बालानां
कृते
बाल मुकुन्द पाठक
बाल गजल
मेला चलब हमहुँ कक्का यौ
पहिरब आइ सूट पक्का यौ
खेबै जिलेबी आ झूलब
झूलामेला चलब हमहुँ कक्का यौ
पहिरब आइ सूट पक्का यौ
संगे संग किनब फटक्का यौ
बैट किनब क्रिकेट खेलै ले
आबि कऽ खूब मारब छक्का यौ
साझेसँ अखारामे कुश्ती हेतै
पहलवानोँ तँ छै लडक्का यौ
अन्तिम बेर छी एतौ हम तँ
जाएब बाबू लऽग फरक्का यौ
कोरा मे कने लिअ ने हमरा
ई भीड़ मेँ मारि देत धक्का यौ
चलू ने जल्दी किनै ले जिलेबी
नै तँ उड़ि जाएत छोहक्का यौ
बाबूओसँ बेसी अहीँ मानै छी
छी बड्ड नीक हमर कक्का यौ
सरल वर्णिक बहर ,वर्ण 11
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय
श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू
हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक
चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये
सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते
करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि,
करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित
छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये
जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः
सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा,
दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित
छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं
वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं
दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम,
कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़
आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत
छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन्
सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती,
नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे
अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव
दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र
सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे
भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी
तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं
महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या,
द्रौपदी, सीता, तारा आऽ
मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च
विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते
चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा,
बलि, व्यास, हनूमान्,
विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा
चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर
वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य
धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला
सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि
जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत
मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद
अध्याय २२, मंत्र २२)
आ
ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः।
षड्जः स्वरः॥
आ
ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः
शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः
सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो
जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां
योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः
सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ
दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे
भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ
दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक
सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि।
अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश
होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें
कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे
वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न्
- विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे
- देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म
विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ
जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒-
बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ
तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ
रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध
पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः
धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑-
पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ
जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ
पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम
सभामे
युवास्य-युवा
जेहन
यज॑मानस्य-राजाक
राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ
पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त
कार्यमे
नः-हमर
सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा
होए
फल॑वत्यो-उत्तम
फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां-
पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य
लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा
सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ
होए
ग्रिफिथक
अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला,
राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय,
दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य
आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1 to 8.3 MAITHILI
LITERATURE IN ENGLISH
8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA VERMA translated by Dr.
Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma
विदेह
नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
No comments:
Post a Comment