकाँ
लगता आ दानो-पुन करता तैयो सएह हेतन। खैर जे होउ, मुदा औझुका
अगिआएल क्रोध बिनु हवोक ने पजरि जाए तेहने लहलही छन्हि।
कनभेंटक
सातम श्रेणीक पोती सरस्वती जिज्ञासु बनि पुछलकनि-
“बाबा,
पढ़ल-लिखल लड़काक संग बिनु पढ़ल-लिखल लड़कीक बिआह कते करौलिऐ आ
बिनु पढ़ल-लिखल लड़काकेँ पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कते करौने हेबइ?”
पोतीक
पुछल प्रश्नक उत्तर बाबा नकारि केना सकै छथि। कविताक तुकवन्दी जकाँ कुछप किअए
ने होउ, मुदा लय तँ भरबे करत। छ-अनियाँ मुस्की दैत घटक बाबा कहलखिन-
“कोनो
की डायरी लिखि कऽ रखने छी, अनगिनती बूझह।”
बाल मन
सरस्वतीक अनगिनतीमे ओझरा गेल। मुदा जहिना भूखक तृष्णाकेँ पानियोसँ किछु समए
विलमाओल जा सकैए, मुदा तृष्णो तँ तृष्णा छिऐ। ठोस जहिना
पानिमे नै भसिआइत, पानि हवामे नै उड़ैत तहिना सरस्वतीक
तृष्णा नै उड़ल। पुन: दोहरा कऽ बाजल-
“बाबा,
बिआह किअए होइ छै?”
पाँच किलो
मोटरीकेँ तँ टारि देलिऐ, मनहीकेँ केना टारबै। जहिना पएर पड़िते
साँप फन-फना उठैए तहिना घटक बाबाकेँ फनफनी उठलनि। एक तँ ओहुना घटबी देह थरथराइते
रहै छन्हि तइपर आरो धऽ लेलकनि। मुदा जहिना गनगुआरि देख नागक फनकी टूटि जाइत
तहिना दस बर्खक पोतीकेँ सोझमे ठाढ़ भेने घटक काकाकेँ भेलनि।
२
शिव कुमार यादव
बाल कविता
बौआ हमरा आब जुनि तंग कर
तोरा सँ आब हम हारि मानै छी
बौआ हमरा आब जुनि तंग कर
तोरा सँ आब हम हारि मानै छी
भोरे सँ
तोँ खूब अपस्याँत कऽ देलैँ
इस्कुल जो आब हम एतबा जानै छी
कानए जुनि देखहीं बौआ बुच्ची इस्कुल छै
भोरे सँ तोरा हम फुसलाबै छी
नीक सँ जो, केकरो सँ नै लड़िहैँ
रुक तोहर अंगा आ पेंट सरिआबै छी
खूब जतन सँ पढ़िहैँ अप्पन दैया संग
तोरे सभसँ हम सपना सजाबै छी
गाम-समाज आ देशक नाम ऊँच करिहैँ
"शिकुया" तोरे सँ हम आस लगाबै छी
इस्कुल जो आब हम एतबा जानै छी
कानए जुनि देखहीं बौआ बुच्ची इस्कुल छै
भोरे सँ तोरा हम फुसलाबै छी
नीक सँ जो, केकरो सँ नै लड़िहैँ
रुक तोहर अंगा आ पेंट सरिआबै छी
खूब जतन सँ पढ़िहैँ अप्पन दैया संग
तोरे सभसँ हम सपना सजाबै छी
गाम-समाज आ देशक नाम ऊँच करिहैँ
"शिकुया" तोरे सँ हम आस लगाबै छी
३
जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम
पोस्ट - हरिपुर डीहटोल, मधुबनी
करुण
हृदयक मालिक महाराज रणजीत सिंह
पंजाब प्रान्तक
राजा महाराजामे सँ महाराज रणजीत सिंहक नाम हुनक न्यायप्रियता एवं सुशासनक लेल
पसिद्ध छनि| एक समयक गप अछि, महाराज रणजीत सिंहजी अपन प्रजाक सुख दुख देखै
लेल घोड़ापर
सबार अपन सिपाही संगे राज भ्रमणपर निकलल रहथि | महाराज सेना सहित
रस्तापर आगू बढ़ैत रहथि की कतौसँ एकटा पाथर उड़ि कs आबि महाराजकेँ बिच्चे माथपर लगलनि| पाथर लगिते हुनकर
माथसँ सोनितक टघार बहए लगलनि| महाराज अपन एक हाथसँ घोड़ाक लगाम
पकड़ने, दोसर हाथे चट कपारकेँ दाबि लेलनि | सिपाही सभ पाथरक दिसामे दौड़ल| किछु घड़ी बाद ओ सभ एकटा
नअ-दस बरखक फाटल चेथड़ी पहिरने, गरीब नेनाकेँ लेने आएल|
महाराजकेँ पुछला उत्तर एकटा सिपाही बाजल जे ई नेना पाथर मारि-मारि
कए आम तोड़ै छल, ओहे पाथर आबि कs महाराजक
माथपर लागल | महाराज रणजीत सिंह ओइ डरैत नेनाकेँ अपना लग बजा,
स्नेहसँ ओकर माथपर हाथ फेरैत एगो सिपाहीकेँ आज्ञा देलनि -
"पाँच पथिया आम, दू जोड़ी नव कपड़ा आ सएटा असरफी लए कs
ऐ नेनाकेँ आदर सहित एकर घर छोड़ि आएल जाए|
महाराजक
आज्ञाक तुरंत पालन भेल | मुदा महाराजक निर्णयकेँ नै बुझि सेनापति,
सहास कए कs ऐ तरहक फैसलाक कारण पुछिए लेलक|
सेनापतिक प्रश्नक उत्तर दैत महाराज बजलाह -"जखन एक गोट निरीह गाछ
पाथर मारला उत्तर फल दs रहल छै तखन हम तँ ऐ प्रान्तक राजा
छी| हमर प्रजा हमर पुत्र तुल्य अछि, एहन ठाम
हम कोना फल देबऽसँ वंचित रहि जाइ | गाछ अपन सामर्थे फल दै छै, हम अपन सामर्थे, ऐमे अजगुतक कोन गप|
एहन
उदार, न्यायप्रिय, वात्सल्य आ करुण ह्रदयक
मालिक छलाह महाराज रणजीत सिंह |
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः
काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक
चाही, आ’
ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे
संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य
प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो
ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो
जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू
र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों
वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु
पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली,
बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित
रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे
सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी
सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक
नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक
चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ
परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक
तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना
डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए
बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः
धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒-
व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त
कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक
हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय
बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर
वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम
सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1
to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH
8.1.4.NAAGPHANS
(IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya
Verma
विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
Input:
(कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in
Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.) Output:
(परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari,
Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
English
to Maithili
Maithili to English
Maithili to English
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष
प्रोजेक्टकेँ आगू
बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com
पर पठाऊ।
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