विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
१. मोहनदास (दीर्घकथा):लेखक: उदय प्रकाश (मूल हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद विनीत उत्पल)
२.छिन्नमस्ता- प्रभा
खेतानक हिन्दी उपन्यासक सुशीला झा
द्वारा मैथिली अनुवाद
३.कनकमणि दीक्षित (मूल नेपालीसँ
मैथिली अनुवाद श्रीमती रूपा धीरू आ श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि)
मन्त्रद्रष्टा ऋष्यश्रृङ्ग-
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
विनीत
उत्पल)
हरिशंकर श्रीवास्तव “शलभ"- (हिन्दीसँ
मैथिली अनुवाद
विनीत
उत्पल)
ऋषि कुमारक पूजा आ फलक उपहार स्वीकार कऽ वनिता हुनका
पर्याप्त आत्मसंतुष्ट केलक। संगे-संग अप्पन संग आनल मिष्ठान आ फल सेहो ऋषिकुमारकेँ भेंट
केलक। ओ जल्दीसँ ओकरा खाइ लेल अनुरोध केलक। ऋषि ऐ पदार्थ आ फलकेँ खा कऽ अपूर्व
सुखक अनुभव केलक। किछु कालक लेल ओ स्वर्गिक आनंदमे डूमि गेल। वनिता सभ हर्षसँ भरि
हुनकर आलिंगन केलक आ कतेक रास फल आ भांति-भांतिक मधुर देलक। ऋषि कुमार मधुरकेँ फल बुझि कऽ खा
लेलक। किएकि ओ वनमे रहैत कहियो मधुर नै खेने छल, तइसँ ओ ओकर रसास्वादनसँ अनजान छल। भला
सदिखन वनमे रहएबला लोककेँ एहन पदार्थक स्वाद लेबाक अवसर कतए अछि। एकर बाद महर्षि
विभाण्डकेँ एबाक आशंकासँ डरल वनिता व्रत आ अनुष्ठानक बहाना बना कऽ अप्पन वेड्रापर
घुरि गेल। मुदा ऋषि कुमारकेँ गाढ़ालिंगनमे भरि चतुर वनिता हुनका मनमे कामदेवक
विजयी दुन्दुभिकेँ बजा देलक। चिरकालसँ सुप्त भावना एक-एक कऽ जागए
लागल। ऋषि ओइ वनिता सभक जाइक पश्चात दुखमे डूमि गेल आ इम्हर-उम्हर टहलय
लागल। नै नीन, नै चैन, ऋषि कुमार ओइ
कमलमुखी वनिताक चिंतनमे डूमल रहल।
दोसर दिन शक्तिसंपन्न ऋष्यश्रृंग बेर-बेर ओइ वनिताक
संबंधमे सोचैत-विचारैत
अपनेसँ ओइ बेड़ा लग पहुँचल जतए वेश्या हुनकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल। ऋषि कुमार
आकर्षक डोरमे बन्हि अपनेसँ उपस्थित भऽ गेल। वेश्या पहिनेसँ तैयार छल। ऋषिकुमार
हुनकर रूपाकर्षणक जालमे फँसि चुकल छल। वनिता सभ अप्पन स्वरमे रस घोरैत बाजल- सौम्य! हमर आश्रमपर
चलू। एतए कतेक रास फल-फूल अछि, मुदा ओतए सेहो ऐ पदार्थक कोनो अभाव नै अछि। ई कहि वनिता
हुनका अप्पन बेड़ामे बैसा लेलक आ भरि बाट ऋषिकुमारक मनोविनोद करैत अंगक राजधानी
मालिनी लऽ आनलक। जीवनमे पहिल बेर ऋष्यश्रृंग कोनो नगरकेँ देखलक। हुनक नगरमे प्रवेश
करते इंद्र पूरा जगतकेँ प्रसन्न करैत पानि बरसाएब शुरू कऽ देलक।
ऋष्यश्रृंग जेहन विद्वान ऋषि कुमारकेँ वेश्या मालिनी लऽ
आनएमे सफल भऽ गेल। हुनका ई सफलता एक-दू दिनमे नै भेटल हएत। एकर एकटा दोसर वृत्तान्त स्वामी
अद्वैतानन्दपुरी प्रवचन संग्रह सच्चिदानन्द प्रकाश (पृष्ठ सं. ३१८) मे भेटैत अछि।
रोमपादक माँजल चतुर वनिता कोशीक धारक कात अप्पन शिविर लगा आ
पुण्याश्रमसँ किछु दूर रहि ऋषिकुमारक दिनचर्याक सूक्ष्म निरीक्षण करए लागल। ऐ
काजमे महीनो लागि गेल। वनिता सभ अप्पन गहन अध्ययनमे देखलक जे तपस्तयारत
ऋषिकुमारकेँ जखन भूख लागैत अछि तँ ओ विशेष जातिक गाछक तनामे अप्पन मुँह सटाबैत अछि आ भरपेट ओकर रस चुसि
कऽ वापस तपस्यामे बैसि जाइत अछि। वेश्या सभ एकांत पाबि ओइ विशेष गाछ आ रस चूसए कऽ
ठाम पर चिन्ह लगा देलक। संगे-संग ओइपर मीठ तरल पदार्थ (संभवत: गुड़) लेप देलक। फेर
दूर ठाम ठाढ़ भऽ कऽ ऋषिकुमारक गतिविधिकेँ देखैत रहल। ऋष्यश्रृंग गाछक रसमे किछु
दोसरे स्वाद पेलक। ओ अतृप्त भावसँ ऐ तरल पदार्थकेँ चाटए लागल। ई क्रम चलैत रहल।
वेश्या आब ऐ तरहक स्वादिष्ट मधुर ऋष्यश्रृंगकेँ खुआबए लागल। आब हुनका पूर्ण
विश्वास भऽ गेल जे ऋषिकुमारकेँ स्वादिष्ट मधुरमे आनंद आबए लागल अछि, तखन ओ ऐ क्रमकेँ
एकाएक रोकि देलक।
ऋष्यश्रृंगकेँ पुछलापर वेश्या बाजल जे ऐ तरहक स्वादिष्ट
भोजन बनाबैमे धन लागैत अछि आ ओ धन राजाकेँ एतएसँ आबैत अछि। राजा आब धन नै दऽ रहल
अछि। जौं अहाँ राजा लग जाइ तँ धन भेटि सकैत अछि।
अप्पन इच्छा पूर्तिक लेल ऋष्यश्रृंग वनिता सभक संग राजा एतए
जाइ लेल तैयार भऽ गेल।
राजा रोमपाद राजप्रसादसँ बाहर आबि कऽ ऐ
महान तपस्वीक अगवान केलक आ पृथ्वीपर माथ टेक कऽ हुनका साष्टांग प्रणाम केलक। फेर
एकाग्रचित भऽ ऋषिसँ वरदान मांगलक जे हुनका ऋष्यश्रृंग आ हुनकर पिताश्री महर्षि
विभाण्डक असीम कृपाक प्रसाद भेटए। राजाकेँ शंका सताबए लागल जे कपटसँ ऋषिश्रृंगकेँ मालिनी
आनए लेल जौं महर्षि विभाण्डक हुनकापर रूष्ट भऽ जाएत तँ राजाक कल्याण नै अछि।
फेर ऋषिकुमारकेँ अप्पन अंत:पुरमे आनि कऽ
अप्पन पालिता कन्या शान्तासँ हुनकर बियाह कऽ देलक। ऐ शुभ काजसँ राजपरिवार आ
प्रजामे प्रसन्नता पसरि गेल।
इम्हर जखन महर्षि विभाण्डक अप्पन आश्रम घुरल तँ अप्पन
पुत्रकेँ ओतए नै देखि बेचैन भऽ गेल। हवन सामग्री इम्हर-उम्हर पसरल छल।
आश्रममे बाढ़नि धरि नै लागल छल। लता आ गाछ टूटल छल आ पात सभ इम्हर-उम्हर बिखरल छल।
आश्रमक मृग शावक आब उछलि नै रहल छल। ओ पूरा जंगल ताकि लेलक मुदा ऋषिकुमारक कोनो
पता नै चलल। की कोनो राक्षसक माया छी। ओ तपस्यामे विघ्न-बाधा दैक ताकमे
रहैत अछि। महर्षि दुख आ क्रोधसँ भरि उठल। ओ ध्यानस्थ भऽ बैसि गेल आ ध्यानमे सभटा
चित्र आबैत गेल। अंग नरेशकेँ दंडित करै लेल ओ मालिनी दिस प्रस्थान केलक। ओ नदी आ
गाम-घर पार
करैत आगू बढ़ल जा रहल छल। उम्हर राजा रोमपाद सेहो शंकित छल जे पुत्रकेँ नै देखि
महर्षि विभाण्डक क्रोधक अग्नि जौं धधकि उठल तँ अनर्थ भऽ जाएत। मंत्रीसँ सलाह कऽ
राजा ई प्रबंध केलक जइसँ महर्षिक क्रोध शांत भऽ जाए। एकरा लेल राजा जंगलसँ लऽ कऽ
राजधानी धरि सभटा बाटपर एक सएसँ बेसी दुधारू गायक संग ओकर ग्वालकेँ सेहो ठहरा
देलक। ग्वालसँ कहल गेल जे महर्षि विभाण्डक ऐ बाट देने आबैबला अछि। हुनकर भरपूर
स्वागत-सत्कार
करब आ कहब जे ई खेत, ई गाय-बड़द सभटा अहाँक
पुत्रक संपत्ति अछि। हम सभ अहाँक अनुचर छी, हमरा आदेश दियौ जे हम सभ अहाँक लेल की करी। एहन कहि-सुनि सभ तरहसँ
मुनि विभाण्डक क्रोधकेँ शांत करबाक प्रयास कएल गेल। रोमपाद अप्पन योजनामे सफल रहल।
क्रोधसँ मुनिक आँखि लाल भऽ रहल छल, एना लागैल छल जे ओ रोमपादकेँ जरा कऽ भस्म कऽ देथिन।
मुदा बाट भरि ग्वाल सभ हुनका दूध आ दोसर दुग्ध पदार्थ (दही, घी, पायस, तक्र आदि) सँ खूब स्वागत केलक आ
सभटा गोधन आ खेतकेँ हुनकर पुत्रक संपदा बता कऽ हुनकर क्रोधकेँ
शांत कऽ देलक।
रोमपादकेँ राजभवन पहुँचैत विभाण्डक ऋषिक क्रोधाग्नि ममता आ
प्रेममे बढ़ि गेल छल।
राजाक अपूर्व सत्कारसँ ओ धन्य भऽ चुकल छल। ओ देखलक जे हुनकर पुत्र ऋष्यश्रृंग
राजभवनमे ओना विद्यमान अछि,
जेना अमरावतीमे इंद्र। हुनका बगलमे राजा रोमपादक राजकुमारी शान्ता ऋष्यश्रृंगक
स्त्री विराजल छल, जेना
इंद्रक संग शची। ऐ शोभाकेँ देखि विभाण्डक रोम-रोम पुलकित भऽ
उठल। ओ राजा रोमपादकेँ आशीर्वाद देलक आ राजाक इच्छाकेँ पूर्ण करबाक आदेश अप्पन
पुत्रकेँ देलक। संग-संग इहो कहलक जे एकटा पुत्रक प्राप्तिक बाद वन घुरि आएब।
ऋषिश्रृंगक ई कथा महाभारत वनपर्वमे लोमश ऋषि सुनौने छल। 5
अप्पन पुत्र ऋष्यश्रृंग लग पहुँचि विभाण्डक बड़ प्रसन्न छल
आ हुनकर उत्कर्ष देखि कऽ
हर्षोत्फुल छल। राजा सेहो हुनकर सत्कारमे कमी नै केलक। मुदा महर्षि राजमहल परिसरमे
रहबाकेँ उचित नै
बुझलक। हुनका सघन वन आ गुफा चाही जतए ओ निर्विघ्न ध्यान, तप, व्रत, अनुष्ठान आदि कऽ
सकए। राजा रोमपाद हुनकर इच्छाक सम्मान करैत मालिनसँ पश्चिम मेरूक पर्वतपर हुनकर
आश्रम बना कऽ हुनकर रहैक व्यवस्था कऽ देलक। ई महर्षि विभाण्डक अस्थायी आश्रम छल। ई
स्थल वर्तमान भागलपुरसँ ४२ किलोमीटर पश्चिम आ वरियारपुरसँ छह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम कोनपर
छल। ई ऋषिकुंड वा ऋष्यश्रृंग आश्रमक नामसँ प्रसिद्ध मरूक पर्वत या भैरा पहाड़ीसँ
बनल गोलकार घाटीमे स्थित छल। ऐ आश्रमक लग एकटा पोखरि छल जे ठार आ धीपल रुाोतक एकटा
समवाचित जलराशि छल। ओइ पोखरिक उत्तर दिस ध्यान स्थली अछि जतए ऋषि ध्यान लगाबैत छल।
कजरा रेलवे स्टेशनसँ बारह कि.मी. दक्षिण स्थित ई पहाड़ ऋष्यश्रृंग पर्वतक नामसँ
प्रसिद्ध अछि। एखन ई ठाम पर्यटकक लेल आकर्षणक केंद्र अछि।
मालिनीमे वृष्टि यज्ञ आ पुत्रेष्ठि यज्ञ
मालिनीमे रहि कऽ ऋष्यश्रृंग राजा रोमपाद आ हुनक विद्वान
मंत्रीसँ अंग देशमे अनावृष्टि आ सूखासँ प्रजाकेँ बचाबैक लेल उपायपर विचार-विमर्श केलक।
एकर संगे ऐ देशमे उपलब्ध जल-संसाधनक समुचित उपयोगक संबंधमे सेहो मंत्रणा केलक। ओ
मालिनीमे वृष्टि यज्ञ केलक जइसँ राज्यमे दीर्घकाल धरि अकाल नै पड़ए।
आजुक चम्पानाला ओइ ऋषिश्रृंगक गहन पर्यवेक्षणमे तैयार कएल
गेल हएत जकर उपयोगिता साढ़े सात हजार बरख बादो सिद्ध अछि।
काल बितैत गेल। राज्यमे वर्षा हुअए लागल। प्रजा धन-धान्यसँ संपन्न
हुअए लागल। आब शान्ता एकटा सुनर आ स्वस्थ पुत्रक जन्म देलक, जकर नाम सारंग
राखल गेल। संपूर्ण राज्यमे आनंदक लहरि छा गेल।
एक दिन शान्ता अप्पन पतिदेव ऋष्यश्रृंगसँ सविनय अप्पन मनोरथ
कहलक। ओ बाजल जे हुनका कोनो भाय नै अछि, तइसँ हुनकर माता-पिता बड़ दुखी
रहैत छन्हि। हुनकर दुखसँ हम बेचैन रहैत छी। शान्ता साग्रह केलक जे अहाँ एहन कोनो
उपाय करू जे हमरा एकटा भाय भऽ जाए।
विद्वान ऋष्यश्रृंग चिंतन कऽ कहलक जे ओ विधिपूर्वक
ब्रह्मचर्य व्रतक पालन कऽ वेदक अध्ययन केने अछि। ओ पुत्रक निमित्त
अप्पन ससुर महाराज रोमापादक पुत्रेष्ठि यज्ञ कराएत। ऐ यज्ञक प्रधान देवता इंद्र
रहत। ओ महाराजकेँ यशस्वी पुत्र प्रदान करत।
शान्ता हर्षोत्फुल भऽ उठल। ओ यज्ञ संपादनक सूचना अप्पन माता-पिताकेँ देलक।
राजा रोमपाद कतेक रास वेदज्ञ पंडितकेँ बजा यज्ञक संपूर्ण तैयारी केलक। कतेक रास
राजा-महाराजा
आमंत्रित कएल गेल। ऐ मे राजा रोमपादक परम मित्र अयोध्या नरेश दशरथ सेहो हएत। बड़
धूमधामसँ यज्ञ संपन्न भेल। एकर तत्काल फल सेहो भेट गेल, इंद्र प्रसन्न
भऽ राजाकेँ पुत्रवान हेबाक वरदान देलक। रानी गर्भवती भेल आ समय एलापर एकटा
पुत्रकेँ जन्म देलक। माता-पिता ओइ शिशुक नाम चतुरंग राखलक। अंग देशक राजाक
वंशावली, जे
चतुरंगसँ शुरू भऽ महाभारत कालक कर्ण धरि जाइत अछि, ओ निम्नलिखित अछि-
रोमपादक पुत्र चतुरंग, चतुरंगक पुत्र पृथुलाक्ष आ पृथुलाक्षक चम्पा नामक
पुत्र भेल, जे
चम्पानगरी बसौने छल। चम्पाकेँ हर्यंग नामक पुत्र आ हुनकर पुत्र भेल भद्ररथ, भद्ररथकेँ
वृहद्रथ आ वृहद्रथकेँ वृहत्कर्मा नामक पुत्र भेल। वृहत्कर्माकेँ वृहदभानु, वृहदभानुकेँ
वृहन्मना आ वृहन्मना संजयद्रथक जन्म भेल। जयद्रथकेँ ब्राह्मण आ त्रिय संयोगसँ
उत्पन्न भेल स्त्रीक गर्भसँ विजय नामक पुत्रक जन्म भेल। विजयकेँ धृति, धृतिकेँ धृतव्रत, धृतव्रतकेँ सत्कर्मा आ
सत्कर्माकेँ अधीरथ नामक पुत्र भेल। यएह अधीरथ नहाइ लेल गंगा तटपर गेल रहथि जिनका
पिटारमे सुरक्षित राखल एकटा बालक भेटल छल। ऐ
बालककेँ पृथा (कुंती) जन्म देलाक बाद
गंगामे बहा देने छल, जेकरा
अधीरथ पुत्रक रूपमे ग्रहण केने छल। ई बालक कर्ण भेल जे महाभारतक सुप्रसिद्ध महारथी
छल। कर्णक पुत्र वृषसेन। १७ अंग नरेशक एतबेटा वंशावली पुराणमे उपलब्ध अछि।
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तृतीय परिच्छेद
अयोध्यामे अश्वमेध आ पुत्रेष्ठि यज्ञ
अवध नरेश राजा दशरथक राजधानी अयोध्या छल। ई नगरी सरयू धारक
कातमे बसल अछि। ई प्रचुर धन-धान्यसँ संपन्न, सुखी आ बड़ समृद्धशाली छल। अयोध्या सभ लोकमे विख्यात
छल। एकरा महाराज वैवश्वत मनु बसौने छल। हुनके पुत्र छल इक्ष्वाकु, जिनकर तीन
शक्तिशाली पुत्र (विकुक्षि, निमि आ दण्डक) मे विकुक्षिक
वंशमे दशरथ एकटा चक्रवर्ती सम्राट छल।1
वाल्मीकीय रामायणक अनुसार, ई महापुरी बारह योजन नम्हर आ तीन योजन
चौड़ा छल। अयोध्यासँ दोसर जनपदमे जाइ लेल जे बड़ प्रशस्त आ चौड़ा राजमार्ग छल, ओकर दूनू कात
कतेक रास सघन गाछसँ आच्छादित हेबाक कारण ओइ कालक दोसर मार्गसँ अप्पन फराक पहचान
बना रहल छल। अयोध्यामे कतेक रास बाजार छल। ई सभ तरहक यंत्र आ अस्त्र-शस्त्रसँ संचित
छल। अप्पन नामक अनुसार ई युद्धमे पराजित होइबला नगरी नै छल। एतए ऊँच-नीच अट्टालिका
छल, जकर ऊपर
ध्वज लहरा रहल छल आ गुंबदपर शतध्नि (तोप) लागल छल। सुरक्षाक दृष्टिसँ अयोध्या अजेय छल। ओकर
चारू कात गहींर खधाइ छल,
जेकरा लांघब बा पार करब कठिन छल। नगरमे कतेक रास सांस्कृतिक कार्यक्रम लेल
नाटक मंडल छल। ओकरामे स्त्रिये टा नृत्य आ अभिनय करैत छल। चारू कात आमक गाछ छल।
नगरमे कतेक रास कूटागार (नुकायल घर आ स्त्री क्रीड़ा घर) छल। राजा दशरथ ऐ
संपन्न नगरमे रहि कऽ अप्पन प्रजाक पालन करैत छल। रामायणमे अयोध्यापुरीक वर्णन आ
राजा दशरथक शासनकालमे अयोध्या लोकक उत्तम स्थिति अवलोकन करैमे आदि कवि वाल्मीकि
कोनो तरहे कृपणता नै कएने अछि।2
रामायणक अनुसार अयोध्यामे कत्तौ कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख आ नास्तिक
मनुख देखबामे नै भेटैत अछि। सभ लोक धर्मशील, संयमी, प्रसन्न, शीलवान आ सदाचारी छल। सभ लोक कुंडल, मुकुट आ
पुष्पहार धारण करैत छल आ हुनकर अंग चंदनक लेप आ सुगंधी संयुक्त छल। एतुक्का सभ लोक श्री
संपन्न, रूपवान
आ राजभक्त छल। इंद्रक अश्व उच्चैश्रवाक तरहे काम्वोज आ वाह्लीलक देशमे उत्पन्न भेल
शक्तिशाली अश्व आ सिंधुनदमे पालल दरियाइ घोड़ा अयोध्यामे भरल छल। विन्ध आ हिमालय
पर्वतमे जन्मल मत्त गजराज सेहो बड़ संख्यामे अयोध्याक शौर्यक अनवरत वृद्धि करैत
छल। अयोध्या सभ तरहेँ सुरक्षित छल। एतए आबि कऽ केकरो लेल युद्ध
करब असंभव छल, तइसँ ई
पुरी अयोध्या सत्य आ सार्थक नामसँ प्रकाशित होइत छल।
ऐ यशस्वी राजा दशरथक राजकीय काजक संपादन लेल मंत्री-परिषदमे आठ मंत्री
छल, धृष्टि, जयंत, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल आ
सुमन्त। सुमन्त अर्थशास्त्र उद्भट विद्वान छल। एकरा संगे महर्षि वशिष्ठ आ वामदेव, महाराज दशरथक
दूटा विद्वान ऋत्विज (पुरोहित) छल। एकर अलावा, सुयश, जावलि, काश्यप, गौतम, दीघार्य, मार्कण्डेय आ कात्यायन जेहन तपायल ऋषिक दरबारमे
मंत्रीपद प्राप्त छल।3 ऐ
महर्षिक संग कौशल नरेशक पहिलुका परंपरागत ऋत्विज सेहो मंत्रीक कार्य करैत छल।
सभ तरहेँ ताकत भेलाक बादो राजा पुत्र विहीन छल। हुनकर तीनटा
रानी छल। मुदा, सूर्यवंशकेँ
चलाबै बला कोनो
पुत्र नै छल। राजा मंत्रसँ मंत्रणा कऽ पुत्र प्राप्तिक लेल अश्वमेघ यज्ञक अनुष्ठान
करबाक विचार केलक। वेद विद्याक पारंगत विद्वान ऋषिमे श्रेष्ठ सुयश, वामदेव, जावलि, काश्यप, वशिष्ठ सभकेँ
ससम्मान बजा कऽ नरेश
अप्पन मंतव्य देलक। दशरथ अप्पन इच्छा व्यक्त केलक जे शास्त्रोक्त विधिसँ पुत्र प्राप्तिक
लेल अश्वमेघ यज्ञसँ भगवानक भजन करब हुनका लेल एकमात्र उपाय अछि। वेदज्ञ पंडित एकर
अनुमोदन केलक।
राजा दशरथ व्याकुल भऽ कऽ महर्षि वशिष्ठसँ ऐ फलदायक
पुत्रेष्ठि यज्ञ अपनेसँ कराबैक अनुरोध केलक। ओ कनमुँह भऽ अप्पन कुल पुरोहित
वशिष्ठसँ बाजल जे हुनकामे
तपस्याक एतेक विपुल शक्ति अछि जे हुनके लऽ कऽ ब्रह्मा युगमे परिवर्तन कऽ देने अछि।
फेर एकटा साधारण पुत्रेष्ठि यज्ञ ओ किअए नै कऽ सकैत अछि?
(क्रमश:)
बालानां कृते
किशन कारीगर, आकाशवाणी दिल्ली
होरी मे मचाउ हुरदंग
(हास्य कविता)
होरी
मे मचाउ कनी हुरदंग
खुशी
सँ जिनगी हुए रंग-बिरंग
“कारीगर” दैत अछि शुभकामना
खूम
होरी खेलाउ दोस महीमक संग।
उज्जर
मुहँ लाल-पीअर करू
खुशी
मनाउ कनियो ने डरू
बुढ़बा
बाबा मना करैथ त’
हुनका
माथ पर रंग-बिरंग बैलून फोरू।
रस्ता
पेरा रंगीन भ’ गेल
डंफा
बजाउ फगुआ गाउ
अहाँ
अपने मने झुमू
आई
सभ मिली रंग घोरू।
मलपुआ
खाउ अबीर उड़ाउ
आई
केकरो नहि अहाँ छोड़ू
पिचकारी
मे रंग भरि
ओकरा
रंग-बिरंग क’ छोड़ू।
कि
बुढ़-पुरान कि छौंड़ा मारेर
धियो
पूताक मोन भेल रंगीन
अबीर
उड़ाउ खुशी मनाउ
अंगने-अंगने
होरी खूलाउ।
आई
कियो नहि मना करत
सभ
नाचै अपना ताले
डंफा
डूगडूगाउ ढ़ोलक बजाउ
नाचू
अहाँ अपना ताले।
होरी
आबि गेल औ भाई
रंग
घोरै मे जुनि पछुआउ
हरमोनियावला
हे यौ पिपहीवला
आउ-आउ
सभ मिली जोगीरा गाउ।
कक्का
औ बेसी नहि छिड़िआउ
आई
नहि मानब एक्को टा बात
बाल्टी
मे अछि रंग घोरल
उज्जर
मुह करब कारी सियाह।
हँसी
खुशी सँ होरी खेलाउ
आ
खा लियअ देसी भंग
जिनगी
होएत रंग-बिरंग
होरी
मे मचाउ कनी हुरदंग
बच्चा
लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने)
सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही,
आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते
लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो
ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ
लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन
करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो
ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे
शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे
ब्रह्मा, दीपक
मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति!
अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं
हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः
स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन
सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४.
नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने
चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु
कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी
धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत्
भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक
उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना
स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन
अहल्या, द्रौपदी,
सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः
परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा,
बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम-
ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा
लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये
सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव
यन्यूधि शशिनः कला॥
९.
बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे
वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद
अध्याय २२, मंत्र
२२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः।
स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे
रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒
युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो
न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।
शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ
विद्यार्थी उत्पन्न होथि,
आ’
शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन
करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा
त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे
ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’
नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा
परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश
होए आ’ मित्रक
उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि
मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी
र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद
ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण
करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे
ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा
देथि, फल देय
बला गाछ पाकए, हम सभ
संपत्ति अर्जित/संरक्षित
करी।
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1
to 8.3 MAITHILI LITERATURE IN ENGLISH
8.1.4.NAAGPHANS (IN ENGLISH)- SHEFALIKA
VERMA translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma
विदेह
नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
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