पाखलो (कोंकणी उपन्यास)- तुकाराम रामा शेट- मैथिली अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह
PART II
सुलूक कहब सुनि हमरा कनी अजगुत-सन
लागल। राति भऽ गेल रहै। पड़ोसक दू-तीन गोटे हमरा लग एला। पहिने तँ ओ लोकनि
हमरासँ पुछताछ केलनि आ फेर रजनीक खबरि देलनि।
“जइ
दिनसँ रजनीक घरबला ओकरा बापक ओइठामसँ आनने छल, ओइ
दिनसँ शराब पीबि-पीबि कऽ ओकरा मारए-पीटए
लागल छल। तेकरा बाद तँ नित राति ओकर घरबला रजनीसँ झगड़ा करै आ मारै। दू दिन पहिने
ओ ओकरा घरसँ निकालि देने रहै आ तइ दिनसँ ओ घरक बाहरे देहरीपर रहि रहल छेली।”
सुलू हमरा कोरेमे सूति गेल छेली। बहुत राति भऽ गेल
रहै आ रजनी अखनि धरि आपस नै आएल छेली।
·
रजनी पोखरिमे कूदि अपन जान दऽ देने छथि, ई गप जँ हमरा रस्तासँ अबैत काल पता लागि जएतै तँ हम निश्चये हुनका बचा लैतिऐ। कियो
पोखरिमे पाथर फेकने हेतै ऐ लेल पानिमे बुलबुला आबि रहल छेलै, हम यएह
बुझने छेलौं। ओइ समए ओइ पोखरिमे एहेन हृदैविदारक मृत्यु
नुकाएल रहै, ई हमरा पता नै छल।
रजनीक घरबला ओकरा कांदोळे गामसँ आपस अनने रहै, मुदा किछुए दिन पछाति ओ फेर ओकरापर वएह आरोप लगौने रहै। रजनीकेँ मारए-पीटए लागल छेलै आ एकदिन ओकरा दागि देने रहै। ओ ओकरा जीबैतै मारि देबए चाहैत
रहै। ओइदिन,
“पाखलो
युवती सबहक पाछू लागल छै।” हमरा संबन्धमे ओकरा ई खबरि भेटल रहै। ओइ
दिनसँ ओ रजनीकेँ देहरीक बाहरे राखए लागल रहै।
रजनी तंग आबि गेल छेली आ ओइ समए ओ सोहावतीक श्रृंगार
केलक आ आत्महत्या करए चलि गेली।
ओइ पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छेलौं से
वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नै अपितु रजनीक खोपामे लगौल गेल घरक बगैचा में फूलल
मोगराक कली रहै! यादिक लेल सफेद, सुगन्धित!
दस
रजनीक यादिमे हमरा आँखिमे नोर आबि गेल छल आ हम ओइ समए वएह पोछि रहल छेलौं, ऐ सभ यादिसँ हमरा मोनमे ओ सभ चित्र उभरि कऽ
आबि रहल छल। हम पाखलो, ऐ माटिक संस्कारमे पलल-बढ़ल विठू छेलौं। ऐ माटिक सबूत छेलौं।
बहुत कालसँ अकासमे कारी-कारी मेघ घुमड़ि रहल रहै। बिजलौकाक संग
गरज भऽ रहल छेलै आ बरखा सेहो भेल रहै, जेकरा कारणेँ लाल माटिक सुगंध
चारू दिस पसरि रहल रहै।
मिरगिसरा शुरू होइमे अखनि पन्द्रह
दिन बाँकी रहै। मिरगिसराक बरखा शुरू भेला पछाति गाममे खेती-बारीक
काज आरंभ भऽ जाइत रहै। ऐ साल सोनू मामाक खेत परती रहि जेतै, हमरा ऐ
बातक डर रहए। दू मास पहिने सोनू मामाकेँ लकबा मारि देने रहै। ओकर दहिना हाथ बेकाम
भऽ गेल रहै, जइसँ हाथ नै हिला सकै छला। अपन नातिनसँ मिलैले आ ओकरा
देखैले ओ ओहू स्थितिमे गोविन्दक घर आएल छला। हुनक माथक केश उज्जर भऽ गेल रहनि आ
देह बहुत कमजोर। एतए आबि ओ सुलूसँ भेँट केलनि। सुलूसँ
गप केलनि,
मुदा हमरासँ बिना गप केने ओ आपस चलि गेला। जँ ओ बरखामे भीजि
के काज करता तँ निश्चिते हुनक रोग आर बढि जेतनि आ ओहुना आब हुनकासँ कोनो काज कहाँ
होइत छेलनि। ओकरा एहेन बुझेलै। आ तखन ओ खेतमे हाथ बँटबैले रुक्मिणी मौंसीक माध्यमे
खबरि भेजौलक। हमरा बुझाएल जे सोनू मामाक खेत परती रहि जेतै, मुदा
जाधरि हमरा देहमे जान अछि ताधरि कोनो डर नै।
भोरसँ दुपहर भऽ गेल रहै। हम घरमे जेतए बैसल रही ओतै एकक पछाति एक यादि दोहरा रहल छेलौं। आब सभटा यादि खतम भऽ गेल, हमरा एहेन लागल आ ओइ सून देबाल जैपर चिक्कनि माटिसँ ढौरल गेल रहै ओकरा एकटक
देखैत रही। हम घरक चारू दिस नजरि दौगेलौं, तखने हमरा रुक्मिणी मौंसीक ओइठाम
गेल सुलूक यादि आबि गेल। आँखिक सोझहा ओकर निष्पाप, अनजान
आ बहुत सुन्नर मूर्ति ठाढ भऽ गेल। ओकर लहसुनियाँ आँखिसँ सुखद भाव प्रकट भऽ रहल छेलै।
तखन ओकर एतए नै होइक बाबजूदो हमरा ओकरा माथपर हाथ फेरैक आ ओकर चुम्मा लइक
इच्छा भेल। एतबेमे केबाड़ खुजैक अबाज भेल। देखलौं तँ सुलू घर आबि गेल छेली। हमरा
देखि ओकर खुशी दूगूणा भऽ गेलै। ओ दौग कऽ एली आ जाधरि हम ओकरा कोरा लैतिऐ ताधरि ओ “मामा” कहि कऽ
हमरा शोर पारलक आ हमरा पएरसँ लिपटि गेली।
Illustration-08
·
हर एक लोक आ माटिक कथा
‘पाखलो’ उपन्यासकेँ दुइए तीन बरखमे ख्याति भेट गेल रहै। ‘राष्ट्रमतँ
द्वारा एकरा औपन्यासिक प्रतिस्पर्धामे पुरस्कार भेटलै। कला अकादमीक पुरस्कार सेहो
भेटलै। ‘पाखलो’ उपन्यास पणजी अकासवाणीसँ मराठी भाषामे नवोनाट्य स्वरूपमे प्रसारित भेल। ऐ
तरहेँ मराठी साहित्यमे सेहो पाखलो अपन उपस्थिति दर्ज करेलक।
कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’ अपन
विशिष्ट शैलीक कारणेँ ठाढ रहल। तुकाराम शेटक ‘पाखलो’ क जड़ि आमक गाछ सदृश गोवाक माटिक गहराई
धरि पहुँच गेल। ऐ माटिक सुगंध ‘पाखलो’क सौंसे जीवनमे सुरभित भऽ रहल अछि। मुदा ‘पाखलो’सँ
शालीकेँ जनमल ऐ बच्चाकेँ अपनासँ दूर रखैए। ओ अपना-आपसँ
सेहो साक्षात्कार नै कऽ सकैए। यएह तनाव, यएह बेथा
पाखलोक हृदैमे घर बना रहल अछि आ ऐ बेथासँ ‘पाखलो’ उपन्यासक जनम भेल।
कोंकणी साहित्यमे ‘पाखलो’क कथा
एकटा नव आ ज्वलन्त विषय लऽ के आएल अछि। ऐ उपन्यास विषय जेतेक नव अछि ततबे मौलिक।
पाखलोक बीजसँ गोवाक एक सामान्य स्त्रीक गर्भसँ पलि कऽ गोवाक माटिक संस्कारकेँ अपनबैले
तड़पि रहल अछि। पाखलोक रूप, गुलाबी केश, लहसुनियाँ
आँखि, लाली गोराय अछि, मुदा ओकरापर जे संस्कार पड़ल छल ओ गोवाक
माटिक,
हिन्दूक, शालीक, विठूक
छल।
बाँकी गोवावासी जकाँ ईहो पाखलो
माटिएक विठू छी, मुदा समाज एकरा पाखलोक नजरिसँ देखैए। ओ शालीक विठू छी।
ओ विठूए छी, ओकरा एहेन बुझाइ छै। मुदा समाज ओकरा विठू नै बनए दइ
छै। लेखक श्री तुकारामक नजरिमे ई विरोधाभास देखबामे आएल। पाखलोक जीवनकेँ एक विरोध
बना कऽ एकपक्षीय आधारक रचना कएल अछि। पाखलोक कथा घुलि-मिलि
रंगीन भऽ
गेल अछि। पाखलो बनि कऽ, विठू
बनि कऽ...
ओहो ऐ माटिक सपूत बनि जाए, ऐ इच्छाकेँ पालि पाखलो पाठकक मोनमे एकटा विशिष्ट छाप छोड़ि दैत अछि। पाखलो
उपन्यास पढ़ैत काल पाठक सेहो स्वयं पाखलो बनि जाइत अछि। यएह ऐ
उपन्यासक विशेषता छी।
उपन्यासक निवेदन दू प्रकारसँ कएल
गेल अछि-
अध्याय 1,3,5,7,9 आ 10 मे पाखलो
स्वयं निवेदन करैए आ 2,4.6,8मे लेखक स्वयं निवेदन करै छथि। निवेदनक ई
शैली केश जकाँ गूथल अछि, यएह एकर सौंदर्य अछि। मात्र लेखकक
निवेदनक कारणेँ ऐ उपन्यासक सौंदर्य नै बढि जाइत अछि। ऐ तरहक शैली आत्मनिवेदनात्मक
उपन्यासक दोष, बन्हन मेटबैक कारण बनि गेल अछि। विषयकेँ नीक जकाँ
रँगि देबाक निवेदन शैलीक बहुत नीक जकाँ चित्रण भेल अछि। ई दुनू निवेदन शैली एक
दोसराक पूरक छी।
तुकाराम शेट उपन्यासक सभटा प्रसंगकेँ बड़ सावधानीक
संग रंगने छथि। केतौ अतिरेकक कारणेँ उपन्यासमे बाधा नै आएल अछि। उदाहरण स्वरूप जखनि
शीलीक बलात्कार होइ छै तखन यै प्रसंग लए ओ ऐ तरहेँ लिखै छथि।
“ओइ अन्हार गुप्प
जंगलमे ओ अजगर सरिपहुँ ओकरा अपना काबूमे कऽ लेलकै। झार-झंखार आ पात सभसँ अजीब
तरहेँ अबाज आबए लगलै।”
शालीक मृत्युक
प्रसंग सेहो किछु अहिना अछि। पाखलो चिताकेँ आगि लगेबाक प्रयास करैए मुदा जखनि
चिताकेँ आगि नै लगैए तँ दादी कहैए-
“बाउ! अहाँक हाथे अहाँक माएक चिताकेँ आगि नै लागि रहल अछि? आब की उपाए?”
पाखलोक दुर्दैव
किछु शब्दमे लेखक एतए देखौने छथि। एकबेर पाखलो पोखरिमे नहबैए, ई देखि बाबू भट “पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक! पाखलो पोखरि भ्रष्ट केलक!” चिकरए लागैए। पाखलोकेँ
घीचि कऽ ओकरा स्तंभसँ बान्हि ओकर हाल-बेहाल कऽ दैत
अछि। जखनि शाली ओकरा छोड़बए जाइ छथि, ओ ओकरो बान्हि कऽ राखैए। ओकरा देखि
पाखलोकेँ लगै छै-
“हमरा देहक गरम खून दौगए लागल.... बादमे हमर खून ठंढा भऽ गेल आ ओ
शनैः शनैः हमरा शरीरसँ निकलि रहल अछि, बुझाए लागल..., हमरा बुझाएल जेना हमरा पूरा शरीरक
सभटा खून बहि गेल हो!”
पाखलोक असहायता संयमसँ खुजैए। ऐ सभटा प्रसंगकेँ जीवित
रखबाक हेतु भाषाशैली सेहो ओतबे प्रभावी अछि। प्रसंगक लेल उपयुक्त अछि। जेना नालीसँ
शांत पानि बहैए तखन बहुत कोमल अबाज अबैए, ओहिना एकर भाषा अछि। सुन्नरि
युवतीक पएरक पैंजनीक अबाजमे हेरा जाएब-सन, जइ
तरहेँ आँखि बन्न कऽ कऽ मात्र अबाज सुनि लैत छी ओहिना ओइ भाषाक मन्द अबाज ताकब, आ लय-तालकेँ ओ पाठकपर विजय प्राप्त करैए। हृदैमे घर बना लैत अछि।
ऐ तरहक वाक्यमे भाषाशैली बहुत सुन्दर भऽ गेल अछि।
लेखकक ई भाषा शैली प्रसंगक अनुसारेँ मोड़ लेबाक कारणेँ प्रसंगक सौंदर्य बढ़ि गेल
अछि।
पाखलो ऐ उपन्यासक नायक अछि। ऐ बेक्तित्वक चारू दिस अन्य पात्र सभ अछि, सोनू, दादी, शाली,
रजनी, आलेस, गोविन्द, सुलू ई सभटा द्वितीयक पात्र छथि। उपन्यासमे नायकक चरित्र-चित्रण
बहुत नीक ढंगे कएल गेल अछि। अपन हृदैसँ निकलल बेथा, वेदनाक
सहारे ओ जीब रहल अछि। ओकरा मेटएबाल लेल ओ संघर्ष करैए। यएह पाखलोक जीवन छी। जँ अपन
बेथामे नायक जड़ैतो रहल अछि तथापि ओ ओइ परिधिमे नै रहैए। केगदी भाटमे नारिकेल तोड़ैले वएह आगू बढैए। हिन्दू आ ईसाईक बीच भेल झगड़ाकेँ वएह सुलझबैए, मुदा ओ अपन दर्द नै बिसरि सकल। ओकरा बुझाइ छै-
“हम नै तँ ईसाई रही, आ ने हिन्दू, ऐ लेल हमरा छोड़ि देल गेल की? हमर संबन्ध दुनूसँ अछि, ऐ लेल हमरा ओ लोकनि नै मारलनि की?” अपन अस्तित्व ताकै बला ई पाखलो
सोनू मामाक बेटीकेँ अपन बहिन बूझि सिनेह करैए, मुदा ओइ
सिनेहकेँ रजनीक अलावा कियो ने बूझि सकल अछि। जइसँ ओकर बेथा औरो तीव्र भऽ जाइत अछि। पाखलोक मनोदशा देखैले पाखलोक सही भावना बेक्त करैले
एतए लेखककेँ खूब अवसर भेटल छन्हि।
दादी एतए समाजक एकटा विशिष्ट बेकती
छथि। पाखलोकेँ ई गाम नै अपनौलक, एकरा बाबजूद दादी ओकरा अपन बेटा
गोविन्दक सदृश सिनेह देलक। ओकरा नोकरीपर लगौलक। रैयत लोकनिपर भेल अत्याचारकेँ मेटबैले
ओ मास भरिक कैद काटलक।
सोनू मामा सेहो पाखलोसँ सिनेह करै छथि मुदा अपन बेटीक खातिर ओ पाखलोकेँ भगा दइ
छथि। आन लोक जकाँ आ रजनीक पति जकाँ ओहो पाखलोपर आरोप लगबैए। सोनू मामाक चित्रण
उपन्यासमे एला पछाति ओकर बेक्तित्व स्पष्ट नै भऽ सकलै। ओहिना शालीक बेक्तित्व
चित्रण जइ ढंगे होइक चाही से नै भऽ सकल। ओकरा तुलनामे रजनीक बेक्तित्व नीक जकाँ
उभरि कऽ आएल अछि। गोविन्द बुद्धिमान, होशियार, आ तत्वज्ञानी अछि, जे पाखलो स्वयं कहैए-
“मनुख जनमक संगे मृत्यु सेहो अपना संगे आनने अछि... धरती हो, जल हुअए वा अकास, सभठाम मृत्यु निश्चित
अछि।” एहेन तत्वज्ञानक शब्द कहैबला
गोविन्द पाठकेँ नै पचैए। हमरा ई तत्वज्ञान हमर आजी देने रहथि, एहेन स्पष्टीकरण जँ गोविन्दक मुहसँ भेलो अछि तथापि नेनपनमे गोविन्द एतेक
तत्वज्ञानक गप कऽ सकैए से कनी अजगुत लगैए, आ गोविन्द एकटा बुजुर्ग सन बुझाइत अछि। ओ तत्वज्ञानी आ बुद्धिमान होइतो एकटा
ईसाई युवतीसँ बिआह कऽ लैत अछि, आ अपन गाम छोड़ि
दैत अछि। भारतमे रहि कऽ पाइ नै कमा सकैए ऐ लेल आलेस दुबई चलि जाइत अछि, मुदा पाखलो ऐ
गामक संस्कृति, माटिसँ चिपकल रहैए। उपन्यासक एकटा
गाम ऐ उपन्यासक बेक्तित्व भऽ गेल अछि। गोवाक माटिक विशेषता ऐ गाममे देखाइत अछि।
प्रकृति सौंदर्यक चित्रण बहुत नीक जकाँ दर्शाओल गेल अछि।
रजनीकेँ ‘पाखलो’सन लड़की होइ छै। गुलाबी केश, लहसुनियाँ आँखि, गोर चाम। वास्तवमे तँ ई लड़की रजनीकेँ ओकरा अपन पतिसँ होइ छै तथापि ओ लड़की
देखैमे पाखलो-सन बुझाइत अछि ऐ लेल ई पाखलोक
पैदाइश छै, ई आरोप ओकर पति ओकरापर लगबै छै।
रजनीकेँ पाखलोसँ लड़की होइक कारण ओकरा मोनमे पाखलोक प्रति शाश्वत प्रेम भऽ सकैए। ऐ
मनोदशाक कारणेँ रजनीकेँ पाखलो सन लड़की होइक संभावना देखैमे आबि रहल अछि।
पाखलो गोवाक माटिक अछि। मुदा एकरा पढि मोनमे एहेन शंका होइत अछि जे ‘पाखलो’क संबन्ध केतौ मराठी साहित्यमे चि.त्र्यं. खानोलकरक ‘चानी’ उपन्याससँ तँ नै अछि? मुदा ‘पाखलो’क विशिष्टता ‘चानी’मे नै अछि।
भूतकाल आ वर्तमान कालक स्पर्श ऐ उपन्यासमे अछि। कथानकक परिधि पूरा करैमे दुनूक भूमिका अछि। एकटा रविक दिन सभटा पुरान स्मरण एकटा गरज आ चमकक संग खतम
भऽ जाइत अछि। ओइमे पाखलो अपन पहिचान ताकऽ लगैए। फेर पाखलो अपन जनमसँ लए आइधरिक कथा
अपना मोनमे स्मरण करैए। दुपहर भऽ जाइत अछि। सुलू पाखलोकेँ ‘मामा’ कहि ओकर पएर पकड़ि लैत अछि। कथानकक परिधि पूरा भऽ जाइत अछि। वर्तमान कालसँ
भूतकालमे जाए कऽ ‘पाखलो’ फेर वर्तमानमे आबि जाइत अछि। उपन्यासक प्रारूप प्रशंशाक योग्य अछि।
उपन्यासक हरेक अध्यायक अपन महत्व छै। हरेक अध्यायक शुरूआत आ विशेष रूपेँ अंत
कलात्मक अछि। निच्चाँक उदाहरण देखू-
“नै अहाँ पाखलो थिकौं!
पाखलो शामाकेँ किछु कहैले मुँह खोलने छल आकि ओ ओतएसँ चलि देली। पाखलोक मोन तँ बुझु
जे नागफनीसँ भरल रेगिस्तानक सदृश भऽ गेलै।”
अध्याय चारि
“ऐ गाममे हमर परिचय फकत एते अछि जे हमर नाओं पाखलो छी, हमर जाति पाखलो छी, आ हमर धर्म सेहो पाखलो छी।”
अध्याय पाँच
“रजनीकेँ गोर रंग पसिन्न छै। ओकरा चन्द्रमाक ऐ ज्योत्सना-सन बेटी होमक चाही…. काजर लगएला पछाति कारी आँखि
वाली ओकरे सन सुन्नरि बेटी होमक चाही। पूर्णिमाक ज्योत्सना चारुदिस पसरल रहै आ
जेना नहरक पानि बहै छै तहिना ओकरा रस्तामे चन्द्रमा अपन
ज्योत्सना पसारने छेलै।”
अध्याय
आठ
“पाखलोक गालपर थापड़क निशान भऽ गेलै। ओ अपन गालकेँ हँसोतए लागल। तथापि ओकरा
सौंसे देहमे भऽ रहल दर्द ओकरा ओतेक कष्ट नै दऽ रहल छेलै, मुदा भोरक घटनासँ जे ओकरा करेजमे घाव भेल रहै ओ अखनि धरि हरिअर रहै।”
अध्याय
आठ
“ओइ पोखरिसँ हम जे कुसरीक फूल निकालने छेलौं से वास्तवमे ओ कुसरीक फूलक कोढ़ी नै
अपितु रजनीक खोपामे लगौल गेल घरक बगैचा में फूलल मोगराक कली रहै! यादिक लेल सफेद, सुगन्धित!”
अध्याय नओ
“ओ दौग कऽ एली आ जाधरि हम ओकरा कोरा
लैतिऐ ताधरि ओ “मामा” कहि कऽ हमरा शोर पारलक आ हमरा पएरसँ लिपटि गेली।”
अध्याय दस
हरेक अध्यायक ऐ तरहक कलात्मक अंत छै। हरेक अध्यायक
अंतमे उपन्यासक अंत भऽ सकैए। ई उपन्यास एतेक कलात्मक अछि। गोवाक संवतंत्रताक
पार्श्वसँ ई कथा रंग आनैए। स्वतंत्रता भेटैसँ पूर्वहि शुरू भेल ई कथा स्वतंत्रता
पछाइतो चलैत रहैए। मुदा उपन्यासमे स्वतंत्रताक विषय जेतेक एबाक चाही, से नै आबि सकल अछि। मुदा ऐ कारणेँ ऐ उपन्यासमे बाधा आबि गेल छै, से नै छै। ओइ समैक तीव्र स्वतंत्रता आन्दोलनक पदचिह्न जँ उपन्यासमे
अबितै तँ एकर पृष्ठभूमि आँखिकेँ जँचतै।
कार्मो चीफ
जंगलमे शालीक बलात्कार करैए, बादमे बहुत दिन
पछाति, पाखलोक जनमक बादो ओ शालीसँ भेँट करैए। बिना बतौने ओकरो मोनमे शालीक प्रति सिनेह जागि जाइ छै आ बलात्कारक
तीव्रता कम भऽ जाइ छै। कार्मो चीफक ई प्रकृति पाठककेँ उधेड़बुनमे डालि दइ छै।...कार्मो चीफकेँ बेर-बेर शालीक ओतए देखि लोकसभ, “शालीक भड़ुआ।” कहै छै आ शालीक संबन्धमे-
“ओ पाखलोकेँ अपना घरमे
राखि धंधा शुरू कऽ देने छै वा अपन नव
दुनियाँ बसा नेने अछि?” कहै छै। बलात्कारक तीव्रता कम कऽ लेखक पाठककेँ की कहए चाहै छथि? ई बुझ’मे नै अबैए। पाखलोक ‘विठू’ एकबेर कहै छै-
“ओ एकटा पतिव्रता नारी छेली” मुदा एकरो कोनो माने नै निकलैए।
ऐ तरहक किछु दोष ऐ उपन्यासमे अछि, मुदा ई सूक्ष्म
दृष्टिएँ देखने बिना नजरिमे नै अबैए।
पाखलो उपन्यास मात्र पाखलोक कथा नै छी। एकटा माटिक कथा छी। हरेक लोकक, हरेक माटिक कथा छी।
एहेन कथा इतिहास बतबैए। हरेक लोककेँ इन्सानक रूपमे जीवन बितेबै काल ओकरा अपन घर, अपन लोक, अपन समाजक आवश्यकता होइ छै। अपन
संस्कृतियोक आवश्यकता होइ छै। जँ इ सभ ओकरा नै भेटै छै आकि ओकरा ऐ सभसँ दूर राखि
देल जाइ छै तखन ‘पाखलो’क उदय भऽ जाइ छै।
मोनक ई भावना, वेदना आ बेथा मात्र गोवाक
संस्कृतिमे उपजल एकटा पाखलो लोकक नै छी, अपितु सभ लोकक कथा छी। केवल वातावरण ओ संदर्भ बदलि जाइ छै। मूल भावना रहै छै ‘विठू’ बनि कऽ जीबाक। स्थान, काल आ मर्यादा ऐ
उपन्यासमे नै अछि। ऐमे बेक्त कएल गेल भावना, हरेक लोकक ज्वलंत कथा छी, वेदना छी। लोक
सभमेसँ हरेक ‘पाखलो’ ‘विठू’ बनि कऽ जीबैले
संघर्ष करैए।
(कोंकण टाइम्स, दिवाली अंक, 1981 मे प्रकाशित आलेखक अंश, अशोक मनभुटकर)
विदेह नूतन अंक भाषापाक रचना-लेखन
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष
प्रोजेक्टकेँ
आगू
बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदान ई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
No comments:
Post a Comment